एजेंसी, नई दिल्ली। Election Commission : मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने के लिए विपक्षी दलों ने शुक्रवार को एक बार फिर राज्यसभा में नोटिस दाखिल किया है। इस ताजा नोटिस पर विभिन्न विपक्षी दलों के 73 सांसदों ने अपने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ ‘सिद्ध दुर्व्यवहार’ के नौ विशिष्ट आरोप लगाए हैं और उनकी पद पर निरंतरता को भारतीय संविधान पर प्रहार बताया है।
राज्यसभा में 73 विपक्षी सांसदों ने अभी-अभी अपने सेक्रेटरी जनरल को भारत के राष्ट्रपति को संबोधित प्रस्ताव प्रस्तुत करने के लिए एक नया नोटिस ऑफ मोशन सौंपा है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने का आग्रह किया गया है। यह मांग 15 मार्च 2026 को और उसके बाद उनके…
— Jairam Ramesh (@Jairam_Ramesh) April 24, 2026
मार्च में खारिज हो चुका है पिछला प्रस्ताव
यह दूसरी बार है जब विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसद में प्रक्रिया शुरू की है। इससे पहले मार्च महीने में भी लोकसभा और राज्यसभा में इसी प्रकार का नोटिस दिया गया था, जिस पर 193 सांसदों के हस्ताक्षर थे। हालांकि, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति ने उन नोटिसों को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि लगाए गए आरोप संवैधानिक मानकों और आवश्यक साक्ष्यों के अनुरूप नहीं हैं। सभापति ने तब कहा था कि प्रशासनिक मतभेदों या राजनीतिक धारणाओं के आधार पर इस तरह के प्रस्ताव स्वीकार करना संस्था की स्वतंत्रता के लिए खतरा हो सकता है।
पक्षपात और चुनावी अनियमितताओं के आरोप
ताजा नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कई गंभीर बिंदु उठाए गए हैं। इनमें सबसे प्रमुख ‘आदर्श चुनाव आचार संहिता’ को लागू करने में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप है। इसके अलावा, विपक्षी दलों ने केरल में चुनाव आयोग के आधिकारिक पत्राचार पर सत्ताधारी दल की मुहर मिलने और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाने जैसे प्रशासनिक दोषों को भी आधार बनाया है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश और तृणमूल कांग्रेस की सागरिका घोष सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने इस मुहिम का नेतृत्व किया है।
निष्कासन की जटिल कानूनी प्रक्रिया
मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल है और यह उसी पद्धति पर आधारित है जैसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। ‘जजेस (इन्क्वायरी) एक्ट 1968’ के अनुसार, राज्यसभा में ऐसा नोटिस देने के लिए कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं, जबकि लोकसभा के लिए यह संख्या 100 है। यदि सभापति इस नोटिस को स्वीकार कर लेते हैं, तो आरोपों की जांच के लिए एक तीन सदस्यीय समिति बनाई जाती है। समिति द्वारा आरोपों की पुष्टि होने के बाद ही संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई) से प्रस्ताव पारित कर राष्ट्रपति को भेजा जाता है।
पश्चिम बंगाल चुनावों के बीच बढ़ा राजनीतिक तनाव
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया जारी है और वहां रिकॉर्ड मतदान दर्ज किया जा रहा है। विपक्षी दल लगातार चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं, विशेषकर मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण को लेकर। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग सत्ताधारी दल के दबाव में कार्य कर रहा है, जबकि आयोग इन आरोपों को लगातार खारिज करता रहा है। फिलहाल, राज्यसभा के सभापति द्वारा इस नए नोटिस पर लिए जाने वाले फैसले पर सभी की निगाहें टिकी हैं।
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