Gold Import Duty

विदेशी मुद्रा बचाने के लिए सरकार का बड़ा कदम : सोने-चांदी पर आयात शुल्क बढ़कर हुआ 15 प्रतिशत, कीमतों में आया भारी उछाल

देश/प्रदेश नई दिल्ली राष्ट्रीय व्यापार

एजेंसी, नई दिल्ली। Gold Import Duty Hike : पश्चिम एशिया में जारी संकट और वैश्विक स्तर पर उपजी असाधारण परिस्थितियों के बीच भारत सरकार ने एक बड़ा आर्थिक फैसला लिया है। विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव को कम करने और गैर-आवश्यक आयात पर लगाम लगाने के उद्देश्य से सरकार ने बुधवार को सोने और चांदी पर आयात शुल्क (इंपोर्ट ड्यूटी) को 6 प्रतिशत से बढ़ाकर सीधे 15 प्रतिशत कर दिया है। इसके साथ ही प्लैटिनम पर भी शुल्क को 6.4 प्रतिशत से बढ़ाकर 15.4 प्रतिशत कर दिया गया है। ये नई दरें 13 मई से तत्काल प्रभाव से लागू मानी जाएंगी।

नई कर संरचना और आयात के आंकड़े

सरकार के इस फैसले के बाद अब सोने और चांदी के डोरे, सिक्के और अन्य कीमती वस्तुओं पर लगने वाले कर की दरें पूरी तरह बदल गई हैं। आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान भारत में सोने और चांदी का आयात सालाना आधार पर 26.7 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी के साथ 102.5 अरब अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गया था। इस वृद्धि के कारण देश के कुल आयात में इन कीमती धातुओं की हिस्सेदारी 11.8 प्रतिशत से बढ़कर 14 प्रतिशत हो गई थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से ईंधन के विवेकपूर्ण उपयोग, सोने की खरीद टालने और विदेश यात्राओं को स्थगित करने की अपील की थी, जिसके बाद यह आधिकारिक अधिसूचना जारी की गई है।

आयात शुल्क बढ़ने से कीमतों पर असर

इस ऐतिहासिक बढ़ोतरी का असर स्थानीय बाजार पर तुरंत देखने को मिला है। स्थानीय सर्राफा बाजार में सोने की कीमत 8,550 रुपये की छलांग लगाकर 1,65,350 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर को पार कर गई है। वहीं चांदी की कीमतों में 20,500 रुपये की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे अब चांदी 2,97,500 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर पहुंच गई है। गौरतलब है कि शुल्क वृद्धि के तहत सोने पर मूल सीमा शुल्क को दोगुना कर 10 प्रतिशत किया गया है, जबकि कृषि अवसंरचना एवं विकास उपकर (एआईडीसी) को 1 प्रतिशत से बढ़ाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके अलावा आयातकों को 3 प्रतिशत आईजीएसटी भी देना होगा, जिससे कुल प्रभावी कर अब 18.45 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

पश्चिम एशिया संकट और कच्चे तेल का दबाव

सरकारी सूत्रों का कहना है कि यह कदम मौजूदा समय की मांग है। पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुए अवरोधों के कारण कच्चे तेल, उर्वरक और खाद्य तेलों के आयात की लागत काफी बढ़ गई है। ब्रेंट कच्चे तेल की कीमतें युद्ध शुरू होने से पहले 73 डॉलर प्रति बैरल थीं, जो अब 107 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 87 प्रतिशत और एलपीजी का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। ऐसी स्थिति में विदेशी मुद्रा को बचाना और उसे आवश्यक वस्तुओं जैसे रक्षा उपकरण, औद्योगिक कच्चे माल और खाद्य सुरक्षा के लिए सुरक्षित रखना सरकार की प्राथमिकता बन गई है।

आभूषण उद्योग और विशेषज्ञों की राय

अखिल भारतीय रत्न एवं आभूषण परिषद (जीजेसी) ने आशंका जताई है कि आयात शुल्क में इस भारी बढ़ोतरी से बाजार में काला बाजारी और तस्करी की घटनाएं बढ़ सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से सोने की मांग में 10 से 15 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है और उपभोक्ता अब भारी गहनों के बजाय हल्के वजन वाले आभूषणों को प्राथमिकता देंगे। दूसरी ओर, वित्तीय विश्लेषकों का कहना है कि वैश्विक अनिश्चितता के इस दौर में सोना अभी भी सुरक्षित निवेश का सबसे अच्छा विकल्प बना हुआ है। सरकार का यह हस्तक्षेप एक ‘निवारक कदम’ के रूप में देखा जा रहा है ताकि भविष्य में किसी बड़े आर्थिक संकट से बचा जा सके।

रुपये की गिरावट और वैश्विक बाजार

कीमतों में इस उछाल का एक कारण डॉलर के मुकाबले रुपये का कमजोर होना भी है। विदेशी मुद्रा की निकासी और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.80 के निचले स्तर तक गिर गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार की बात करें तो वहां सोने की कीमतों में मामूली गिरावट देखी गई है, लेकिन घरेलू बाजार में उच्च आयात शुल्क के कारण कीमतें आम आदमी की पहुंच से दूर होती जा रही हैं। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन के अनुसार, वर्तमान संकट देश के भुगतान संतुलन के लिए एक बड़ी परीक्षा है, जिसका सीधा असर महंगाई और विनिमय दर पर पड़ रहा है।

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