एजेंसी, नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को विश्व शांति और वर्तमान वैश्विक संघर्षों पर अपने विचार रखते हुए कहा कि दुनिया में हो रही लड़ाइयों की असली जड़ निजी स्वार्थ और दूसरों पर अपना प्रभुत्व जमाने की इच्छा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि स्थायी शांति और सुकून केवल एकता, अनुशासन और धर्म के मार्ग पर चलने से ही प्राप्त किया जा सकता है।
ये भी पढ़े : मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सम्राट विक्रमादित्य को बताया लोकतंत्र का महानायक : भारतीय नववर्ष और विक्रम संवत 2083 के शुभारंभ पर सुशासन का दिया संदेश
भागवत नागपुर में विश्व हिंदू परिषद के कार्यालय के शिलान्यास के बाद आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि बीते दो हजार वर्षों में दुनिया ने आपसी झगड़ों को खत्म करने के लिए कई तरह के प्रयोग किए हैं, लेकिन उनमें सफलता बहुत कम मिली है। संघ प्रमुख ने विश्वास जताया कि भारत का मूल स्वभाव ही भाईचारे और सामंजस्य का है, यही कारण है कि आज पूरी दुनिया की नजरें भारत पर टिकी हैं। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह आवाज उठ रही है कि भारत ही वह शक्ति है जो ईरान और इजरायल के बीच छिड़े युद्ध को शांत करवाने में मदद कर सकता है।
उन्होंने आगे कहा कि जहां बाकी दुनिया जंगल के कानून पर चलती है, वहीं भारत के लोग मानवता के सिद्धांतों का पालन करते हैं। भागवत के अनुसार इस डगमगाती हुई दुनिया को धर्म के आधार पर संतुलित करना भारत की ही जिम्मेदारी है। उन्होंने अपने संबोधन में तीन मुख्य बिंदुओं पर प्रकाश डाला। पहला यह कि धार्मिक कट्टरता, जबरन मतांतरण और भेदभाव जैसी बुराइयां आज भी समाज में मौजूद हैं, जबकि भारत का प्राचीन ज्ञान सबको एक सूत्र में पिरोने की सीख देता है। दूसरा, धर्म केवल किताबों तक सीमित न रहकर लोगों के आचरण में दिखना चाहिए। तीसरा, अनुशासन और ऊंचे नैतिक मूल्यों के लिए निरंतर अभ्यास जरूरी है, चाहे इसके लिए निजी कठिनाइयां ही क्यों न सहनी पड़ें।


