एजेंसी, भोपाल। MP Fasal Bima Yojana : मध्यप्रदेश सरकार ने किसान कल्याण वर्ष के तहत किसानों को बड़ी राहत देते हुए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को अगले 5 वर्षों तक जारी रखने का फैसला लिया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में योजना के प्रभावी संचालन और किसानों को समय पर सहायता उपलब्ध कराने के लिए 11608.47 करोड़ रुपए की मंजूरी दी गई। सरकार का कहना है कि प्राकृतिक आपदा, अतिवृष्टि, ओलावृष्टि, सूखा और अन्य कारणों से फसल खराब होने पर किसानों को आर्थिक सुरक्षा देना इस योजना का मुख्य उद्देश्य है।
प्रदेश में अब तक किसानों से रिकॉर्ड 91 लाख मीट्रिक टन से अधिक गेहूं का उपार्जन किया जा चुका है।
किसानों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए गेहूं उपार्जन की अवधि 23 मई से बढ़ाकर 28 मई, 2026 तक कर दी गई है।
जिनके भी स्लॉट बुक हुए हैं, ऐसे सभी किसानों से गेहूं उपार्जन करेंगे। pic.twitter.com/M3fW5sD4BY
— Dr Mohan Yadav (@DrMohanYadav51) May 20, 2026
किसानों को फसल नुकसान पर मिलेगा आर्थिक सहारा
राज्य सरकार के अनुसार प्रदेश में वर्ष 2016 से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू है और लाखों किसान इसका लाभ उठा चुके हैं। योजना के तहत फसल खराब होने पर किसानों को दावा राशि सीधे खाते में भेजी जाती है। खरीफ फसलों के लिए किसानों को बीमित राशि का केवल 2 प्रतिशत और रबी फसलों के लिए 1.5 प्रतिशत प्रीमियम देना होता है। बाकी राशि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर वहन करती हैं। सरकार का मानना है कि कम प्रीमियम में किसानों को बड़ा सुरक्षा कवच उपलब्ध कराने से खेती में जोखिम कम होता है और किसानों की आय को स्थिर रखने में मदद मिलती है। यही वजह है कि प्रदेश में लगातार इस योजना का दायरा बढ़ाया जा रहा है।
लाखों किसानों को मिला बीमा क्लेम
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2023-24 में 35.18 लाख किसानों के आवेदनों पर 961.68 करोड़ रुपए का दावा भुगतान किया गया। वहीं वर्ष 2024-25 में 35.56 लाख किसानों को 275.86 करोड़ रुपए की सहायता राशि जारी की गई। सरकार का दावा है कि बीमा दावों के निपटारे में तकनीक का उपयोग बढ़ाने से पारदर्शिता आई है और किसानों को जल्दी राहत मिल रही है।
तकनीक के जरिए होगा फसलों का आकलन
प्रदेश सरकार फसल बीमा योजना में आधुनिक तकनीक का उपयोग कर रही है। फसल की स्थिति और उत्पादन का आकलन सेटेलाइट आधारित रिमोट सेंसिंग तकनीक से किया जा रहा है। इसके लिए कृषि विभाग ने इसरो, मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद और मध्यप्रदेश स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन के साथ समझौता किया है। सरकार का कहना है कि मौसम संबंधी सूचना तंत्र और डिजिटल डेटा सिस्टम के जरिए फसल नुकसान का अधिक सटीक आंकलन किया जा सकेगा। इससे किसानों को सही समय पर मुआवजा देने में आसानी होगी।
दो मॉडल पर होगा योजना का संचालन
फसल बीमा योजना के संचालन के लिए राज्य सरकार के सामने दो अलग-अलग मॉडल मौजूद हैं। पहला “कप एंड सरप्लस शेयरिंग 80-110 मॉडल” और दूसरा “कप एंड केप सरप्लस शेयरिंग 60-130 मॉडल” है। इन मॉडलों के जरिए यह तय किया जाएगा कि बीमा कंपनियां कितने प्रतिशत तक दावा राशि वहन करेंगी और अतिरिक्त भार सरकार पर कितना आएगा। सरकार का कहना है कि दोनों मॉडलों के फायदे और नुकसान का अध्ययन करने के बाद अंतिम निर्णय लिया जाएगा, ताकि किसानों को अधिकतम लाभ मिल सके और राज्य पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव भी न बढ़े।
छोटे किसानों के लिए राहत भरी योजना
विशेषज्ञों का मानना है कि यह योजना छोटे और सीमांत किसानों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो रही है। कम प्रीमियम में बीमा सुरक्षा मिलने से किसानों को प्राकृतिक आपदाओं के दौरान बड़ी राहत मिलती है। सरकार ने वार्षिक वाणिज्यिक और बागवानी फसलों के लिए भी 5 प्रतिशत प्रीमियम दर तय की है, जिससे अधिक से अधिक किसान योजना से जुड़ सकें।
11 क्लस्टरों में लागू है योजना
मध्यप्रदेश में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का संचालन 11 क्लस्टरों में किया जा रहा है। प्रत्येक क्लस्टर के लिए अलग-अलग बीमा कंपनियों का चयन निविदा प्रक्रिया के माध्यम से किया गया है। सरकार का दावा है कि तकनीक और निगरानी व्यवस्था मजबूत होने से अब किसानों को बीमा दावों के लिए ज्यादा परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा।
ये भी पढ़े : भारत-अमेरिका रक्षा रिश्तों को नई मजबूती : अपाचे हेलीकॉप्टर और हॉवित्जर सिस्टम के लिए अरबों डॉलर की सहायता मंजूर
ताज़ा अपडेट और ब्रेकिंग न्यूज़ के लिए हमारे फेसबुक पेज से जुड़ें और STPV.live के साथ अपडेट रहें


