एजेंसी, तेहरान। Strait of Hormuz ship transit : दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील समुद्री तेल मार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को लेकर ईरान ने एक बहुत बड़ा और वैश्विक स्तर पर हलचल मचाने वाला फैसला लिया है। ईरान सरकार ने घोषणा की है कि वह अब इस समुद्री जलडमरूमध्य से गुजरने वाले सभी व्यावसायिक और तेल जहाजों से एक विशेष सर्विस फीस यानी सेवा शुल्क वसूलने की पूरी तैयारी कर रहा है। ईरान के इस औचक ऐलान ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत और विशेष रूप से वैश्विक तेल बाजार में भारी चिंता पैदा कर दी है। इसके साथ ही ईरान ने यह भी साफ संकेत दिए हैं कि जिन देशों के साथ उसके द्विपक्षीय संबंध बेहद मजबूत और दोस्ताना रहे हैं, उन्हें इस नए शुल्क ढांचे में विशेष रियायतें और छूट दी जाएंगी। इस रणनीतिक कदम के सामने आते ही संयुक्त राज्य अमेरिका ने इस पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है, जिससे इस क्षेत्र में एक बार फिर से राजनीतिक और सैन्य तनाव बढ़ने की आशंका पैदा हो गई है।
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🇮🇷🇨🇳 Iran says China will receive special treatment for ships using the Strait of Hormuz. pic.twitter.com/PV5sK2gsqd
— Iran TV (@Iran_TVv) July 5, 2026
जहाजों की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण का दिया गया हवाला
चीन की राजधानी बीजिंग में आयोजित हुए वर्ल्ड पीस फोरम के दौरान चीन में ईरान के राजदूत अब्दोलरेजा रहमानी फजली ने इस पूरी नई योजना का खुलासा किया। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी बात रखते हुए कहा कि एक ऐसे देश के रूप में जिसके समुद्री क्षेत्र के अंतर्गत स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का एक बहुत बड़ा हिस्सा आता है, यह ईरान का वैध अधिकार है कि वह वहां से गुजरने वाले जहाजों से सर्विस शुल्क वसूले। ईरानी राजदूत ने इस नए टैक्स और नियम को सही ठहराते हुए तर्क दिया कि यह नई व्यवस्था होर्मुज से होकर गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, उनके सुचारू संचालन की आधुनिक निगरानी करने और इस व्यस्ततम मार्ग पर भारी मात्रा में जहाजों की आवाजाही से होने वाले गंभीर पर्यावरणीय नुकसान से निपटने व समुद्र को संभालने के उद्देश्य से लागू की जा रही है।
ओमान के साथ मिलकर योजना पर काम कर रहा है ईरान
ईरानी राजनयिक अब्दोलरेजा रहमानी फजली ने वैश्विक मंच पर यह भी स्पष्ट किया कि ईरान इस नए टैक्स प्रस्ताव पर अपने पड़ोसी देश ओमान के साथ मिलकर बहुत बारीकी से काम कर रहा है। उन्होंने बताया कि चूंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि इसकी सुरक्षा और प्रबंधन की सीधी जिम्मेदारी ईरान और ओमान दोनों देशों के साझा अधिकार क्षेत्र में आती है, इसलिए दोनों देश मिलकर इस पर अंतिम नीति तैयार कर रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात कहते हुए फजली ने एलान किया कि ईरान निश्चित रूप से उन देशों के साथ एक विशेष और उदार व्यवहार करने पर विचार कर रहा है जो मुश्किल समय में हमेशा ईरान के सच्चे मित्र रहे हैं और जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद खास तौर पर ईरान का आर्थिक व राजनीतिक साथ दिया है।
अमेरिका ने ईरान के इस फैसले पर जताई कड़ी आपत्ति
दूसरी तरफ, संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरान के इस नए नियम का पुरजोर विरोध किया है और इसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों का खुला उल्लंघन बताया है। अमेरिकी विदेश विभाग और रक्षा मंत्रालय ने अपने आधिकारिक बयानों में कहा है कि ईरान को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे वैश्विक मुक्त व्यापार मार्ग से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों से किसी भी प्रकार का कोई अतिरिक्त या मनमाना शुल्क लेने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। गौरतलब है कि हाल ही में इस क्षेत्र में बढ़े सैन्य तनाव के बाद अमेरिका और ईरान के बीच एक अस्थायी समझौता हुआ था। इस अस्थाई व्यवस्था के तहत दोनों पक्षों में यह सहमति बनी थी कि लगभग 60 दिनों की अवधि तक सभी प्रकार के व्यापारिक जहाज बिना किसी अतिरिक्त फीस या रुकावट के इस रास्ते से सुरक्षित गुजर सकेंगे। अब उस अंतरिम समझौते की निर्धारित अवधि समाप्त होने वाली है और दोनों देशों के बीच किसी स्थायी समझौते पर सहमति न बन पाने के कारण ईरान ने यह सख्त रुख अपनाया है।
पूरी दुनिया के ऊर्जा और तेल कारोबार का सबसे मुख्य मार्ग
रणनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी दुनिया का सबसे प्रमुख और रीढ़ की हड्डी माना जाने वाला समुद्री जलमार्ग है। इसी संकरे समुद्री रास्ते के जरिए फारस की खाड़ी के तमाम बड़े ऊर्जा उत्पादक और खाड़ी देश जैसे सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और इराक अपने कच्चे तेल और एलएनजी यानी तरलीकृत प्राकृतिक गैस की बड़ी खेप दुनिया भर के बाजारों तक पहुंचाते हैं। एक आंकड़े के अनुसार, पूरी दुनिया में होने वाली कुल कच्चे तेल की आवाजाही और एलएनजी की वैश्विक सप्लाई का लगभग 5 प्रतिशत हिस्सा अकेले इसी एक समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। यही वजह है कि इस बेहद संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी प्रकार का नया टैक्स, पाबंदी या सैन्य तनाव पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार को पल भर में प्रभावित कर सकता है, जिससे वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में भारी उछाल आने का खतरा मंडराने लगा है।
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