एजेंसी, नई दिल्ली। CJP Protest CCTV Footage : राजधानी दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के विरोध प्रदर्शन के दौरान मेट्रो सेवाओं और इंटरनेट को बाधित किए जाने तथा 33 वर्षों से तय धरना स्थल जंतर-मंतर को प्रदर्शन सूची से बाहर किए जाने के गंभीर मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने 10 अक्टूबर 2026 को जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिसिया कार्रवाई को लेकर केंद्र सरकार को औपचारिक नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने दिल्ली पुलिस और सभी जांच एजेंसियों को स्पष्ट आदेश दिया है कि 10 अक्टूबर के विरोध प्रदर्शन और विभिन्न हिरासत केंद्रों से जुड़े सभी डिजिटल व सीसीटीवी फुटेज पूरी तरह सुरक्षित रखे जाएं ताकि किसी भी स्तर पर साक्ष्यों से छेड़छाड़ न हो सके। इससे पहले दिल्ली में इंटरनेट सेवाएं ठप करने के मामले में केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन द्वारा हलफनामा दायर कर बिना शर्त माफी मांगने का तथ्य भी न्यायिक रिकॉर्ड पर सामने आया।
‘Nobody Can Browbeat Us’ : Supreme Court In Plea Against October 12 March By Political Leaders; Issues Notice
Court also directed preservation of CCTV footage.
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https://t.co/2wWbtRjn7i— Live Law (@LiveLawIndia) October 15, 2026
9 मामलों की मैराथन सुनवाई और पुलिस एक्शन पर सख्त दिशा-निर्देश
सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ ने विरोध प्रदर्शनों, नागरिकों की आवाजाही पर पाबंदी, पत्रकारों से कथित बदसलूकी और मतदाता सूची से जुड़े कुल 46 मामलों में से 9 महत्वपूर्ण याचिकाओं पर मैराथन सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं और विपक्षी दलों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, गोपाल शंकरनारायणन और मेनका गुरुस्वामी ने दलीलें रखीं, जबकि केंद्र सरकार का पक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने पेश किया। अदालत ने साफ किया कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिकों का मौलिक अधिकार है और पुलिस बल का अनियंत्रित इस्तेमाल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालत ने प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी, लाठीचार्ज और 45 से अधिक अस्थायी हिरासत केंद्रों में नागरिकों को रखे जाने के मामले में दिल्ली पुलिस से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
महिला पत्रकारों से बदसलूकी की जांच के लिए बनेगी विशेष समिति
अदालती कार्यवाही के दौरान विरोध प्रदर्शनों की कवरेज कर रही महिला पत्रकारों के साथ पुलिस कर्मियों द्वारा कथित मारपीट और अभद्रता का मुद्दा प्रमुखता से उठा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने इस पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए घोषणा की कि महिला पत्रकारों के साथ हुई हिंसा के आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए एक स्वतंत्र समिति का गठन किया जाएगा। इसके साथ ही दिल्ली पुलिस के एसीपी विवेक भगत द्वारा एक महिला पत्रकार के खिलाफ दर्ज कराई गई प्राथमिकी के मामले में हस्तक्षेप करते हुए शीर्ष अदालत ने पत्रकार की गिरफ्तारी पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने का सीधा निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान पत्रकारों के मोबाइल फोन और कैमरे जब्त किए जाने की शिकायतों पर भी पीठ ने कड़ा संज्ञान लिया और सरकार को इस संबंध में स्थिति स्पष्ट करने का आदेश दिया।
33 साल पुराने जंतर-मंतर को हटाने पर केंद्र से मांगा स्पष्टीकरण
पिछले 33 वर्षों से राष्ट्रीय राजधानी में लोकतांत्रिक प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र रहे जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से डी-नोटिफाई करने के केंद्र सरकार के फैसले पर अदालत ने गहरा असंतोष व्यक्त किया। पीठ ने केंद्र सरकार से सीधा सवाल पूछा कि क्या यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट की किसी पुरानी मौखिक टिप्पणी के बहाने लिया गया है या इसके पीछे सरकार का कोई स्वतंत्र और वस्तुनिष्ठ प्रशासनिक आकलन मौजूद है। हालांकि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि यह कदम गृह मंत्रालय द्वारा गठित एक उच्चस्तरीय समिति की विस्तृत सिफारिशों के आधार पर उठाया गया था, लेकिन पीठ ने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि यदि सरकार का जवाब कानूनी और व्यावहारिक रूप से संतोषजनक नहीं पाया गया, तो अदालत कानून के दायरे में कड़ा फैसला सुनाएगी।
इंटरनेट बंदी पर सरकारी हलफनामा और सशर्त माफी पर अदालत की दो टूक
सुनवाई के दौरान 10 अक्टूबर को दिल्ली के विभिन्न इलाकों में इंटरनेट सेवा ठप किए जाने को लेकर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि कानूनी प्रक्रिया के तहत हलफनामे के पहले पैराग्राफ में माफी दर्ज की गई है। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार की दलीलों से ऐसा प्रतीत होता है कि यह माफी बिना शर्त होने के बजाय शर्तों से बंधी हुई है, इसलिए अदालत इसे उस रूप में संज्ञान में नहीं ले रही है। गृह मंत्रालय ने अपने बचाव में दलील दी थी कि अफवाहों को फैलने से रोकने और गंभीर कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए इंटरनेट पर अस्थायी पाबंदी लगाना अनिवार्य हो गया था। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक सुविधाओं को मनमाने ढंग से ठप नहीं किया जा सकता।
7 हजार लोगों की हिरासत और सुप्रीम कोर्ट की पूर्व चेतावनियां
उल्लेखनीय है कि 10 अक्टूबर 2026 को सीजेपी द्वारा चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जंतर-मंतर पर विशाल विरोध प्रदर्शन बुलाया गया था। उस दौरान दिल्ली पुलिस ने हवाई अड्डे से ही पार्टी के शीर्ष नेताओं अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को हिरासत में ले लिया था और लगभग 7,000 प्रदर्शनकारियों व राजनीतिक कार्यकर्ताओं को राजधानी भर से निरुद्ध किया गया था। इस पूरे घटनाक्रम पर पिछली सुनवाई में भी अदालत ने केंद्र और दिल्ली पुलिस को फटकार लगाते हुए सख्त टिप्पणी की थी कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर मक्खी मारने के लिए हथौड़ा चलाने जैसी अतिवादी कार्रवाई नहीं की जा सकती। अदालत ने अब केंद्र सरकार को सभी बिंदुओं पर अपना व्यापक जवाबी हलफनामा दाखिल करने का अंतिम निर्देश दिया है।
इस पूरे मामले और मुख्य बिंदुओं को समझने के लिए नीचे दिए गए प्रमुख प्रश्नों और उनके उत्तरों को पढ़ें :
प्रश्न 1: सीजेपी प्रोटेस्ट मामले (CJP protest Supreme Court hearing) में कोर्ट ने केंद्र को नोटिस क्यों दिया?
उत्तर 1: 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर पुलिस कार्रवाई, हिरासत और Jantar Mantar de-notification के फैसले पर स्पष्टीकरण मांगने के लिए कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी किया है।
प्रश्न 2: इंटरनेट और मेट्रो सेवाएं बंद (Delhi internet shutdown) करने पर सरकार का क्या रुख रहा?
उत्तर 2: गृह सचिव ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर 10 अक्टूबर को मेट्रो और इंटरनेट बंद करने के प्रशासनिक फैसले पर Unconditional apology मांगी है।
प्रश्न 3: कोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज (CCTV preservation order) को लेकर क्या निर्देश दिए हैं?
उत्तर 3: अदालत ने पुलिस को निर्देश दिया है कि प्रदर्शन स्थलों और 45 Detention centers in Delhi के सभी सीसीटीवी और डिजिटल साक्ष्यों को तुरंत सुरक्षित रखा जाए।
प्रश्न 4: महिला पत्रकारों के साथ पुलिस की झड़प (Journalist assault protest) पर कोर्ट ने क्या कदम उठाया?
उत्तर 4: कोर्ट ने कवरेज कर रही महिला पत्रकारों के साथ मारपीट के आरोपों की जांच के लिए Independent committee गठित करने और एक पत्रकार की गिरफ्तारी पर रोक लगाने का आदेश दिया है।
प्रश्न 5: क्या सरकार पत्रकारों के फोन जब्त (Police seized phones) कर सकती है?
उत्तर 5: सुनवाई के दौरान यह मुद्दा प्रमुखता से उठा, जिस पर सॉलिसिटर जनरल ने सफाई दी कि Police action rules के तहत वर्तमान में किसी भी पत्रकार का उपकरण जब्त नहीं किया गया है।
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