सर्व कल्याण की उदात्त भावना यूसीसी

एक राष्ट्र, एक विधान और सर्व कल्याण की उदात्त भावना यूसीसी

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एक राष्ट्र, एक विधान और सर्व कल्याण की उदात्त भावना यूसीसी

​भारतीय वाङ्मय का अमर उद्घोष है—
“ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।”
यह मात्र कुछ शब्दों का समूह नहीं, बल्कि उस शाश्वत चेतना का विस्तार है, जिसमें संपूर्ण मानवता के कल्याण की कामना सन्निहित है। जब हम इस श्लोक की गहराई में उतरते हैं, तो पाते हैं कि इसमें किसी विशेष जाति, मत, पंथ, संप्रदाय या संकुचित समुदाय का लेशमात्र भी उल्लेख नहीं है। यह प्रार्थना उस निराकार सत्ता से है, जो समस्त चराचर जगत का आधार है, कि इस धरा पर रहने वाला प्रत्येक जीव सुखी हो, प्रत्येक मनुष्य व्याधियों से मुक्त रहे और हर नेत्र केवल शुभ और मंगलमय परिदृश्य का ही साक्षी बने। इस श्लोक का मूल स्वर यही है कि संसार में कोई भी व्यक्ति दुख का भागी न बने। वस्तुतः यही वह बीज विचार है, जो भारतीय संस्कारों की उर्वर भूमि पर ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के महान वटवृक्ष के रूप में पल्लवित हुआ है। जब हम पूरी पृथ्वी को एक परिवार के रूप में स्वीकार करते हैं, तभी हमारे भीतर वह उदारता जन्म लेती है जहाँ हम ‘स्व’ से ऊपर उठकर ‘सर्व’ के मंगल की कामना कर पाते हैं।
​इसी मंगलकारी अवधारणा का राजनीतिक और सामाजिक विस्तार हमें ‘रामराज्य’ की परिकल्पना में दिखाई देता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में जिस रामराज्य का चित्रण किया है, वह किसी धार्मिक संकीर्णता का प्रतीक नहीं, बल्कि एक आदर्श लोक कल्याणकारी राज्य का प्रतिमान है। उनके शब्द—
“दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज काहू नहीं व्यापा”।।
इस सत्य को उद्घाटित करते हैं कि एक आदर्श शासन व्यवस्था वह है जहाँ नागरिक को न तो शारीरिक व्याधियाँ सताएं, न प्राकृतिक आपदाएं विचलित करें और न ही भौतिक अभाव उसे पीड़ा दें। यहाँ भी रामराज्य का भाव पंथनिरपेक्ष है। वहां प्राथमिकता केवल नागरिक का सुख, उसकी प्रसन्नता और उसकी निरोगता है, जाति पंथ अथवा संप्रदाय नहीं। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में यदि हम इस दार्शनिक और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि को संवैधानिक धरातल पर देखें, तो ‘समान नागरिक संहिता’ यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) इसी सर्व कल्याणकारी भावना का वैधानिक स्वरूप है।
​समान नागरिक संहिता का मूल तत्व भी वही है जो हमारे प्राचीन श्लोकों में निहित है— समानता और न्याय। जिस प्रकार ईश्वर की दृष्टि में उसकी समस्त संतानें एक समान हैं, उसी प्रकार एक जीवंत लोकतंत्र में संविधान के समक्ष सभी नागरिक एक समान होने चाहिए। यह कानून किसी के विरुद्ध नहीं और ना ही किसी के पक्ष में है। यह एक ऐसी व्यवस्था की आधारशिला रखता है जहाँ मनुष्य और मनुष्य के बीच जन्म, विश्वास या परंपरा के आधार पर कोई कृत्रिम भेद न रहे। जब सभी नागरिकों को एक समान अधिकार प्राप्त होंगे और कानून की व्याख्या सबके लिए एक जैसी होगी, तभी वास्तव में एक समरस समाज का निर्माण संभव है। आपराधिक कानूनों में तो देश में पहले से ही समानता व्याप्त है, किंतु व्यक्तिगत कानूनों में एकरूपता न होना कहीं न कहीं सामाजिक न्याय की राह में अवरोध पैदा करता रहा है। समान नागरिक संहिता इसी विसंगति को दूर कर एक राष्ट्र, एक विधान के संकल्प को पूर्ण करती है।
​ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो समान नागरिक संहिता भारतीय जनसंघ और तत्पश्चात भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक अधिष्ठान का अभिन्न हिस्सा रही है। यह केवल एक राजनीतिक वादा नहीं, बल्कि एक राष्ट्र निर्माण का संकल्प रहा है। यह प्रतिबद्धता इस विश्वास पर आधारित है कि एक आधुनिक राष्ट्र में व्यक्तिगत पहचान से ऊपर राष्ट्रीय पहचान होनी चाहिए। आज जब हम मध्य प्रदेश शासन के हाल ही में लिए गए निर्णय को देखते हैं, जहाँ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की कैबिनेट ने इस संहिता को लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं, तो यह एक सुखद और संतोषजनक अनुभूति प्रदान करता है। मध्य प्रदेश को देश का हृदय प्रदेश कहा जाता है और जब हृदय से कोई स्वस्थ स्पंदन निकलता है, तो उसका सकारात्मक प्रभाव संपूर्ण शरीर पर पड़ना स्वाभाविक है। उत्तराखंड के बाद अब मध्य प्रदेश द्वारा इस दिशा में बढ़ाया गया कदम यह दर्शाता है कि भाजपा और एनडीए शासित राज्य सुशासन एवं समानता के इस एजेंडे को लेकर पूर्णतः स्पष्ट और गंभीर हैं।
​यद्यपि लोकतंत्र में असहमति का स्थान सदैव रहता है और कुछ वर्गों या विपक्षी दलों द्वारा इसकी आलोचना भी की जाती है, किंतु यदि हम एक निष्पक्ष नागरिक की दृष्टि से विचार करें, तो इसमें आपत्ति का कोई तार्किक आधार दिखाई नहीं देता। किसी भी प्रगतिशील सरकार का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वह अपने देश या प्रांत के सभी नागरिकों को एक समान धरातल प्रदान करे। जब नियम और कायदे सबके लिए एक होंगे, तो जाति, पंथ और धर्म के आधार पर पनपने वाली दूरियां स्वतः समाप्त होने लगेंगी। यह कानून भेदभाव की दीवारों को गिराकर सामाजिक एकता के पुल बनाने का कार्य करेगा। यह नारी शक्ति के सशक्तिकरण के लिए भी मील का पत्थर साबित होगा, क्योंकि व्यक्तिगत कानूनों की भिन्नता का सर्वाधिक प्रभाव अक्सर महिलाओं पर ही पड़ता है। एक समान कानून उन्हें सुरक्षा, सम्मान और समानता की गारंटी प्रदान करेगा।
​वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में यह स्पष्ट है कि समान नागरिक संहिता अब केवल एक चर्चा का विषय नहीं, बल्कि एक क्रियाशील वास्तविकता बनती जा रही है। देश के विभिन्न राज्यों में जिस प्रकार इसे प्राथमिकता दी जा रही है और आगामी चुनावों के एजेंडे में यह केंद्र बिंदु बनकर उभर रहा है, उससे यह विश्वास सुदृढ़ होता है कि भारत एक बड़े वैधानिक सुधार की ओर अग्रसर है। यह आशा करना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आने वाले समय में नई संसद के गठन के साथ ही समूचा राष्ट्र इस गौरवशाली संहिता को आत्मसात कर चुका होगा। समान नागरिक संहिता का लागू होना केवल कानूनी बदलाव नहीं है, बल्कि यह उस प्राचीन भारतीय चेतना का पुनर्जागरण है जो “सर्वे भवन्तु सुखिनः” के मंत्र के साथ सबको साथ लेकर चलने का आह्वान करती है। यह एक ऐसे भारत का मार्ग प्रशस्त करेगा जहाँ नागरिक की पहचान उसके धर्म या संप्रदाय से नहीं, बल्कि उसकी भारतीयता और कानून के प्रति उसकी समान जवाबदेही से होगी। अंततः, यह सर्वमंगल की वह कामना है जो भारत को पुनः विश्व गुरु के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखती है, जहाँ न्याय सबके लिए सुलभ हो और समानता सबके जीवन का आधार हो।

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