एजेंसी, न्यूयॉर्क। UNSC Ban : संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से पाकिस्तान और चीन के कूटनीतिक गठबंधन को एक बहुत बड़ा और तगड़ा झटका लगा है। वैश्विक मंच पर भारत और अन्य देशों के खिलाफ आतंकवाद का खेल खेलने वाले इन दोनों देशों की एक बड़ी चाल पूरी तरह से नाकाम हो गई है। दरअसल, अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने सुरक्षा परिषद में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी यानी बीएलए और उसकी आत्मघाती शाखा मजीद ब्रिगेड पर प्रतिबंध लगाने के पाकिस्तान और चीन के एक साझा प्रस्ताव को पूरी तरह से ठंडे बस्ते में डाल दिया है। पाकिस्तान और चीन ने पिछले साल सितंबर के महीने में सुरक्षा परिषद के सामने एक संयुक्त प्रस्ताव पेश किया था। इस प्रस्ताव के तहत वे चाहते थे कि परिषद की 1267 अलकायदा प्रतिबंध समिति के माध्यम से बीएलए और मजीद ब्रिगेड को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया जाए और उन पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए जाएं। लेकिन दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों में शुमार अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन ने इस महीने इस पूरी कोशिश पर पानी फेरते हुए इस प्रस्ताव को आगे बढ़ने से रोक दिया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ये तीनों ही देश सुरक्षा परिषद के ऐसे स्थायी सदस्य हैं जिनके पास वीटो की असीमित शक्ति है और इनके फैसले को कोई बदल नहीं सकता।
कूटनीतिक मोर्चे पर बुरी तरह लड़खड़ाया पाकिस्तान और चीन का गठजोड़
संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि आसिम इफ्तिखार अहमद ने इस प्रस्ताव को लेकर सुरक्षा परिषद की बैठक में काफी वकालत की थी। पाकिस्तानी प्रतिनिधि का कहना था कि आईएसआईएल-के, अलकायदा, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट के साथ-साथ बीएलए और मजीद ब्रिगेड जैसे संगठन पड़ोसी देश अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल कर रहे हैं। पाकिस्तानी अधिकारी ने दावा किया था कि अफगानिस्तान में ऐसे साठ से भी अधिक आतंकवादी ठिकाने और शिविर सक्रिय हैं, जहाँ से लगातार सीमा पार घुसपैठ और हिंसक हमलों को अंजाम दिया जा रहा है। पाकिस्तान की इस छटपटाहट के पीछे मुख्य वजह यह है कि बलूचिस्तान के ये संगठन चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी सीपीईसी की परियोजनाओं और वहां काम करने वाले चीनी नागरिकों को लगातार अपना निशाना बना रहे हैं, जिससे चीन का अरबों डॉलर का निवेश खतरे में पड़ गया है। इसी डर के कारण चीन और पाकिस्तान ने मिलकर इस बार सुरक्षा परिषद में गुहार लगाई थी कि इन संगठनों की आतंकी गतिविधियों को रोकने के लिए वैश्विक स्तर पर तुरंत और सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए।
चीन के पुराने रवैये पर दुनिया ने सिखाया सबक
पाकिस्तानी प्रतिनिधि अहमद ने बैठक में बड़े भरोसे के साथ कहा था कि पाकिस्तान और चीन ने संयुक्त रूप से 1267 प्रतिबंध समिति से इन संगठनों को प्रतिबंधित करने की मांग की है। वर्तमान समय में पाकिस्तान 15 देशों की सदस्यता वाली इस बेहद शक्तिशाली सुरक्षा परिषद में वर्ष 2025-26 के कार्यकाल के लिए एक अस्थायी सदस्य के रूप में अपनी जगह बनाए हुए है। वहीं दूसरी तरफ चीन इस परिषद का एक बेहद रसूखदार और वीटो की ताकत रखने वाला स्थायी सदस्य है। अपनी इस स्थिति का फायदा उठाते हुए पाकिस्तान साल 2025 के दौरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1988 तालिबान प्रतिबंध समिति के अध्यक्ष पद पर भी काबिज था और इसके साथ ही वह आतंकवाद निरोधक समिति के उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल रहा था। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि वह अपनी इस स्थिति और चीन के वीटो पावर के दम पर बलूच संगठनों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित करवा देगा, लेकिन पश्चिमी देशों ने उसकी इस चाल को कामयाब नहीं होने दिया।
इतिहास का पहिया घूमा और पाकिस्तान को मिली अपनी ही करनी की सजा
इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प और ध्यान देने वाली बात यह है कि यह वही चीन है जिसने अतीत में कई मौकों पर भारत और अमेरिका के आतंकवाद विरोधी प्रयासों में जानबूझकर अड़ंगा लगाया था। इससे पहले जब भी भारत और अमेरिका जैसे मित्र देशों ने पाकिस्तान में बैठकर भारत के खिलाफ आतंकी साजिश रचने वाले लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे खूंखार पाकिस्तानी आतंकवादी संगठनों और उनके आकाओं को वैश्विक आतंकी घोषित करने के लिए 1267 अलकायदा प्रतिबंध समिति के तहत प्रस्ताव पेश किए थे, तब हर बार चीन ने अपने वीटो पावर का गलत इस्तेमाल करके उन प्रस्तावों को तकनीकी रूप से बाधित और खारिज कर दिया था। चीन हमेशा से पाकिस्तान पोषित आतंकवाद का ढाल बनता रहा है। लेकिन इस बार जब खुद चीन और पाकिस्तान की सुरक्षा पर बात आई और उन्होंने मिलकर प्रतिबंध लगाने की मांग की, तो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मंच पर पासा पूरी तरह से पलट गया। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने उनकी इस दोहरी नीति को अच्छी तरह समझते हुए उनके प्रस्ताव को खारिज कर दिया, जिससे अब वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान और चीन का चेहरा पूरी तरह से बेनकाब हो गया है।
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