एजेंसी, नई दिल्ली। NCERT Textbook Controversy : राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ विषय को शामिल करने पर मचे देशव्यापी विवाद में एक बहुत बड़ा और नया मोड़ आया है। देश की सर्वोच्च अदालत ने इस पूरे मामले में दो महीने पहले दिए गए अपने ही एक सख्त आदेश को शुक्रवार को पूरी तरह से बदल दिया है। दरअसल, बीती 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने एक कड़ा रुख अपनाते हुए आदेश दिया था कि इस विवादित पाठ को लिखने वाले तीनों जिम्मेदार शिक्षाविदों को उनके पदों से तुरंत हटा दिया जाए और भविष्य में उन्हें दोबारा कभी ऐसा काम न सौंपा जाए। अब शुक्रवार को उन्हीं तीनों शिक्षाविदों द्वारा दायर की गई पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने अपने पिछले आदेश को बदलते हुए साफ कहा कि केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, विश्वविद्यालय और सरकारी खजाने से फंड पाने वाले सभी संस्थान इस विषय पर कानून के अनुसार खुद फैसला लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
Supreme Court has assured the three academicians who were behind the controversial, now removed sub-chapter in the Class Eight NCERT textbook “Corruption in Indian Judiciary”, that it will delete certain observations against the academicians which attributed malicious intent to…
— ANI (@ANI) May 22, 2026
कोर्ट ने वापस ली अपनी तीखी टिप्पणी, कहा- सवाल कंटेंट पर है व्यक्ति पर नहीं
इस पूरे विवाद में जिन तीन प्रमुख शिक्षाविदों और प्रोफेसरों के नाम मुख्य रूप से सामने आए थे, उनमें प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार शामिल हैं। इससे पहले मार्च महीने में हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इन तीनों के खिलाफ बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि इन लोगों ने जानबूझकर देश के सामने तथ्यों को तोड़-मरोड़कर और गलत तरीके से पेश किया है, जिससे स्कूली छात्रों के कोमल मन पर हमारी न्यायपालिका की एक अत्यंत नकारात्मक और बुरी छवि बनती है। हालांकि, अब शुक्रवार को कोर्ट ने अपने बदले हुए रुख में इन सभी पुरानी और तीखी टिप्पणियों को पूरी तरह से वापस ले लिया है और साफ किया है कि अदालत का सवाल केवल किताब की सामग्री को लेकर था, किसी व्यक्ति विशेष की योग्यता या उसकी नीयत पर नहीं।
जानिए क्या था स्कूली किताब का वह विवादित चैप्टर
इस पूरे बड़े विवाद की शुरुआत तब हुई जब एनसीईआरटी ने आगामी शैक्षणिक सत्र 2026-27 से स्कूलों में पढ़ाए जाने के लिए कक्षा 8 के छात्रों हेतु सामाजिक विज्ञान की एक नई पाठ्यपुस्तक जारी की थी। इस किताब का नाम ‘एक्सप्लोरिंग सोसायटी: इंडिया एंड बियॉन्ड पार्ट 2’ रखा गया है, जिसका पहला भाग जुलाई 2025 में ही बाजार में आ चुका था। इस नए भाग के अंदर ‘द रोल ऑफ द ज्यूडीशियरी इन अवर सोसायटी’ नामक पाठ जोड़ा गया था और उसी के तहत ‘करप्शन इन द ज्यूडीशियरी’ यानी न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का एक नया विषय शामिल किया गया था। इस पाठ में यह लिखा गया था कि भ्रष्टाचार, अदालतों में बड़ी संख्या में धूल फांक रहे पेंडिंग मामले और जजों की भारी कमी आज हमारे देश के ज्यूडिशियल सिस्टम के सामने सबसे प्रमुख और बड़ी चुनौतियां हैं।
कोर्ट में लंबित करोड़ों मुकदमों के आंकड़ों से खड़ा हुआ था बवंडर
इस नई किताब के एक विशेष सेक्शन का शीर्षक ‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड’ यानी न्याय में देरी का मतलब न्याय न मिलना रखा गया था। इस हिस्से में बकायदा आंकड़े देकर बताया गया था कि देश के सर्वोच्च न्यायालय में 81 हजार, विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों में 62 लाख 40 हजार और जिला व अधीनस्थ अदालतों में करीब 4 करोड़ 70 लाख मुकदमे सालों से लंबित पड़े हैं। किताब में यह भी लिखा गया था कि देश के सभी जज एक सख्त आचार संहिता से बंधे होते हैं, जो न केवल अदालत के भीतर बल्कि कोर्ट के बाहर भी उनके सामाजिक आचरण और व्यवहार को पूरी तरह नियंत्रित करती है। इन आंकड़ों और शीर्षकों के छपते ही देश के कानूनी और प्रशासनिक हलकों में एक बड़ा बवंडर खड़ा हो गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने खुद लिया था संज्ञान और लगाई थी किताब पर पाबंदी
किताब में न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर उठाए गए इन तीखे सवालों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बीते 24 फरवरी को मामले का स्वतः संज्ञान लिया था। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस पर बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए इस विवादित पाठ वाली एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की किताब को तुरंत प्रभाव से पूरे देश में बैन करने का ऐतिहासिक आदेश जारी कर दिया था। इसके साथ ही कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिए थे कि वे इस किताब की छपाई और बाजार में बिक्री पर तुरंत रोक लगाएं, जो कॉपियां छप चुकी हैं उन्हें जब्त करें और इंटरनेट से इसकी तमाम डिजिटल प्रतियों को भी तुरंत हटाएं। इस कड़े रुख के बाद बैकफुट पर आई एनसीईआरटी ने मार्च महीने में अदालत से बिना शर्त माफी मांगते हुए कहा था कि उनसे यह गलती अनजाने में हुई है और वे कोर्ट के सम्मान को ठेस पहुंचाने के लिए बेहद शर्मिंदा हैं। फिलहाल यह विवादित किताब ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों ही जगहों से पूरी तरह हटा ली गई है।
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