एजेंसी, नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों के लिए अधिग्रहण फाइनेंसिंग और आईपीओ शेयर खरीद फंडिंग के नियमों में बड़ा बदलाव किया है। रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शुक्रवार को कहा कि इस कदम से रियल इकोनॉमी को मजबूती मिलेगी और बैंकिंग सिस्टम में नए अवसर पैदा होंगे।
भारतीय रिजर्व बैंक की नई पॉलिसी से बैंकों को मिलेगी बड़ी राहत
भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों के लिए अधिग्रहण फाइनेंसिंग औरआईपीओ में शेयर खरीद के नियमों में बड़ा बदलाव किया है। भारतीय रिजर्व बैंक गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शुक्रवार को कहा कि बैंकों पर लगी रोक हटाने से वास्तविक अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और बैंकिंग सेक्टर को नए अवसर मिलेंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह निर्णय सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है, जिससे बैंक और उनके हितधारक सुरक्षित ढंग से नए बिजनेस के फायदों का लाभ उठा सकें।
अधिग्रहण और आईपीओ फाइनेंसिंग
पिछले महीने, भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों को कंपनियों के अधिग्रहण के लिए फंडिंग करने की अनुमति दी और आईपीओ में शेयर खरीदने के लिए ऋण की सीमा बढ़ा दी। मल्होत्रा ने बताया कि इस नए ढांचे में गार्डरेल्स भी रखे गए हैं। उदाहरण के लिए, बैंक कुल डील वैल्यू का अधिकतम 70% ही फाइनेंस कर सकेंगे और डेब्ट-टू-इक्विटी अनुपात पर भी सीमा तय की गई है। इसका उद्देश्य खतरे को कंट्रोल करते हुए बैंकिंग एक्टिविटी को बढ़ावा देना है।
नियामक का सीमित दखल
भारतीय स्टेट बैंक के बैंकिंग और इकोनॉमिक्स कॉन्क्लेव में बोलते हुए गवर्नर ने कहा कि कोई भी नियामक बोर्ड के निर्णय की जगह नहीं ले सकता। भारत जैसे देश में हर केस, हर लोन, हर डिपॉजिट और हर ट्रांजेक्शन अलग होता है। इसलिए, नियमों को वन साइज फिट्स ऑल की तरह लागू नहीं किया जा सकता। बैंकों को अपने मामलों के आधार पर निर्णय लेने की फ्रीडम दी जानी चाहिए।
सुपरवाइजरी कार्रवाई का लाभ
मल्होत्रा ने यह भी बताया कि भारतीय रिजर्व बैंक की सुपरवाइजरी कार्रवाई ने अनियंत्रित विकास को नियंत्रित करने और बैंकिंग सिस्टम को मजबूत, लचीला और सुरक्षित बनाने में मदद की है। उन्होंने कहा कि रिजर्व बैंक के पास रिस्क मैनेजमेंट, प्रोविजनिंग नियम और काउंटर साइक्लिकल बफर जैसे पर्याप्त उपकरण हैं, जो उभरते हुए खतरों को रोकने में सक्षम हैं।
आर्थिक अवसर और निवेश
विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से बैंकों के लिए अधिग्रहण और आईपीओ में निवेश आसान होगा, जिससे कंपनियों को फंडिंग उपलब्ध होगी और आर्थिक गतिविधियों में तेजी आएगी। वहीं, निवेशक और बैंक दोनों ही इससे नए अवसरों का लाभ उठा पाएंगे।


