एजेंसी, एवियन। G7 Summit 2026 : वैश्विक राजनीति और कूटनीति के लिहाज से एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ी खबर सामने आई है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सात सबसे विकसित देशों के समूह के वैश्विक शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए फ्रांस के एवियन शहर पहुंच चुके हैं। इस अंतरराष्ट्रीय महामंच पर दुनिया के दो सबसे बड़े और शक्तिशाली लोकतांत्रिक देशों के शीर्ष नेताओं के बीच एक बेहद खास और बहुप्रतीक्षित मुलाकात देखने को मिली है। सम्मेलन की मुख्य बैठक के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प न केवल एक-दूसरे के बगल में बैठे नजर आए, बल्कि दोनों नेताओं के बीच काफी गर्मजोशी के साथ लगभग पांच मिनट तक गहन बातचीत भी हुई।
With fellow leaders at the G7 Summit in Evian.
We will keep working together to advance prosperity, sustainability and human well-being.@G7 pic.twitter.com/yUUV89f8vh
— Narendra Modi (@narendramodi) June 16, 2026
लंबे अंतराल के बाद दोनों शक्तिशाली राष्ट्राध्यक्षों की आमने-सामने बातचीत
यह मुलाकात अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दृष्टिकोण से इसलिए बेहद खास मानी जा रही है क्योंकि दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच लगभग सोलह महीनों के एक लंबे समय के बाद यह पहली आमने-सामने की सीधी बातचीत है। इससे पहले इन दोनों दिग्गज नेताओं की आखिरी मुलाकात पिछले वर्ष फरवरी दो हजार पच्चीस में अमेरिकी राष्ट्रपति के आधिकारिक निवास व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में हुई थी। इस ताजा और सकारात्मक मुलाकात के बाद यह पूरी उम्मीद जताई जा रही है कि अगले दिन शाम को साढ़े छह बजे दोनों देशों के प्रमुखों के बीच एक बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण व्यापारिक संधि पर विस्तार से चर्चा हो सकती है।
व्यापारिक समझौतों और कूटनीतिक साझेदारी पर टिकी दुनिया की नजरें
भारत और अमेरिका के बीच होने वाली आगामी उच्च स्तरीय बैठक में कई बेहद संवेदनशील और जरूरी द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा होने की पूरी संभावना है। इस वार्ता के मुख्य एजेंडे में दोनों देशों के बीच का आपसी व्यापारिक समझौता, आयात-निर्यात पर लगने वाला सीमा शुल्क यानी टैरिफ, दोनों देशों के बाजारों में विदेशी निवेश को बढ़ावा देना और रक्षा तथा आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी को और अधिक मजबूत करना शामिल है। दोनों देशों के व्यापारिक संगठन लंबे समय से एक व्यापक व्यापार समझौते की उम्मीद लगाए बैठे हैं, जिसे इस बैठक के जरिए एक नई दिशा मिल सकती है।
फ्रांस के राष्ट्रपति ने किया विश्व के इस सबसे बड़े सम्मेलन का औपचारिक शुभारंभ
इससे पहले, मेजबान देश फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने बावनवें शिखर सम्मेलन का बेहद भव्य और औपचारिक तरीके से उद्घाटन किया था। इस वैश्विक महामंच पर दुनिया भर की कई नामचीन राजनीतिक हस्तियां और शक्तिशाली देशों के राष्ट्रप्रमुख हिस्सा लेने पहुंचे हैं। इस बार के सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के अलावा इटली की महिला प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, जर्मनी के नए चांसलर फ्रेडरिक मर्त्ज, ब्रिटेन के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी सहित दुनिया के कई अन्य प्रभावशाली देशों के नेता वैश्विक चुनौतियों पर मंथन करने के लिए एक साथ जुटे हैं।
विश्व के बारह बड़े नेताओं की मौजूदगी से गूंजा एवियन शहर
इस बार के विशेष सम्मेलन में मुख्य रूप से सात सदस्य देशों कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका के राष्ट्राध्यक्षों के साथ-साथ यूरोपीय संघ के सर्वोच्च प्रतिनिधि भी हिस्सा ले रहे हैं। हालांकि, मेजबान देश फ्रांस ने इस समूह के अलावा दुनिया की कुछ अन्य उभरती हुई और बेहद महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं के प्रमुखों को भी विशेष अतिथि के तौर पर इस सम्मेलन में शामिल होने का न्यौता दिया है। इन खास मेहमानों में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी, ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा, दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्यंग और केन्या के राष्ट्रपति विलियम रुटो शामिल हैं। सम्मेलन के दौरान आयोजित एक सामूहिक दोपहर के भोज में इन सभी नेताओं को आपसी अनौपचारिक बातचीत करते हुए देखा गया।
क्या है यह सात देशों का समूह और कैसे काम करता है इसका ढांचा
आमतौर पर इस समूह को दुनिया की सबसे आधुनिक और विकसित अर्थव्यवस्थाओं वाले सात देशों का एक शक्तिशाली मंच माना जाता है। इस समूह के भीतर अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जापान, इटली, कनाडा और जर्मनी जैसे अमीर और औद्योगिक रूप से बेहद उन्नत देश शामिल हैं। इस समूह का इतिहास काफी पुराना है। इसकी शुरुआत वर्ष 1975 में महज छह देशों के साथ हुई थी, लेकिन अगले ही साल 1976 में कनाडा के इसमें शामिल होने के बाद इसे यह नया नाम मिला। एक समय में रूस को भी इसका हिस्सा बनाकर इसे आठ देशों का समूह बना दिया गया था, परंतु वर्ष 2014 में यूक्रेन के क्रीमिया प्रायद्वीप पर रूसी कब्जे के बाद उसे इस समूह से बाहर कर दिया गया और यह दोबारा पुराने स्वरूप में आ गया।
विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में सातवीं बार सम्मेलन का हिस्सा बने प्रधानमंत्री
यद्यपि भारत इस सात देशों के समूह का कोई स्थायी सदस्य नहीं है, परंतु भारत की लगातार बढ़ती हुई आर्थिक ताकत, विशाल बाजार और वैश्विक राजनीति में उसके बेहद महत्वपूर्ण प्रभाव को देखते हुए इस समूह द्वारा भारत को लगातार एक विशेष अतिथि देश के रूप में आमंत्रित किया जाता रहा है। भारत की तरफ से पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने कार्यकाल के दौरान पांच बार इस शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया था। वहीं, वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पहली बार वर्ष 2019 में फ्रांस के बियारिट्ज शहर में आयोजित सम्मेलन में बुलाया गया था। इसके बाद से वे लगातार इस सम्मेलन का हिस्सा बन रहे हैं। वे वर्ष 2021 में ब्रिटेन की अध्यक्षता के दौरान इंटरनेट के माध्यम से वर्चुअली जुड़े थे, जबकि 2022 में जर्मनी, 2023 में जापान, 2024 में इटली और 2025 में कनाडा के दौरों पर जाकर उन्होंने व्यक्तिगत रूप से भारत का प्रतिनिधित्व किया था।
इस वर्ष के सम्मेलन में किन मुख्य वैश्विक मुद्दों पर हो रही है चर्चा
इस अंतरराष्ट्रीय समूह का कोई अपना स्थायी कार्यालय या मुख्यालय नहीं होता है। इसके सदस्य देश हर साल बारी-बारी से इस सम्मेलन की मेजबानी और अध्यक्षता की जिम्मेदारी संभालते हैं। इस वर्ष इस सम्मेलन की कमान फ्रांस के हाथों में है, इसलिए इसका आयोजन एवियन शहर में किया जा रहा है। इस वर्ष के मुख्य एजेंडे में दुनिया के सामने खड़े कई बड़े भूराजनीतिक संकट शामिल हैं, जैसे कि यूक्रेन और रूस के बीच चल रहा भीषण युद्ध, मध्य पूर्व में ईरान और इजराइल के बीच बढ़ता हुआ तनाव, गाजा और लेबनान की मौजूदा बदतर स्थिति और समुद्री व्यापार के मुख्य मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा चुनौतियां। इन सबके अलावा वैश्विक आर्थिक असंतुलन को ठीक करना और वर्तमान समय की सबसे आधुनिक तकनीक यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सुरक्षित इस्तेमाल पर भी दुनिया के बड़े नेता एक साझा नीति बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
वैश्विक मंच पर जी20 और इस सात सदस्यीय समूह के बीच का अंतर
तकनीकी और राजनीतिक रूप से यह समूह दुनिया के एक अन्य बड़े मंच जी20 से काफी अलग है। यह समूह कोई भी ऐसा कानून पास नहीं कर सकता जो दुनिया के देशों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी हो। जहां एक तरफ जी20 का मुख्य ध्यान केवल दुनिया की आर्थिक व्यवस्था और वित्तीय स्थिरता पर होता है, वहीं इस सात सदस्यीय समूह के लिए राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भी उतना ही ज्यादा महत्व रखते हैं। जी20 की स्थापना वर्ष 1999 में हुई थी और उसमें इस समूह के सभी देशों के अलावा भारत, चीन, ब्राजील, रूस और दक्षिण अफ्रीका जैसी दुनिया की नई और तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं भी शामिल हैं। जानकारों का मानना है कि वर्तमान समय में विकासशील देशों की भागीदारी के कारण जी20 समूह पूरी दुनिया में ज्यादा प्रभावी और व्यावहारिक साबित हो रहा है।
फ्रांस की यात्रा के दौरान स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति से भी मिले प्रधानमंत्री
स्लोवाकिया की अपनी बेहद सफल राजकीय यात्रा को पूरा करने के बाद जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस के लिए रवाना हुए, तो उनका विमान कुछ समय के लिए रास्ते में स्विट्जरलैंड के खूबसूरत शहर जिनेवा में रुका। हवाई अड्डे पर संक्षिप्त ठहराव के दौरान स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति गाइ पार्मेलिन खुद प्रधानमंत्री का स्वागत करने पहुंचे। दोनों नेताओं के बीच हवाई अड्डे पर ही बेहद गर्मजोशी के साथ एक संक्षिप्त लेकिन बहुत ही महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठक हुई। इस मुलाकात के दौरान दोनों देशों के प्रमुखों ने भारत और स्विट्जरलैंड के बीच आपसी कूटनीतिक और आर्थिक संबंधों को एक नई ऊंचाई पर ले जाने और द्विपक्षीय साझेदारी को और अधिक मजबूत करने का अपना पुराना संकल्प दोहराया। प्रधानमंत्री ने खुद इस सुखद मुलाकात की जानकारी अपने सोशल मीडिया हैंडल के जरिए देश की जनता के साथ साझा की।
भारत और जापान के बीच पर्यावरण संरक्षण को लेकर हुआ एक बड़ा समझौता
इसी वैश्विक हलचल के बीच भारत और जापान के मैत्रीपूर्ण संबंधों से जुड़ी एक और बेहद सकारात्मक खबर सामने आई है। दोनों देशों ने संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन की रूपरेखा के तहत हुए पेरिस समझौते के नियमों को ध्यान में रखते हुए एक संयुक्त क्रेडिटिंग तंत्र के क्रियान्वयन नियमों को आधिकारिक रूप से मंजूरी दे दी है। इस महत्वपूर्ण पर्यावरण समझौते के लागू होने से भारत के भीतर कार्बन उत्सर्जन को कम करने वाली आधुनिक तकनीकों पर आधारित परियोजनाओं में विदेशी निवेश बहुत तेजी से बढ़ेगा। इसके साथ ही जापान से भारत को अत्याधुनिक तकनीकों का हस्तांतरण होगा जिससे भारत की तकनीकी क्षमता का भी व्यापक विकास होगा।
ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के लिए बनाई गई मजबूत व्यवस्था
भारत सरकार के आधिकारिक बयान के अनुसार, दोनों देशों की सरकारों ने जून महीने की शुरुआत में ही इस व्यवस्था के नियमों को अंतिम रूप दे दिया था, जिसकी रूपरेखा पिछले वर्ष दोनों देशों के बीच हुए एक आपसी सहयोग ज्ञापन के दौरान तैयार की गई थी। इस नए पर्यावरण कानून के तहत ग्रीनहाउस गैसों के हानिकारक उत्सर्जन को रोकने और हवा से प्रदूषणकारी तत्वों को हटाने के लिए एक बेहद मजबूत और पारदर्शी प्रशासनिक ढांचा तैयार किया गया है। इसके संचालन के लिए दोनों देशों के शीर्ष अधिकारियों को मिलाकर एक संयुक्त समिति बनाई जाएगी, जो पर्यावरण परियोजनाओं की पूरी जांच करेगी और स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के माध्यम से कार्बन क्रेडिट के लेनदेन और उसकी राष्ट्रीय रजिस्ट्री की कड़ाई से निगरानी करेगी। भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने कहा है कि यह कदम वैश्विक पर्यावरण सुरक्षा के प्रति भारत की गंभीर प्रतिबद्धता को दुनिया के सामने प्रदर्शित करता है।
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