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केरल के वायनाड में भारी मानसूनी बारिश : कल्लाडी टनल प्रोजेक्ट के पास भीषण भूस्खलन, मलबे की चपेट में आने से 2 लोगों की मौत और 7 लापता

केरल देश/प्रदेश

एजेंसी, वायनाड। Wayanad Kalladi Landslide : दक्षिण भारत के राज्य केरल के पहाड़ी और भौगोलिक रूप से बेहद संवेदनशील वायनाड जिले से एक बार फिर प्राकृतिक आपदा की अत्यंत डरावनी और दुखद खबर सामने आई है। वायनाड के कल्लाडी में मंगलवार सुबह भारी मानसूनी बारिश के चलते एक बहुत बड़ा भूस्खलन यानी पहाड़ का हिस्सा टूटकर नीचे गिर गया। कल्लाडी स्थित मीनाक्षी ब्रिज के पास हुए इस भीषण हादसे में अब तक 2 लोगों की दर्दनाक मौत हो चुकी है, जबकि 8 लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। इसके साथ ही करीब 7 अन्य लोगों के मलबे के नीचे लापता होने की गंभीर सूचना है, जिनकी तलाश के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन को बेहद तेज कर दिया गया है। घटना के बाद स्थानीय जिला प्रशासन ने तत्परता दिखाते हुए प्रभावित पहाड़ी क्षेत्र के आसपास और निचले इलाकों में रहने वाले सैकड़ों परिवारों को एहतियातन और सुरक्षा के लिहाज से सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करना शुरू कर दिया है। पूरे इलाके में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश और बेहद खराब मौसम के बीच सेना, पुलिस और एनडीआरएफ की टीमें मलबे में दबे लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के प्रयास में जुटी हैं।

सीसीटीवी फुटेज में कैद हुआ खौफनाक मंजर, तिनके की तरह बहा भारी टैंकर

इस रूह कँपा देने वाले हादसे का एक लाइव सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है, जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। सीसीटीवी कैमरे के रिकॉर्ड के मुताबिक, यह घटना 7 जुलाई 2026 को सुबह ठीक 11 बजकर 15 मिनट पर घटित हुई। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि पहाड़ के ऊपर से अचानक मिट्टी और पानी की एक बेहद तेज और विशालकाय लहर नीचे की ओर आती है। इस मलबे के सैलाब की रफ्तार इतनी भयानक थी कि निर्माण स्थल पर खड़ा एक भारी-भरकम टैंकर और कई अन्य गाड़ियाँ पलक झपकते ही तिनके की तरह बह गईं। मलबे के इस हिंसक और तेज बहाव की चपेट में आने से वहां मौजूद सुरक्षा बैरिकेड और बड़े-बड़े पेड़ पूरी तरह से उखड़ गए। इस भयानक भूस्खलन के समय निर्माण स्थल के आसपास काम करने वाले कई लोग भी इसके मलबे में बह गए, जिससे वहां चारों तरफ चीख-पुकार मच गई।

कल्लाडी-मेप्पाडी मार्ग पूरी तरह अवरुद्ध, राहत शिविरों में भेजे गए लोग

स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों से प्राप्त ताजा जानकारी के अनुसार, इस अचानक हुए भयानक भूस्खलन के कारण कल्लाडी-मेप्पाडी को जोड़ने वाला मुख्य सड़क मार्ग पूरी तरह से मलबे और भारी पत्थरों की चपेट में आकर अवरुद्ध हो गया है। मुख्य मार्ग पर यातायात पूरी तरह ठप होने से राहत कर्मियों और भारी वाहनों को मौके पर पहुंचने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। किसी भी तरह के अगले बड़े और संभावित खतरे से स्थानीय नागरिकों के जीवन को सुरक्षित रखने के लिए कल्लाडी सुरंग के पास स्थित पूरी रिहाइशी बस्तियों और कॉलोनी के निवासियों को सेना और पुलिस की मदद से सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है। इन सभी प्रभावित ग्रामीणों को मेप्पाडी क्षेत्र में प्रशासन द्वारा आनन-फानन में बनाए गए अस्थाई राहत शिविरों में ठहराया गया है, जहां उनके लिए भोजन, पानी, दवाइयों और कपड़ों का पर्याप्त इंतजाम जिला प्रशासन द्वारा किया जा रहा है।

आपदा प्रभावित क्षेत्र में युद्धस्तर पर चलाया जा रहा है संयुक्त बचाव अभियान

हादसे की भयावहता को देखते हुए आपदा ग्रस्त भूस्खलन स्थल पर राष्ट्रीय आपदा मोचन बल यानी एनडीआरएफ, राज्य आपदा मोचन बल यानी एसडीआरएफ, फायर ब्रिगेड और बचाव सेवा, केरल पुलिस, वन विभाग के जांबाज कर्मियों और स्थानीय नागरिक स्वयंसेवकों की अनेक टीमें संयुक्त रूप से बेहद कठिन परिस्थितियों में बचाव कार्य में जुटी हुई हैं। इस मलबे की चपेट में आने से गंभीर रूप से घायल हुए 8 लोगों को स्थानीय लोगों और रेस्क्यू टीमों ने मिलकर सुरक्षित बाहर निकाला और नजदीकी सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया है, जहां डॉक्टरों की विशेष टीम उनकी देखरेख कर रही है। मिट्टी और विशाल पत्थरों के मलबे के नीचे और भी कई स्थानीय लोगों या मजदूरों के दबे होने की गंभीर आशंका बनी हुई है, जिसके मद्देनजर खोजी कुत्तों, भारी जेसीबी मशीनों और आधुनिक सेंसर टूल्स की मदद से मलबे को हटाने और जीवन बचाने का खोजी अभियान युद्धस्तर पर लगातार जारी है।

मुख्यमंत्री और आला अधिकारियों ने खुद संभाली कमान, चल रही है मॉनिटरिंग

वायनाड के इस गंभीर हादसे की संवेदनशीलता को देखते हुए स्थानीय जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी खुद ग्राउंड जीरो पर मौजूद रहकर पल-पल की स्थिति पर नजर रख रहे हैं। घटनास्थल पर स्थानीय विधायक आई. सी. बालकृष्णन, वायनाड जिला पंचायत अध्यक्ष चंद्रिका कृष्णन और जिला कलेक्टर डी. आर. मेघाश्री सहित कई बड़े अधिकारी भारी बारिश के बीच भी मौजूद हैं और राहत सामग्री के वितरण व बचाव कार्यों की कड़ी निगरानी कर रहे हैं। दूसरी ओर, राज्य के मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन ने तिरुवनंतपुरम में केरल राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण यानी केएसडीएमए के मुख्य नियंत्रण कक्ष का औचक दौरा किया। वहां उन्होंने राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक बेहद उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक की और वायनाड के हालात का जायजा लिया। इसके साथ ही गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने भी राज्य के सभी आपदा प्रबंधन विभागों को कड़े निर्देश जारी करते हुए इस रेस्क्यू ऑपरेशन में आधुनिक मशीनरी लगाने और उसे और ज्यादा गति देने की बात कही है।

टनल प्रोजेक्ट के इंजीनियरों ने हादसे को लेकर दी बड़ी तकनीकी सफाई

कल्लाडी सुरंग परियोजना स्थल पर तैनात मुख्य और ऑन-साइट तकनीकी इंजीनियरों ने इस हादसे के कारणों को लेकर स्थिति पूरी तरह साफ की है। अधिकारियों के अनुसार, यह पूरा हादसा कल्लाडी स्थित मलप्पपुरम-वायनाड टनल प्रोजेक्ट के कंस्ट्रक्शन साइट के पास हुआ है। प्रोजेक्ट के मुख्य इंजीनियर ने स्पष्ट किया कि आगामी मानसूनी सीजन और भारी बारिश की संभावनाओं को पहले से भांपते हुए प्रशासन के निर्देश पर 12 जून से ही टनल के भीतर सुरंग खोदने यानी ब्लास्टिंग का कोई भी काम पूरी तरह से बंद कर दिया गया था। सोमवार और मंगलवार को अत्यधिक बारिश के कारण निर्माण कार्य पूरी तरह रुका हुआ था। वहां केवल सुरंग की आंतरिक दीवारों को मजबूत करने और मजदूरों की सुरक्षा से जुड़े कंक्रीट के जरूरी मेंटेनेंस कार्य ही चल रहे थे। सोमवार को जब यह हादसा हुआ, तब परियोजना के करीब 15 कुशल श्रमिक निर्धारित मलबा निस्तारण स्थल पर पत्थरों से युक्त एक भारी जालीदार सुरक्षा दीवार जिसे तकनीकी भाषा में गेबियन दीवार कहा जाता है, उसके निर्माण कार्य में व्यस्त थे।

निर्माण सीमा से बाहर हुआ भूस्खलन, मलबे की चपेट में आया साइट ऑफिस

साइट पर मौजूद एक प्रत्यक्षदर्शी इंजीनियर ने बताया कि यह भीषण भूस्खलन मुख्य सुरंग या हमारी सक्रिय निर्माण सीमा के भीतर से शुरू नहीं हुआ था। वास्तव में, सुरंग की खुदाई के दौरान जो मिट्टी बाहर निकाली गई थी, उसे टनल प्रोजेक्ट के तहत एक निर्धारित स्थान पर जमा किया गया था। लगातार हो रही मूसलाधार बारिश के चलते वही जमा की गई गीली मिट्टी अचानक खिसक गई। निर्धारित सरकारी निर्माण सीमा से काफी बाहर, पहाड़ के सबसे बाईं ओर स्थित एक प्राकृतिक खड़ी ढलान पर महज कुछ ही सेकंड के भीतर पूरी मिट्टी धंस गई और यह भयानक हादसा हो गया। पहाड़ से टूटा हजारों टन मलबा बेहद तेज रफ्तार से नीचे की ओर बहा और सीधे मीनाक्षी पुल की तरफ बढ़ गया। मीनाक्षी पुल के दूसरी ओर तैनात हमारी मुख्य तकनीकी टीम और हैवी मशीन ऑपरेटर समय रहते सुरक्षित पीछे हट गए, लेकिन अचानक आए मलबे के इस बेहद तेज और हिंसक बहाव में वहां संचालित हो रहा प्रोजेक्ट का एक अस्थाई साइट कार्यालय, वहां खड़ी गाड़ियां और कुछ अन्य लोग पूरी तरह इसकी चपेट में आ गए।

जानिए क्या है अरबों रुपए का मलप्पपुरम-वायनाड टनल प्रोजेक्ट

वायनाड में जिस कल्लाडी साइट पर यह भयानक हादसा हुआ है, वह केरल सरकार की एक बेहद महत्वाकांक्षी बुनियादी ढांचा परियोजना का हिस्सा है। मलप्पपुरम-वायनाड टनल प्रोजेक्ट के तहत केरल के मलप्पपुरम जिले को वायनाड जिले से एक आधुनिक और विशाल भूमिगत सुरंग के जरिए आपस में जोड़ना है। इस कूटनीतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण टनल की कुल लंबाई लगभग 8.17 किमी निर्धारित की गई है। इस पूरी महत्वाकांक्षी बुनियादी ढांचा परियोजना को तैयार करने में करीब 2100 से 2200 करोड़ रुपए की भारी-भरकम लागत आने का अनुमान लगाया गया है। इस सुरंग के बन जाने से दोनों पहाड़ी जिलों के बीच की दूरी और यात्रा के समय में भारी कमी आएगी, लेकिन पर्यावरणविदों द्वारा इस बेहद संवेदनशील पश्चिमी घाट के इलाके में इतने बड़े पैमाने पर की जा रही खुदाई और टनल निर्माण को लेकर लगातार चिंताएं भी जताई जाती रही हैं।

वायनाड का अनोखा भूगोल और मानसून की अरब सागर वाली शाखा का प्रभाव

भौगोलिक दृष्टि से देखें तो वायनाड जिला केरल के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित है, जो केरल का एकमात्र मुख्य पठारी इलाका माना जाता है। पठारी इलाका होने का मतलब यह है कि यह पूरी जमीन मिट्टी, बड़े पत्थरों और उसके ऊपर उगे घने पेड़-पौधों के ऊंचे-नीचे टीलों और ढलानों से मिलकर बनी है। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया यानी जीएसआई की 2021 की एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक रिपोर्ट के मुताबिक, केरल का लगभग 43% भूभाग भूस्खलन के प्रति संवेदनशील और अत्यधिक प्रभावित क्षेत्र की श्रेणी में आता है। विशेष रूप से वायनाड की बात करें तो इसकी 51% से अधिक जमीन पूरी तरह से खड़ी पहाड़ी ढलानों पर स्थित है, जिसके कारण यहां भारी बारिश के दौरान लैंडस्लाइड की संभावना हमेशा चरम पर बनी रहती है। वायनाड का यह खूबसूरत पठार पश्चिमी घाट यानी वेस्टर्न घाट की पर्वत श्रृंखलाओं में समुद्र तल से करीब 700 से 2100 मीटर की ऊंचाई पर बसा हुआ है। मानसून के मौसम में जब अरब सागर से उठने वाली मानसूनी हवाओं की शाखा देश के इन वेस्टर्न घाट के ऊंचे पहाड़ों से टकराकर ऊपर उठती है, तो इस पूरे इलाके में अचानक अत्यंत भीषण और मूसलाधार बारिश शुरू हो जाती है। इसके अलावा, वायनाड में बहने वाली प्रसिद्ध काबिनी नदी की सहायक नदी मनंतावडी, जो ‘थोंडारमुडी’ चोटी से निकलती है, भूस्खलन के मलबे के कारण अचानक अवरुद्ध हो जाती है और इसी नदी में आई अचानक बाढ़ के पानी से निचले इलाकों में भारी तबाही और जान-माल का नुकसान देखने को मिलता है।

दो साल पहले 2024 में वायनाड ने झेला था इतिहास का सबसे भयानक लैंडस्लाइड

वायनाड के स्थानीय निवासियों के लिए भूस्खलन का यह दर्द कोई नया नहीं है। ठीक 2 साल पहले, यानी 30 जुलाई 2024 को वायनाड जिले ने अपने इतिहास की सबसे भीषण और डरावनी प्राकृतिक आपदा का सामना किया था। उस दौरान रात के करीब 2 बजे से सुबह 4 बजे के बीच, जब लोग गहरी नींद में सो रहे थे, तब मुंडक्कई, चूरलमाला, अट्टामाला और नूलपुझा जैसे खूबसूरत पहाड़ी गांवों में एक के बाद एक तीन विनाशकारी भूस्खलन हुए थे। पहाड़ टूटने से आए मलबे और पत्थरों के सैलाब ने पूरे के पूरे गांवों का नामोनिशान मिटा दिया था और उस ऐतिहासिक हादसे में 400 से अधिक मासूम लोगों की मलबे में दबकर दर्दनाक मौत हो गई थी। इससे पहले साल 2019 में भी भारी मानसूनी बारिश के कारण इन्हीं संवेदनशील इलाकों में भयानक भूस्खलन हो चुका है, जिसमें करीब 17 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी और 52 से ज्यादा परिवार पूरी तरह बेघर हो गए थे। दो साल पहले की उस भयानक त्रासदी के जख्म अभी पूरी तरह भरे भी नहीं थे कि कल्लाडी के इस नए हादसे ने लोगों के दिलों में एक बार फिर पुराने खौफ को जिंदा कर दिया है।

भारत का लगभग 12.6% भूभाग लैंडस्लाइड के डेंजर जोन में शामिल

भूवैज्ञानिकों और सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस प्राकृतिक आपदा के प्रति संवेदनशील है। पूरे भारत देश का करीब 12.6% भूभाग, जो लगभग 4.2 लाख वर्ग किमी के विशाल क्षेत्र के बराबर है, पूरी तरह से लैंडस्लाइड संभावित क्षेत्र यानी डेंजर जोन के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है। भारत में विशाल हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएं और दक्षिण-पश्चिम के पश्चिमी घाट देश के सबसे ज्यादा संवेदनशील और खतरनाक भूस्खलन क्षेत्रों में गिने जाते हैं। देश में जून से सितंबर के महीनों के दौरान यानी मानसून सीजन के वक्त सबसे ज्यादा भूस्खलन की घटनाएं दर्ज की जाती हैं, जिनमें से 80% से अधिक लैंडस्लाइड केवल और केवल अत्यधिक भारी बारिश के कारण होते हैं। इसके अलावा, इंसानों द्वारा पहाड़ों को काटकर बनाई जा रही सड़कें, सुरंगे, बांध, अवैध खनन और जंगलों की अंधाधुंध कटाई जैसी मानवीय और अनियोजित गतिविधियां भी पहाड़ों को कमजोर कर भूस्खलन के खतरे को कई गुना बढ़ा देती हैं। भारत में केरल, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग इलाका इस आपदा से सबसे अधिक प्रभावित राज्यों की सूची में शामिल हैं, जहां हर साल सैकड़ों नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। इस खतरे से निपटने के लिए भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी जीएसआई देश भर के संवेदनशील पहाड़ी राज्यों का एक विस्तृत ‘लैंडस्लाइड सस्प्टिबिलिटी मैप’ तैयार करता है, ताकि इन खतरनाक क्षेत्रों की पहले से पहचान कर आपदा से पहले ही स्थानीय प्रशासन को सटीक चेतावनी जारी की जा सके।

संकट की इस घड़ी में कांग्रेस पीड़ितों के साथ खड़ी: सांसद प्रियंका गांधी

इस बीच, कांग्रेस पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव और वायनाड से नवनिर्वाचित सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने अपने संसदीय क्षेत्र केरल के वायनाड में हुए इस भीषण भूस्खलन पर गहरा दुख और चिंता व्यक्त की है। उन्होंने नई दिल्ली से जारी अपने विशेष बयान में कहा कि मलबे में फंसे मासूम नागरिकों और श्रमिकों को सुरक्षित और सकुशल बाहर निकालने के लिए प्रशासन द्वारा युद्धस्तर पर व्यापक राहत और बचाव अभियान चलाया जा रहा है। इस पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन की निगरानी स्वयं राज्य के मुख्यमंत्री कर रहे हैं जो एक बड़ी राहत की बात है। श्रीमती वाड्रा ने इस दर्दनाक हादसे में अपने प्रियजनों और घरों को खोने वाले पीड़ित परिवारों के प्रति अपनी गहरी मानवीय संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि दुख और संकट की इस बेहद कठिन घड़ी में कांग्रेस पार्टी पूरी मजबूती के साथ प्रभावित पीड़ितों के साथ खड़ी है और हर संभव वित्तीय व सामाजिक सहायता पीड़ितों को उपलब्ध कराई जाएगी।

यूडीएफ कार्यकर्ताओं से प्रियंका गांधी ने की प्रशासन की मदद करने की भावुक अपील

सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने ईश्वर से मलबे में लापता हुए सभी 7 लोगों के सकुशल और जीवित मिलने की प्रार्थना की है। इसके साथ ही उन्होंने अपनी पार्टी के स्थानीय कैडर और संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा यानी यूडीएफ के सभी कार्यकर्ताओं, स्थानीय पदाधिकारियों और आम प्रबुद्ध नागरिकों से एक भावुक अपील की है। उन्होंने कहा कि सभी कार्यकर्ता राजनीति से ऊपर उठकर तुरंत जमीन पर उतरें और बिना किसी व्यवधान या बाधा के आपदा प्रभावित लोगों तक भोजन, पानी और चिकित्सा सहायता पहुंचाने में स्थानीय प्रशासन और एनडीआरएफ की टीमों का पूरा सहयोग करें। उन्होंने कार्यकर्ताओं को कड़े निर्देश दिए कि वे सरकारी गाइडलाइंस और सुरक्षा प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन करते हुए प्रभावित परिवारों को राहत शिविरों में व्यवस्थित करने में जिला कलेक्टर की टीम की हर संभव मदद करें ताकि किसी भी पीड़ित को परेशानी का सामना न करना पड़े।

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