एजेंसी, इस्लामाबाद। Indus Water Treaty : भारत और पाकिस्तान के बीच पहले से ही जारी भारी तनाव के बीच अब नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर एक नया और बेहद गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने सिंधु जल संधि के स्थगित रहने को लेकर भारत को सीधे तौर पर युद्ध की बड़ी धमकी दे डाली है। एक प्रसिद्ध पाकिस्तानी समाचार चैनल ‘एआरवाई न्यूज’ को दिए गए अपने ताजा साक्षात्कार में रक्षा मंत्री ने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा कि जिस पल भी पाकिस्तान को यह महसूस हुआ कि उसकी जल सुरक्षा पर किसी तरह का कोई खतरा मंडरा रहा है, तो वह भारत के खिलाफ एक नई जंग की शुरुआत करने से पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत रणनीतिक हथियार के रूप में पानी का इस्तेमाल कर रहा है, जिससे दोनों देशों के बीच सीमा पर हालात और अधिक विस्फोटक हो सकते हैं।
#IGR: Pakistan warns water dispute with India could lead to war
Pakistan Defence Minister Khawaja Asif has warned that water security could become a cause for war if Islamabad believes its national interests are under threat.
His remarks come after India reaffirmed that the… pic.twitter.com/ZwGA0TxmEM
— India Global Review (@IGR_Media) June 22, 2026
पानी के प्राकृतिक प्रवाह में दखलंदाजी का आरोप, रक्षा मंत्री ने मानी अज्ञानता
पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भारतीय प्रशासन पर बेहद गंभीर आरोप मढ़ते हुए कहा कि नई दिल्ली जानबूझकर पाकिस्तान के हिस्से में आने वाले पानी के स्वाभाविक बहाव और प्रवाह में अड़चनें पैदा कर रही है। हालांकि, इस बेहद तल्ख और भड़काऊ बयान को देने के साथ ही उन्होंने अपनी एक बड़ी प्रशासनिक अज्ञानता भी सार्वजनिक रूप से स्वीकार की। रक्षा मंत्री ने साफ तौर पर माना कि पिछले पूरे एक साल के दौरान इस बेहद संवेदनशील और तकनीकी अंतरराष्ट्रीय मामले में पर्दे के पीछे क्या कुछ नए घटनाक्रम या बदलाव हुए हैं, इसकी उन्हें पूरी और पुख्ता जानकारी नहीं है।
आतंकी हमले के बाद भारत ने उठाया था कड़ा कदम, आतंकवाद रुकने तक बहाली नहीं
दोनों देशों के बीच इस जल विवाद के गहराने की पृष्ठभूमि पिछले साल ही तैयार हो गई थी। दरअसल, अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम इलाके में एक बहुत ही कायराना और भीषण आतंकवादी हमला हुआ था, जिसमें 26 निर्दोष लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इस दर्दनाक हमले के बाद भारत सरकार ने सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद पर कड़ा प्रहार करते हुए साल 1960 से चली आ रही ऐतिहासिक ‘सिंधु जल संधि’ को पूरी तरह से निलंबित यानी स्थगित कर दिया था। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि जब तक पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान अपनी धरती से संचालित होने वाले सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ जमीनी स्तर पर कोई ठोस और निर्णायक कार्रवाई नहीं करता, तब तक इस संधि को किसी भी कीमत पर दोबारा बहाल नहीं किया जाएगा।
पाकिस्तान में गहराया अभूतपूर्व जल संकट, मुख्य नहरें पूरी तरह सूखीं
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स और सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो इस समय पूरा पाकिस्तान एक बेहद भयावह और ऐतिहासिक जल संकट के दौर से गुजर रहा है। विशेष रूप से पाकिस्तान के सिंध और बलूचिस्तान प्रांतों में पानी की किल्लत के कारण हाहाकार मचा हुआ है। सिंध प्रांत के सिंचाई विभाग द्वारा जारी किए गए आधिकारिक और चिंताजनक आंकड़ों के अनुसार:
नॉर्थ वेस्ट कैनाल (उत्तर पश्चिमी नहर) में पानी की मात्रा में 64.1% की भारी गिरावट दर्ज की गई है।
राइस कैनाल (चावल नहर) में भी पानी का स्तर 38% तक नीचे चला गया है।
दादू कैनाल (दादू नहर) की स्थिति सबसे ज्यादा बदतर है, जहाँ पानी की आमद में 82% तक की बहुत बड़ी कमी देखी गई है।
इसके साथ ही पाकिस्तान की पूरी सिंचाई व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले सुक्कुर बैराज को लेकर भी जल विशेषज्ञों की चिंताएं सातवें आसमान पर हैं, क्योंकि वहाँ जल स्तर लगातार घटने से कृषि व्यवस्था पूरी तरह ठप होने के कगार पर पहुँच गई है।
जानिए क्या है ऐतिहासिक सिंधु जल समझौता और इसका पूरा इतिहास
सिंधु नदी प्रणाली के अंतर्गत मुख्य रूप से छह बड़ी नदियां आती हैं, जिनमें सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज शामिल हैं। इन नदियों का पूरा तटीय क्षेत्र करीब 11.2 लाख वर्ग किलोमीटर के एक बहुत बड़े भू-भाग में फैला हुआ है, जिसकी निर्भरता पर चार देशों के करीब 30 करोड़ लोगों का जीवन चलता है। इस पूरे बेसिन का 47% हिस्सा पाकिस्तान में, 39% भारत में, 8% चीन में और 6% अफगानिस्तान के दायरे में आता है। साल 1947 में हुए भारत-पाक विभाजन के समय से ही पंजाब और सिंध प्रांतों के बीच पानी को लेकर खींचतान शुरू हो गई थी। शुरुआत में दोनों देशों के इंजीनियरों के बीच अस्थायी समझौते हुए, लेकिन जब वे विफल रहे तो भारत ने साल 1948 में कुछ समय के लिए नहरों का पानी रोक दिया था, जिससे पाकिस्तान की लाखों एकड़ फसल बर्बाद हो गई थी। इसके बाद साल 1951 से लेकर 1960 तक विश्व बैंक की मध्यस्थता में करीब नौ सालों तक लंबी मैराथन बातचीत चली। आखिरकार 19 सितंबर 1960 को कराची के भीतर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने इस ऐतिहासिक दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए, जिसे दुनिया ‘इंडस वाटर ट्रीटी’ या सिंधु जल संधि कहती है।
संधि स्थगित होने से पूरी तरह तबाह हो जाएगी पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था
इस बेहद महत्वपूर्ण जल समझौते के स्थगित रहने से पाकिस्तान के वजूद पर ही बन आई है। पाकिस्तान की कुल कृषि योग्य भूमि का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा यानी करीब 4.7 करोड़ एकड़ का एक बहुत बड़ा क्षेत्र अपनी सिंचाई के लिए पूरी तरह से इसी सिंधु नदी प्रणाली के पानी पर निर्भर करता है। इसके अलावा पाकिस्तान की कुल राष्ट्रीय आय (जीडीपी) में कृषि क्षेत्र का योगदान 23% से अधिक है और देश के लगभग 68% ग्रामीण नागरिकों की आजीविका सीधे तौर पर इसी से चलती है। भारत के इस कड़े रुख के कारण पाकिस्तान के दो सबसे बड़े जलविद्युत बांध, ‘मंगल डैम’ और ‘तारबेला हाइड्रोपावर डैम’ को पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है, जिससे पूरे देश में बिजली के उत्पादन में 30% से लेकर 50% तक की भारी कटौती होने की आशंका पैदा हो गई है। बिजली न होने से वहां के कारखाने बंद हो रहे हैं, रोजगार खत्म हो रहे हैं और पहले से ही बेहाल हो चुकी पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था अब पूरी तरह बर्बादी के कगार पर आकर खड़ी हो गई है।
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