मध्य प्रदेश भी यूसीसी के साथ

अब मध्य प्रदेश भी यूसीसी के साथ समानता के पथ पर अग्रसर

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अब मध्य प्रदेश भी यूसीसी के साथ समानता के पथ पर अग्रसर

सभ्य समाज की परिकल्पना हमेशा से समानता, न्याय और बंधुत्व के सिद्धांतों पर आधारित रही है। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की रीढ़ उसके नागरिकों के बीच बिना किसी भेदभाव के समान अधिकारों और कर्तव्यों का होना है। हाल ही में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा इंदौर में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) को लेकर दिया गया बयान इसी दिशा में एक बेहद प्रगतिशील और सकारात्मक कदम के रूप में देखा जा सकता है। इंदौर में मध्य प्रदेश नागरिक विमानन नीति-2025 के तहत पहली अंतरराष्ट्रीय हवाई सेवा के ऐतिहासिक शुभारंभ के अवसर पर मुख्यमंत्री ने केवल विमानन के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में भी एक नई उड़ान का संकेत दिया है। उनका यह वक्तव्य कि एक देश में अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून नहीं होने चाहिए, भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्वों के अनुच्छेद 44 की मूल भावना के बिल्कुल अनुकूल है। यह विचार किसी वर्ग विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि राष्ट्र की एकता, अखंडता और हर नागरिक के स्वाभिमान को मजबूत करने की एक ऐतिहासिक आवश्यकता है।
​जब हम एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ रहे हैं, तो व्यक्तिगत कानूनों में असमानता विकास की राह में एक अदृश्य बाधा की तरह काम करती है। मुख्यमंत्री का यह सरल लेकिन बेहद गहरा तर्क कि यदि समाज में एक नागरिक एक विवाह के नियम का पालन करता है, तो यही अपेक्षा देश के सभी नागरिकों से होनी चाहिए, सीधे तौर पर सामाजिक समरसता और समानता को रेखांकित करता है। विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे संवेदनशील मुद्दे किसी धर्म या संप्रदाय विशेष के संकुचित दायरे में कैद रहने के बजाय मानवीय गरिमा और लैंगिक समानता के तराजू पर तौले जाने चाहिए। जब देश में आपराधिक संहिता (क्रिमिनल कोड) सभी धर्मों और जातियों के लिए एक समान है, तो पारिवारिक और व्यक्तिगत मामलों में अलग-अलग कानूनों का बने रहना कानून के शासन की मूल अवधारणा को कमजोर करता है। मुख्यमंत्री के इस बयान ने इस बात पर नए सिरे से बहस छेड़ दी है कि कैसे कानून की एकरूपता समाज में सुरक्षा और विश्वास की भावना को बढ़ा सकती है।

​इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील पहलू लैंगिक न्याय और महिला सशक्तिकरण का है। समाज के भीतर महिलाओं की स्थिति हमेशा से उस समाज की प्रगतिशीलता की कसौटी रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने संबोधन में विशेष रूप से मुस्लिम महिलाओं का उल्लेख करते हुए उनके अधिकारों की वकालत की। यह बेहद सराहनीय है क्योंकि आधी आबादी को केवल इसलिए उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित नहीं रखा जा सकता कि उनके व्यक्तिगत कानून सदियों पुरानी रूढ़ियों से बंधे हुए हैं। चाहे वह बहुविवाह की प्रथा हो, गुजारा भत्ते की अनिश्चितता हो, या फिर पैतृक संपत्ति में समान अधिकार की बात हो—समान नागरिक संहिता देश की हर महिला को सशक्त बनाएगी। यह कानून किसी की धार्मिक आस्था या पूजा पद्धति में हस्तक्षेप नहीं करता, बल्कि यह केवल विवाह की कानूनी मर्यादा और उसमें महिलाओं की गरिमा को सुरक्षित करने का काम करता है। निकाह, सप्तपदी या किसी अन्य पारंपरिक तरीके से होने वाली शादियां वैसी ही रहेंगी, लेकिन उसके बाद मिलने वाले कानूनी अधिकार और जिम्मेदारियां सबके लिए एक जैसी होंगी।
​समान नागरिक संहिता को लेकर अक्सर कुछ वर्गों में आशंकाएं और भ्रांतियां पैदा करने की कोशिश की जाती है, लेकिन यदि इसे सकारात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह विविधता में एकता को और अधिक सुदृढ़ करने का साधन है। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में सांस्कृतिक पहचान और कानूनी समानता दोनों साथ-साथ चल सकते हैं। वास्तव में, यूसीसी का उद्देश्य किसी की विशिष्ट पहचान को मिटाना नहीं, बल्कि देश के कमजोर और वंचित तबकों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों को सुरक्षा प्रदान करना है। जब राज्य का कानून सभी के प्रति निष्पक्ष और समान होगा, तो सांप्रदायिक आधार पर होने वाले ध्रुवीकरण और तुष्टीकरण की राजनीति को हमेशा के लिए विराम मिल जाएगा। इससे समाज में एक ऐसे स्वस्थ वातावरण का निर्माण होगा जहां हर नागरिक खुद को पहले एक भारतीय और बाद में किसी खास समुदाय का हिस्सा मानेगा। मुख्यमंत्री के नेतृत्व में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा इस दिशा में आगे बढ़ने की प्रतिबद्धता जताना राज्य को सामाजिक सुधारों के अग्रणी पायदान पर खड़ा करता है।
​गौर करने वाली बात यह भी है कि मुख्यमंत्री ने यह बयान उस कार्यक्रम में दिया जो मध्य प्रदेश को सीधे वैश्विक मानचित्र पर स्थापित कर रहा था। विकास की नई ऊंचाइयों को छूने की दिशा में बढ़ते मध्य प्रदेश के लिए यह आवश्यक है कि उसका सामाजिक ढांचा भी उतना ही आधुनिक, प्रगतिशील और न्यायपूर्ण हो। भौतिक विकास और सामाजिक विकास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आप एक तरफ विश्व स्तरीय हवाई अड्डे और नीतियां बना सकते हैं, लेकिन यदि आपके समाज का एक बड़ा हिस्सा पुराने और असमान कानूनों के जाल में फंसा रहेगा, तो सर्वांगीण प्रगति का सपना अधूरा ही रहेगा। समान नागरिक संहिता का क्रियान्वयन देश के हर नागरिक के जीवन को सुगम, सुरक्षित और अधिक न्यायपूर्ण बनाने की दिशा में उठाया गया कदम है, जो अंततः देश के प्रत्येक नागरिक के भीतर राष्ट्र के प्रति निष्ठा और अपनेपन की भावना को और गहरा करेगा। डॉ. मोहन यादव का यह स्पष्ट संदेश कि सभी नागरिकों के लिए समान दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए, नए भारत की उसी संकल्पना का प्रतीक है जिसमें हर नागरिक का विकास और सम्मान सर्वोपरि है।

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