Vikram-1

भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान का स्वर्णिम युग : देश के पहले निजी रॉकेट ‘विक्रम-1’ ने श्रीहरिकोटा से भरी ऐतिहासिक उड़ान, इसरो ने भी किया 7 नए मिशनों का बड़ा ऐलान

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एजेंसी, श्रीहरिकोटा। Vikram-1 rocket launch : भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान के इतिहास में 18 जुलाई 2026 का दिन एक नए स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है। देश के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र ने एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक छलांग लगाते हुए अपने पहले पूर्ण व्यावसायिक ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ का सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सफल प्रक्षेपण कर दिया है। हैदराबाद स्थित निजी स्पेस स्टार्टअप कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा विकसित किए गए इस अत्याधुनिक रॉकेट के प्रक्षेपण अभियान को ‘आगमन’ नाम दिया गया था। इस ऐतिहासिक मिशन की सबसे बड़ी कामयाबी यह रही कि इतिहास में पहली बार किसी भारतीय निजी एयरोस्पेस कंपनी द्वारा पूरी तरह तैयार किए गए रॉकेट ने विभिन्न उपग्रहों को पृथ्वी की वास्तविक कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित करने के गौरव को प्राप्त किया है। यह अनूठी सफलता वर्ष 2020 में भारत सरकार द्वारा अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में किए गए युगांतरकारी सुधारों और निजी निवेश की नीतियों का एक प्रत्यक्ष और सबसे बड़ा परिणाम माना जा रहा है।

पूरी तरह कार्बन कंपोजिट तकनीक और आधुनिक चार चरणों वाली प्रणाली से लैस रॉकेट

तकनीकी दृष्टिकोण से देखा जाए तो ‘विक्रम-1’ अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में एक अद्भुत और बेमिसाल इंजीनियरिंग का सटीक उदाहरण है। स्काईरूट एयरोस्पेस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पवन कुमार चंदाना के अनुसार, यह पूरी दुनिया का पहला ऐसा शक्तिशाली ऑर्बिटल रॉकेट है, जिसके बाहरी और आंतरिक ढांचे का निर्माण पूर्ण रूप से हल्के कार्बन कंपोजिट मैटेरियल से किया गया है। यह विशेष सामग्री परंपरागत रूप से इस्तेमाल होने वाले स्टील की तुलना में लगभग 5 गुना तक हल्की होती है, जिसकी वजह से रॉकेट का कुल द्रव्यमान काफी कम हो जाता है और उसकी पेलोड ले जाने की क्षमता तथा ईंधन दक्षता में भारी इजाफा होता है। यह आधुनिक रॉकेट कुल चार चरणों वाली उन्नत लॉन्च व्हीकल प्रणाली पर काम करता है, जिसमें प्रारंभिक तीन चरणों में अत्यधिक ऊर्जा वाले ठोस ईंधन (सॉलिड फ्यूल) का प्रयोग किया गया है, जबकि इसके सबसे ऊपरी यानी चौथे चरण में एक विशेष लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल लगाया गया है जिसे अंतरिक्ष में दोबारा भी चालू किया जा सकता है। यह अद्भुत तकनीक 350 किलोग्राम तक के छोटे उपग्रहों को पृथ्वी की सतह से लगभग 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित लो-अर्थ ऑर्बिट में अत्यधिक सटीकता के साथ स्थापित करने में सक्षम है।

अंतरिक्ष में तीन महान भारतीय वैज्ञानिकों को अनूठी कलात्मक श्रद्धांजलि

इस ऐतिहासिक अंतरिक्ष अभियान में व्यावसायिक उपग्रहों को उनकी मंजिल तक पहुंचाने के साथ-साथ भारत के महान वैज्ञानिक गौरव को भी एक बेहद अनोखे अंदाज में सलाम किया गया है। रॉकेट के भीतर भारत के तीन सबसे महान और दिग्गज वैज्ञानिकों की बेहद सूक्ष्म माइक्रो मूर्तियां भी अंतरिक्ष के सफर पर भेजी गई हैं। इस गौरवशाली सूची में भारत के प्रथम विज्ञान नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. सी.वी. रमन, भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के परम जनक डॉ. विक्रम साराभाई और देश के मिसाइल मैन व पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम शामिल हैं। इन सूक्ष्म कलाकृतियों का आकार महज 800 माइक्रोन यानी 0.8 मिलीमीटर के बराबर है, जो कि वास्तव में चावल के एक छोटे से दाने से भी कम है और इन्हें सामान्य मानवीय आंखों से देखना नामुमकिन है। तेलंगाना राज्य के वारंगल जिले के निवासी और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त माइक्रो आर्टिस्ट अजय कुमार मत्तेवाड़ा ने वर्ष 2023 से शुरू करके लगातार 140 घंटों से अधिक की बेहद कठिन और बारीक मेहनत के बाद इन मूर्तियों को तैयार किया है। इनके निर्माण में स्टेनलेस स्टील, शुद्ध चांदी, 24 कैरेट शुद्ध सोना, सिरेमिक पाउडर और मजबूत कार्बन फाइबर का उपयोग किया गया है, जिन्हें बाद में 18 कैरेट सोने से बने एक बेहद सुंदर छोटे रॉकेट मॉडल के अंदर सुरक्षित रूप से स्थापित करके अंतरिक्ष भेजा गया है।

इसरो के पूर्व इंजीनियरों का सपना और स्काईरूट एयरोस्पेस की प्रेरक कहानी

इस ऐतिहासिक कामयाबी के पीछे भारत के दो युवा और प्रतिभावान पूर्व इसरो वैज्ञानिकों की दूरदर्शी सोच और वर्षों की कठिन तपस्या छिपी हुई है। स्काईरूट एयरोस्पेस कंपनी की नींव वर्ष 2018 में पवन कुमार चंदाना और नागा भरत डाका ने रखी थी, जो पहले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में एक वैज्ञानिक के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके थे। वर्ष 2020 में जब केंद्र सरकार ने अंतरिक्ष के बंद दरवाजों को देश की निजी प्रतिभाओं के लिए पूरी तरह खोला, तो इन दोनों युवा उद्यमियों ने अपने पुराने अनुभवों का इस्तेमाल करते हुए देश का पहला निजी सब-ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-एस’ वर्ष 2022 में लॉन्च करके अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया था। अब 2026 में किया गया यह सफल ऑर्बिटल मिशन उनके इसी लंबे सफर का सबसे शानदार और ऐतिहासिक परिणाम है, जो भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान दिलाएगा।

इसरो प्रमुख का बड़ा ऐलान: चालू वित्त वर्ष में अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे 7 नए मिशन

‘विक्रम-1’ के इस शानदार और सफल प्रक्षेपण के तुरंत बाद आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के अध्यक्ष वी. नारायणन ने देशवासियों को एक और बड़ी खुशखबरी दी है। इसरो प्रमुख ने आधिकारिक घोषणा करते हुए बताया कि भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ने चालू वित्तीय वर्ष के भीतर कम से कम 7 बड़े स्पेस लॉन्च करने का एक अत्यंत महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। उन्होंने बताया कि इस कड़ी का अगला अत्यंत महत्वपूर्ण मिशन आगामी 2 महीनों के भीतर ही अंतरिक्ष के लिए रवाना होने के लिए पूरी तरह तैयार है। इसरो प्रमुख के अनुसार, वर्तमान में दो महत्वपूर्ण उपग्रह पूरी तरह से तैयार होकर लॉन्च पैड की ओर बढ़ने के लिए तैयार हैं, जबकि 5 से 6 अन्य उपग्रहों के एकीकरण (इंटीग्रेशन) और अंतिम परीक्षण का काम वैज्ञानिकों की देखरेख में बहुत तेजी से पूरा किया जा रहा है।

गगनयान का पहला बिना चालक दल वाला मिशन और ‘भारत 2047’ का महासंकल्प

इसरो प्रमुख वी. नारायणन ने आगामी अंतरिक्ष कार्यक्रमों की रूपरेखा साझा करते हुए बताया कि आने वाले इन 7 बड़े मिशनों में भारत के सबसे प्रतिष्ठित मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम ‘गगनयान’ के तहत पहला बिना चालक दल वाला (अनक्रूड) अंतरिक्ष मिशन भी शामिल है, जो भारत के अंतरिक्ष यात्रियों को भविष्य में ब्रह्मांड में भेजने का रास्ता साफ करेगा। उन्होंने स्काईरूट एयरोस्पेस की इस ऐतिहासिक कामयाबी पर बेहद भावुक होते हुए कहा कि इस निजी कंपनी की युवा टीम के सदस्यों की औसत आयु महज 28 वर्ष के आसपास है और उन्होंने अपने पहले ही प्रयास में सफलता का परचम लहराकर देश का नाम रोशन किया है। उन्होंने स्काईरूट की इस बड़ी जीत को ‘भारत 2047’ के विकसित राष्ट्र के विजन को मजबूत करने वाला एक सबसे सशक्त कदम बताया। इसरो प्रमुख ने कहा कि अपने ही पुराने वैज्ञानिकों को इस तरह निजी क्षेत्र में इतिहास रचते देखना संगठन के लिए बिल्कुल वैसा ही गौरवमयी अहसास है, जैसा कि कोई माता-पिता अपने बच्चों की बड़ी सफलताओं को देखकर महसूस करते हैं।

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