रविवार को गजानन संकष्टी चतुर्थी व्रत का पावन पर्व, जानिए चंद्रमा निकलने का सही समय
एजेंसी, नई दिल्ली। प्रत्येक माह के दोनों पक्षों यानी कृष्ण पक्ष तथा शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि विघ्नहर्ता भगवान गणेश जी की आराधना के लिए अत्यंत खास मानी जाती है। हिंदी पंचांग के अनुसार कृष्ण पक्ष के दौरान आने वाली चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है, जबकि शुक्ल पक्ष की चतुर्थी विनायक चतुर्थी के नाम से जानी जाती है। इस पवित्र तिथि पर उपवास रखने और पूरी श्रद्धा के साथ गौरी पुत्र गणेश की उपासना करने से जीवन के सभी कष्ट और बाधाएं समाप्त हो जाती हैं। इसके प्रभाव से साधक के घर-परिवार में हमेशा सुख-शांति और ऐश्वर्य का वास रहता है। आपको बता दें कि सावन महीने के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली चतुर्थी को गजानन संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इस पावन अवसर पर विशेष रूप से भगवान गणेश के गजानन स्वरूप की पूजा की जाती है। गजानन गणेश जी के आठ मुख्य रूपों यानी अष्टविनायक रूपों में से एक प्रमुख स्वरूप माने जाते हैं। संस्कृत भाषा में गज शब्द का अर्थ हाथी होता है और आनन शब्द मुख को दर्शाता है, इस प्रकार गजानन का शाब्दिक अर्थ हाथी के मुख वाले देवता से है। इस खास दिन पर जो भी भक्त सच्चे मन से गणेश जी की पूजा-अर्चना करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। तो आइए विस्तार से जानते हैं कि इस वर्ष गजानन संकष्टी के पावन पर्व पर पूजा का शुभ मुहूर्त और चंद्रोदय का समय क्या रहेगा।
गजानन संकष्टी चतुर्थी का विस्तृत शुभ मुहूर्त
वैदिक पंचांग के अनुसार सावन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का आरंभ 1 अगस्त को सुबह 11 बजकर 7 मिनट पर हो चुका है और इस तिथि का समापन 2 अगस्त को सुबह 11 बजकर 15 मिनट पर होगा। इस पवित्र व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04:47 ए एम से शुरू होकर 05:31 ए एम तक रहेगा। इसके अलावा प्रातः काल की बेला में संध्या मुहूर्त सुबह 05:09 ए एम से 06:16 ए एम तक निर्धारित किया गया है और दिन का सबसे महत्वपूर्ण अभिजित मुहूर्त दोपहर 12:19 पी एम से 01:11 पी एम तक रहेगा। संकष्टी चतुर्थी के इस पावन दिन पर चंद्रमा के उदय होने का समय रात को 9 बजकर 43 मिनट रहेगा। इस दिन किसी भी प्रकार के अशुभ कार्यों से बचने के लिए राहुकाल के समय का विशेष ध्यान रखना आवश्यक होता है।
भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की संपूर्ण विधि
संकष्टी चतुर्थी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं और इसके पश्चात साफ-सुथरे लाल अथवा पीले रंग के वस्त्र धारण करें। अपने घर के मंदिर अथवा पूजा स्थल पर भगवान गणेश की मूर्ति के सामने खड़े होकर हाथ में थोड़ा सा जल और अक्षत लेकर व्रत रखने का दृढ़ संकल्प लें। अपने घर के ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व दिशा में एक साफ लकड़ी की चौकी रखें और उस पर लाल रंग का कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश की सुंदर प्रतिमा या तस्वीर को आदरपूर्वक स्थापित करें। इसके बाद गणेश जी को रोली, अक्षत, ताज़ा दूर्वा, मोदक, बेसन के लड्डू, मौसमी फल और लाल रंग के पुष्प श्रद्धापूर्वक अर्पित करें। भगवान की कृपा प्राप्ति के लिए गणेश जी की प्रतिमा के समक्ष घी का दीपक और सुगंधित धूप बत्ती जलाएं। पूजा के दौरान पूरी निष्ठा के साथ गणेश चालीसा और संकष्टी चतुर्थी की कथा का पाठ करें तथा पवित्र मंत्र ‘ॐ गं गणपतये नमः’ का कम से कम 108 बार जाप करें। पूजा के अंत में विधि-विधान से गणेश जी की आरती करें। रात्रि के समय आसमान में चंद्रमा के प्रकट होने के बाद शुद्ध जल में थोड़ा सा दूध, रोली और अक्षत मिलाकर विधि-विधान से चंद्र देव को अर्घ्य दें। चंद्र दर्शन और अर्घ्य देने के पश्चात भगवान गणेश की पुनः वंदना करें और फिर अपना व्रत खोलकर पारण करें।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। stpv.live एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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