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ऐतिहासिक राजनीतिक दलबदल : राज्यसभा में ‘आप’ के सात सांसदों का भाजपा में विलय, उच्च सदन में बदला शक्ति का समीकरण

देश/प्रदेश नई दिल्ली राष्ट्रीय

एजेंसी, नई दिल्ली। ऐतिहासिक राजनीतिक दलबदल : भारतीय राजनीति के गलियारों में सोमवार को एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक घटनाक्रम घटित हुआ, जब राज्यसभा के सभापति ने आम आदमी पार्टी के सात सांसदों के भारतीय जनता पार्टी में विलय को विधिवत रूप से अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। इस प्रशासनिक निर्णय के साथ ही राज्यसभा सचिवालय ने सदन की नई सदस्य सूची भी जारी कर दी है, जिसके अनुसार भाजपा की सदस्य संख्या अब एक सौ छह से बढ़कर एक सौ तेरह तक पहुँच गई है। सचिवालय के आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, इन सांसदों का भाजपा में यह सम्मिलन चौबीस अप्रैल से ही प्रभावी स्वीकार किया गया है, जिससे उच्च सदन के भीतर सत्ताधारी दल की स्थिति पूर्व की तुलना में और अधिक सुदृढ़ और प्रभावशाली हो गई है।

संसदीय अभिलेखों में परिवर्तन और नए सदस्यों का विवरण

सोमवार को राज्यसभा सचिवालय द्वारा निर्गत की गई राजनीतिक दलों की अद्यतन सूची में इन सातों नेताओं के नामों को अब भारतीय जनता पार्टी के सदस्यों के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने वाले इन विशिष्ट सदस्यों में राघव चड्ढा, डॉक्टर संदीप कुमार पाठक, डॉक्टर अशोक कुमार मित्तल, हरभजन सिंह, विक्रमजीत सिंह साहनी, स्वाति मालीवाल और राजेंद्र गुप्ता के नाम प्रमुखता से अंकित हैं। ध्यातव्य है कि इन सभी सदस्यों ने विगत शुक्रवार को एक सार्वजनिक प्रेस वार्ता के माध्यम से भाजपा की विचारधारा में अपनी आस्था व्यक्त करते हुए पार्टी में सम्मिलित होने की घोषणा की थी, जिसे अब आधिकारिक रूप से संसदीय अभिलेखों का भाग बना लिया गया है।

आम आदमी पार्टी के संसदीय प्रभाव में भारी गिरावट

इस अप्रत्याशित राजनीतिक उलटफेर के कारण राज्यसभा में आम आदमी पार्टी की उपस्थिति और शक्ति में भारी कमी दर्ज की गई है। सदन में पार्टी के कुल दस प्रतिनिधियों में से सात के दल बदलने के पश्चात, अब ‘आप’ का प्रतिनिधित्व केवल तीन सदस्यों तक ही सीमित रह गया है। वर्तमान में जो तीन सदस्य आम आदमी पार्टी के खेमे में शेष हैं, उनमें वरिष्ठ नेता संजय सिंह, नारायण दास गुप्ता और संत बलबीर सिंह सम्मिलित हैं। सचिवालय द्वारा जारी नवीन आंकड़ों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उच्च सदन में आम आदमी पार्टी अब एक अत्यंत लघु दल के रूप में संकुचित हो गई है।

आंतरिक मतभेद और वैचारिक विच्छेद के कारण

राजनैतिक विश्लेषकों का मत है कि आम आदमी पार्टी के भीतर इस बड़े विग्रह की नींव उस समय पड़ी थी, जब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने राघव चड्ढा को सदन में उप नेता के दायित्व से मुक्त करने का निर्णय लिया था। इस घटना के पश्चात से ही सांसदों और नेतृत्व के मध्य वैचारिक दूरी और आंतरिक कलह की निरंतर सूचनाएं प्राप्त हो रही थीं। चौबीस अप्रैल को आयोजित संवाददाता सम्मेलन में इन नेताओं ने दल छोड़ने के अपने निर्णय को सार्वजनिक करते हुए स्पष्ट किया था कि वे प्रधानमंत्री के नेतृत्व और भाजपा के भविष्योन्मुखी दृष्टिकोण के साथ जुड़कर राष्ट्र निर्माण में योगदान देना चाहते हैं। इस बड़े राजनीतिक परिवर्तन ने न केवल संसद के भीतर, अपितु दिल्ली की प्रादेशिक राजनीति में भी भविष्य के लिए नए और जटिल समीकरणों को जन्म दे दिया है।

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