मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव 31 मई 2025 को नारी सशक्तिकरण की सर्वोत्तम प्रतीक महारानी अहिल्याबाई होल्कर की जयंती को व्यापक स्तर पर मनाने जा रहे हैं। देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति इस अवसर पर आयोजित महिला सम्मेलन में चार चांद लगाने वाली है। महिलाओं के सम्मान और उनकी सामाजिक स्वीकार्यता को लक्ष्य बनाकर किए जा रहे इस कार्यक्रम की तैयारी पूर्णता को प्राप्त हैं। अब सभी को यहां नारी शक्ति की विहंगम उपस्थिति एवं प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के आगमन का इंतजार है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि रानी अहिल्याबाई होल्कर की जयंती पर भाजपा की डॉक्टर मोहन यादव सरकार द्वारा इतना व्यापक कार्यक्रम किस लक्ष्य को ध्यान में रखा किया जा रहा है। यह जानने के लिए हमें नारी शक्ति, नारी आदर्श और नारी संघर्ष के इतिहास पर दृष्टिपात करना होगा। भारतीय इतिहास नारी शक्ति और मातृ सत्ता के अनेक गौरवान्वित घटनाक्रमों से भरा पड़ा है। इनमें दैवीय शक्तियों की बात करें तो मां सरस्वती, मां लक्ष्मी और मां दुर्गा को सर्वोत्तम प्रतीक माना जा सकता है। विसंगति पूर्ण परिस्थितियों से जूझने वाली महा शक्तियों की बात करें तो इनमें माता सीता, शकुंतला और भक्त प्रहलाद की माता कयाधु का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा हुआ है। भारत के इतिहास में कई ऐसी वीरांगनाएं भी हुईं जिन्होंने अपने संघर्ष, अद्वितीय शासन और दूरदर्शिता से इतिहास के पन्नों में अमिट छाप छोड़ी। इनमें महारानी लक्ष्मीबाई, रानी दुर्गावती और रानी चेन्नम्मा का उल्लेख सर्व विदित है ऐसी ही एक महावीरांगना थीं मालवा की रानी अहिल्या बाई होलकर। उन्हें आज भी एक आदर्श प्रशासक, न्यायप्रिय शासक और धर्मपरायण महिला के रूप में याद किया जाता है। उन्हें एक आदर्श महारानी मानते हुए हर साल 31 मई को महारानी अहिल्याबाई होलकर की जयंती मनाई जाती है। भाजपा की डॉक्टर मोहन यादव सरकार द्वारा इस वर्ष उनकी जयंती को महिला सशक्तिकरण को पूर्ण रूपेण स्थापित करने वाले लक्ष्य के रूप में मनाया जा रहा है। अधिकृत जानकारी के अनुसार देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी 31 मई को भोपाल में अहिल्याबाई होल्कर की 300वीं जयंती के मौके पर आयोजित एक विहंगम समारोह में सहभागिता करने जा रहे हैं। भारतीय इतिहासकारों और समाज में स्थापित उच्च आदर्शों के अनुसार हमें शिक्षा मिलती है कि अहिल्या बाई होलकर केवल एक शासक नहीं थीं। वे धार्मिक, न्यायप्रिय, सेवाभावी और स्त्री शक्ति का प्रतीक भी थीं। अहिल्याबाई होलकर की जयंती के मौके पर हमें उनके जीवन और स्थापित आदर्श के बारे में जानना चाहिए, ताकि केवल नारी ही नहीं अपितु समूचा मानव समाज अहिल्याबाई होलकर द्वारा स्थापित उच्च मापदंडों से सीख ले सके। महारानी अहिल्याबाई होलकर का जन्म 31 मई 1725 में महाराष्ट्र के अहमद नगर स्थित चौंडी गांव में हुआ था। उनके पिता मनोकजी शिंदे अपने गांव के पटेल थे। अहिल्याबाई बेहद सामान्य और साधन विहीन धनगर समुदाय से ताल्लुक रखती थीं। जिस दौर में स्त्रियों को घर की चार दीवारी में रखा जाता था, उस समय अहिल्या बाई अपनी बाल सुलभ बुद्धि के आधार पर तर्क वितर्क करने में महारत रखने लगी थीं। इन्हीं विशेषताओं के चलते एक किसान परिवार में जन्मी बालिका अहिल्याबाई को जब मालवा के शासक मल्हार राव होलकर ने देखा तो उन्हें अपने पुत्र खांडेराव होलकर की बहू के रूप में चुन लिया। जिस समय अहिल्याबाई की शादी खंडेराव होलकर के साथ हुई तब उनकी उम्र केवल 8 साल थी । लेकिन अहिल्या पर दुखों का पहाड़ तब टूटा जब 1754 में उनके पति खांडेराव की मृत्यु हो गई। साल 1766 में मालवा के शासक और अहिल्या के ससुर मल्हार राव होलकर भी चल बसे। मल्हार राव होलकर की मृत्यु उन्हें सर्वाधिक सदमा देने वाली घटना रही। क्योंकि मल्हार राव केवल मालवा के शासक ही नहीं थे। बल्कि वे अहिल्याबाई के ससुर कम उनके पिता और संरक्षक ज्यादा हुआ करते थे। अहिल्याबाई को राजनीतिक और सामाजिक सेवा के गुर उन्होंने ही सिखाए थे। इसे दुखों की पराकाष्ठा ही कही जाएगी कि अहिल्याबाई ने अपने पुत्र मालेराव को भी शीघ्र ही खो दिया। जब मालवा की गद्दी बिना शासक के थी और राजसत्ता के सूत्र संभालने वाले श्रीमंत जन शासक के रूप में किसी महिला को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे, तब अहिल्याबाई ने प्रजा की भलाई को ध्यान में रखकर हठ पूर्वक शासन की बागडोर अपने हाथों में ली। अहिल्याबाई ने 1767 से 1795 तक मालवा राज्य की बागडोर संभाली। कभी महिला शासक के खिलाफ मानसिकता रखने वाले मालवा के सेनापति और पुणे के पेशवा बाजीराव ने अहिल्याबाई की योग्यता और उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति को देखते हुए आगे बढ़कर उनकी सहायता की। अपने शासन काल में अहिल्याबाई ने इंदौर को एक व्यवस्थित और सुंदर नगर में परिवर्तित किया। उन्होंने बिना युद्ध के प्रशासनिक क्षमता, न्याय व्यवस्था और परोपकारी कार्यों से शासन चलाया। साथ ही हर धर्म, जाति और समुदाय के साथ समान न्याय और सम्मान का व्यवहार किया। उन्होंने एक महिला होकर उस दौर में शिक्षा ग्रहण की, अस्त्र शस्त्र चलाना सीखे, राजकाज में हस्तक्षेप किया और फिर पूर्ण रूपेण शासन चलाया, जब स्त्रियों को घर के अलावा किसी भी काज में भागीदारी का अधिकार नहीं था। ऐसे में अपनी बुद्धिमत्ता, करुणा और नेतृत्व क्षमता से उन्होंने नारी सशक्तिकरण का जीवंत उदाहरण पेश किया और यह साबित किया कि नारी यदि ठान ले तो वह क्या नहीं कर सकती। अहिल्याबाई ने राज्य की सीमाओं और शासन की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए अपने नेतृत्व में महिला सेना की स्थापना की। केवल इतना ही नहीं एक महारानी होने के नाते अहिल्याबाई ने स्त्रियों को समाज में उचित स्थान दिया। अपनी इसी सकारात्मक मानसिकता के चलते उन्होंने लड़कियों की पढ़ाई लिखाई को विस्तार देने का प्रयास किया तथा कई नवाचार किये।


