Rajya Sabha

मॉनसून सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक में भारी हंगामा और वॉकआउट, राज्यसभा में वंदे मातरम बिल पेश करने की तैयारी में सरकार

नई दिल्ली राष्ट्रीय

एजेंसी, नई दिल्ली। Vande Mataram Bill Rajya Sabha : संसद के आगामी मॉनसून सत्र की औपचारिक शुरुआत से ठीक एक दिन पहले देश की राजधानी में सियासी हलचल चरम पर पहुंच गई है। रविवार को संसद भवन के ऐतिहासिक एनेक्सी भवन में सरकार की ओर से एक महत्वपूर्ण सर्वदलीय बैठक का आयोजन किया गया। लगभग 3 घंटे तक चली इस उच्च स्तरीय बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की। इस रणनीतिक बैठक में देश के 40 अलग-अलग राजनीतिक दलों के लगभग 58 वरिष्ठ नेताओं ने हिस्सा लिया, जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। हालांकि, यह बैठक शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न नहीं हो सकी और बैठक के बीच में ही विपक्षी दलों ने एक बड़ा प्रतीकात्मक वॉकआउट करके सरकार के प्रति अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया। विपक्ष के इस आक्रामक रुख से साफ है कि आने वाले दिनों में संसद के भीतर सरकार और विपक्ष के बीच जोरदार टकराव देखने को मिलेगा।

बागी सांसदों को न्योता देने पर भड़का समूचा विपक्ष

सर्वदलीय बैठक के दौरान उस समय भारी गतिरोध पैदा हो गया जब ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की वरिष्ठ सांसद महुआ मोइत्रा ने बैठक में शामिल कुछ चेहरों पर तीखी आपत्ति जताई। विपक्ष की नाराजगी इस बात को लेकर थी कि संसदीय कार्य मंत्रालय ने तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए 20 बागी सांसदों के नए गुट को इस बैठक में किस आधार पर आमंत्रित किया। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अभी तक इस नए गुट को आधिकारिक तौर पर एक अलग दल के रूप में पूर्ण मान्यता प्रदान नहीं की है। जब तक सदन के नियमों के तहत इन सांसदों की स्थिति स्पष्ट नहीं हो जाती, तब तक उन्हें सर्वदलीय बैठक जैसी महत्वपूर्ण चर्चा में शामिल करना संसदीय परंपराओं के खिलाफ है। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके, आम आदमी पार्टी, वामपंथी दलों और शिवसेना (यूबीटी) सहित पूरे एकजुट विपक्ष ने बैठक का सामूहिक बहिष्कार कर दिया।

दलबदल कानून और सांसदों की अयोग्यता पर खड़े हुए सवाल

महुआ मोइत्रा ने बैठक में आधिकारिक कागजातों का हवाला देते हुए कहा कि लोकसभा की सूची में अभी भी अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों की कुल संख्या 28 दर्ज है। उन्होंने सवाल उठाया कि 91वें संविधान संशोधन के कड़े प्रावधानों के लागू होने के बाद सदन में किसी भी तरह के छोटे बागी गुट के अस्तित्व की कोई कानूनी गुंजाइश नहीं बचती है। टीएमसी के इन 20 बागी सांसदों ने खुद को नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया नाम के एक नए दल से संबद्ध बताया है, लेकिन मूल पार्टी से अलग होने के बाद उनके खिलाफ दायर की गई अयोग्यता की याचिकाएं अभी भी अध्यक्ष के पास लंबित हैं। विपक्ष का आरोप है कि नियमों को ताक पर रखकर इन बागी सदस्यों को बैठक में बुलाना लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन है। दूसरी ओर, बागी गुट के नेता सुदीप बंदोपाध्याय का कहना है कि वे अब एक नई राजनीतिक ताकत के रूप में उभरे हैं और बंगाल से बाहर अपनी पहचान बना रहे हैं, इसलिए उन्हें बैठक में अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है।

संसदीय कार्य मंत्री ने दिया सरकार का पक्ष

इस पूरे विवाद और विपक्ष के वॉकआउट पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सरकार के रुख को पूरी तरह स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि भारतीय संसद और उसके सदन देश के सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों के हैं। चूंकि 20 लोकसभा सांसदों के एक बड़े समूह ने बकायदा हस्ताक्षर करके लोकसभा अध्यक्ष को एक आवेदन सौंपा है, जिसमें उन्होंने नए दल के रूप में मान्यता देने और सदन में अलग बैठने की व्यवस्था करने की मांग की है, इसलिए सरकार उनके वजूद को नजरअंदाज नहीं कर सकती। उन्होंने तर्क दिया कि जब कोई मामला अध्यक्ष के विचाराधीन होता है और सांसदों का एक बड़ा वर्ग सदन का हिस्सा होता है, तो उन्हें चर्चा से बाहर नहीं रखा जा सकता। संसद में किसी भी विषय पर आम सहमति बनाने के लिए सभी पक्षों से बातचीत करना सरकार का प्राथमिक दायित्व है।

लोकसभा अध्यक्ष ने बदला बागी सांसदों का सीट नंबर

इस सियासी घमासान के बीच पर्दे के पीछे प्रशासनिक बदलाव भी तेजी से लागू किए गए हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का साथ छोड़कर एनडीए के पाले में जाने वाले टीएमसी के इन 20 बागी सांसदों को लोकसभा में अलग बैठने की अनुमति दे दी गई है। इन सांसदों ने 15 जून 2026 को नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में अपने गुट का विलय कर लिया था। रविवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बागी नेता सुदीप बंद्योपाध्याय के पुराने अनुरोध को स्वीकार करते हुए एक बड़ा प्रशासनिक आदेश जारी किया। इसके तहत संसद के लोकसभा कक्ष में इन सांसदों का पुराना सीट नंबर 280 बदलकर अब नया सीट नंबर 354 आवंटित कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त, महाराष्ट्र की राजनीति से जुड़े उद्धव ठाकरे गुट के 6 बागी सांसदों को भी एकनाथ शिंदे गुट के साथ बैठने की मंजूरी मिल गई है, जिससे सदन के भीतर की पूरी भौगोलिक व्यवस्था बदल गई है।

महाराष्ट्र और बंगाल में बगावत से बढ़ा एनडीए का कुनबा

संसद के भीतर चल रहे इस घटनाक्रम की नींव पिछले कुछ महीनों में हुई बड़ी राजनीतिक उठापटक में छिपी है। 22 जून को महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना को तब बड़ा झटका लगा जब उनके कुल 9 लोकसभा सांसदों में से 6 सांसदों ने पाला बदल लिया और मुंबई में एक भव्य प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली असली शिवसेना में शामिल होने की घोषणा की। इस बदलाव के बाद लोकसभा में शिंदे गुट के सांसदों की ताकत 7 से बढ़कर सीधे 13 हो गई। वहीं दूसरी तरफ, 8 जून को पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने एकजुट होकर केंद्र की एनडीए सरकार को अपना बिना शर्त समर्थन देने का ऐलान किया था। इन बागी सांसदों ने त्रिपुरा और बंगाल में पंजीकृत पार्टी एनसीपीआई का दामन थाम लिया, जिससे सत्ताधारी गठबंधन को एक बहुत बड़ा रणनीतिक लाभ मिला है।

बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की बैठक में विधेयकों का समय निर्धारित

सर्वदलीय बैठक के तुरंत बाद संसद परिसर में लोकसभा की बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की एक और महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में मॉनसून सत्र के दौरान पेश किए जाने वाले विभिन्न महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा और बहस के लिए समय का निर्धारण किया गया। संसदीय कार्य मंत्री ने बताया कि नए नियमों के तहत एफसीआरए संशोधन बिल पर चर्चा के लिए 4 घंटे का समय तय किया गया है। इसके अलावा आयकर संशोधन बिल के लिए 4 घंटे, देश की अदालतों में जजों की संख्या में वृद्धि से जुड़े बिल के लिए 4 घंटे, जन्म-मृत्यु पंजीकरण संशोधन बिल के लिए 4 घंटे और एमएसएमई क्षेत्र को राहत देने वाले बिल पर विस्तृत बहस के लिए 5 घंटे का समय आवंटित किया गया है। संसद का यह मॉनसून सत्र 20 जुलाई से प्रारंभ होकर 13 अगस्त तक निरंतर चलेगा, जिसके दौरान कुल 19 कार्यदिवस तय किए गए हैं। इस सत्र के पहले ही दिन गृह मंत्री अमित शाह राज्यसभा में देश की अस्मिता से जुड़ा बेहद संवेदनशील वंदे मातरम बिल पेश करने वाले हैं, जिस पर चर्चा के लिए 4 घंटे निर्धारित हैं।

संविधान संशोधन के दो-तिहाई बहुमत के करीब पहुंची मोदी सरकार

तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना के बागी धड़ों के समर्थन के बाद संसद के दोनों सदनों में मोदी सरकार की स्थिति पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हो गई है। सरकार अब उस जादुई दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े के बेहद करीब पहुंच रही है, जो देश में किसी भी बड़े संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए कानूनी रूप से अनिवार्य होता है। सरकार का मुख्य लक्ष्य महिला आरक्षण कानून को पूरी तरह जमीन पर उतारना और परिसीमन विधेयक के माध्यम से देश भर की संसद और विधानसभा सीटों की संख्या में बढ़ोतरी करना है। गौरतलब है कि अप्रैल के विशेष सत्र में आवश्यक संख्या बल न होने के कारण सरकार के ये प्रयास विफल हो गए थे, जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संकल्प जताया था कि वे भविष्य में इस आंकड़े को जरूर हासिल करेंगे। पिछले कुछ महीनों में विपक्ष की 4 बड़ी पार्टियों के कुल 37 सांसदों के पाला बदलने से सत्ता पक्ष का हौसला काफी बुलंद हुआ है।

लोकसभा और राज्यसभा में आंकड़ों का नया गणित

अगर मौजूदा संख्या बल पर नजर डालें, तो वर्ष 2024 के आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने अकेले 240 सीटें जीती थीं और सहयोगियों को मिलाकर यह आंकड़ा 292 तक पहुंचा था। लेकिन 14 जून 2026 को टीएमसी के 20 सांसदों और उसके बाद शिवसेना के 6 सांसदों के एनडीए के सहयोगी दलों में शामिल होने से लोकसभा में सत्ता पक्ष का कुल आंकड़ा बढ़कर अब 318 तक पहुंच गया है। वर्तमान में देश की 3 लोकसभा सीटें रिक्त हैं, जिसके चलते सदन में अधिकतम 540 सांसद ही मतदान कर सकते हैं। इस स्थिति में दो-तिहाई बहुमत के लिए आवश्यक 360 के आंकड़े से एनडीए गठबंधन अब केवल 42 वोट पीछे रह गया है। वहीं दूसरी ओर, राज्यसभा में भी अप्रैल 2026 में आम आदमी पार्टी के 7 सांसदों और जुलाई में टीएमसी के 3 बड़े सांसदों के बीजेपी में शामिल होने के बाद एनडीए की सदस्य संख्या बढ़कर 152 हो गई है। उच्च सदन में दो-तिहाई बहुमत के लिए 163 मतों की आवश्यकता होती है, जिससे सरकार अब मात्र 11 कदम दूर है। टीएमसी की एक और सांसद कोयल मलिक के इस्तीफे के बाद राज्यसभा का यह समीकरण सरकार के लिए और भी अनुकूल होने की उम्मीद है।

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