एजेंसी, भोपाल। मध्य प्रदेश में गरीबों को मुफ्त इलाज देने वाली सबसे बड़ी ‘आयुष्मान भारत योजना’ को लेकर एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला सामने आया है। 1 अप्रैल 2026 से लागू हुए नए नियमों के कारण प्रदेश के 126 निजी अस्पतालों से आयुष्मान योजना के तहत मिलने वाली मुफ्त इलाज की सुविधा छीन ली गई है। सरकार के इस कदम से भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे बड़े शहरों के उन लाखों परिवारों की चिंता बढ़ गई है जो पूरी तरह से आयुष्मान कार्ड पर निर्भर थे।
स्वस्थ नागरिक, सशक्त मध्यप्रदेश
✳️प्रदेश में हर परिवार को मिल रहा स्वास्थ्य सुरक्षा का भरोसा
✳️ 4.46 करोड़ से अधिक आयुष्मान कार्ड जारी@DrMohanYadav51 @healthminmp #CMMadhyaPradesh #MadhyaPradesh pic.twitter.com/uogEkL91Lr— Chief Minister, MP (@CMMadhyaPradesh) April 5, 2026
इन शहरों के अस्पतालों पर गिरी गाज
प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के चार प्रमुख महानगरों में स्थित कुल 398 निजी अस्पतालों में से 126 को इस सूची से बाहर कर दिया गया है। सबसे ज्यादा असर राजधानी भोपाल पर पड़ा है, जहां 51 अस्पतालों की मान्यता समाप्त की गई है। इसके अलावा ग्वालियर के 33, इंदौर के 30 और जबलपुर के 12 निजी अस्पताल अब आयुष्मान कार्ड धारकों का मुफ्त इलाज नहीं कर सकेंगे। अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार लाने के उद्देश्य से की गई है।
मान्यता रद्द होने की मुख्य वजह
आयुष्मान भारत निरामयम के मुख्य कार्यपालन अधिकारी डॉ. योगेश भरसट ने स्पष्ट किया है कि अब केवल उन्हीं अस्पतालों को इस योजना का लाभ देने की अनुमति होगी जिनके पास एनएबीएच सर्टिफिकेट है। एनएबीएच एक ऐसा मानक है जो अस्पताल में मरीजों की सुरक्षा और इलाज की उच्च गुणवत्ता को प्रमाणित करता है। जिन अस्पतालों के पास यह प्रमाण पत्र नहीं था, उन्हें तत्काल प्रभाव से योजना से बाहर कर दिया गया है। वहीं, ‘एंट्री लेवल’ वाले अस्पतालों को अपने मानक सुधारने के लिए दो साल का समय दिया गया है।
गरीब मरीजों के सामने खड़ा हुआ संकट
इस फैसले के बाद अब आयुष्मान कार्ड धारकों के लिए इलाज के विकल्प बहुत सीमित हो गए हैं। जानकारों का मानना है कि भोपाल और इंदौर जैसे शहरों के लगभग 80 प्रतिशत निजी अस्पताल इस नए नियम की जद में आ सकते हैं। छोटे और मध्यम स्तर के अस्पतालों के बाहर होने से अब मरीजों का पूरा दबाव बड़े सरकारी और निजी अस्पतालों पर पड़ेगा, जिससे वहां भारी भीड़ और इलाज में देरी होने की आशंका है। खासकर आर्थिक रूप से कमजोर और आदिवासी परिवारों के लिए शहर के बड़े अस्पतालों तक पहुंचना एक बड़ी चुनौती साबित होगा।
अस्पताल संचालकों ने उठाए सवाल
सरकार के इस सख्त रुख पर अस्पताल संचालकों ने कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि अचानक लिए गए इस फैसले से केवल चार बड़े शहरों के अस्पतालों और वहां के मरीजों को निशाना बनाया गया है। संचालकों ने सवाल उठाया है कि यदि आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद गरीब मरीज को समय पर इलाज नहीं मिलता है और कोई अनहोनी होती है, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? फिलहाल इस कटौती के बाद प्रदेश के स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मचा हुआ है और आम जनता के बीच इलाज को लेकर अनिश्चितता का माहौल है।
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