एजेंसी, धार। Bhojshala Dispute : मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक और विवादित भोजशाला परिसर को लेकर कानूनी लड़ाई अब देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के दहलीज पर पहुंच गई है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के हालिया फैसले के खिलाफ मौला कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी ने सुप्रीम कोर्ट में एक नई विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की है। सोसाइटी के सदर अब्दुल समद ने इस कूटनीतिक कदम की आधिकारिक पुष्टि की है। गौरतलब है कि इससे ठीक पहले, बीते 21 मई को काजी मोइनुद्दीन द्वारा भी इस फैसले को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत में एक याचिका दायर की जा चुकी है, जो फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
हाई कोर्ट ने निरस्त कर दिया था नमाज का 23 साल पुराना आदेश
यह पूरा विवाद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ के उस ऐतिहासिक फैसले के बाद दोबारा गरमाया है, जो 15 मई 2026 को सुनाया गया था। न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा था कि भोजशाला परिसर मूल रूप से एक मस्जिद नहीं बल्कि एक मंदिर है। इस कड़े फैसले के साथ ही हाई कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा 7 अप्रैल 2003 को जारी किए गए उस 23 साल पुराने आदेश को भी पूरी तरह निरस्त कर दिया था, जिसके तहत मुस्लिम पक्ष को प्रत्येक शुक्रवार की दोपहर 1 से 3 बजे के बीच परिसर में जाकर नमाज अदा करने की विशेष अनुमति मिली हुई थी।
कार्बन डेटिंग न होने और ऐतिहासिक साक्ष्यों को बनाया अपील का आधार
मौला कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी नई अपील में मुख्य रूप से एएसआई (ASI) द्वारा की गई वैज्ञानिक सर्वेक्षण प्रक्रिया की सत्यता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मुस्लिम पक्ष की याचिका में तर्क दिया गया है कि परिसर के भीतर चले पूरे 98 दिनों के विस्तृत सर्वे के दौरान जो भी पुरातात्विक वस्तुएं और प्राचीन अवशेष बरामद हुए थे, उनकी कोई वैज्ञानिक ‘कार्बन डेटिंग’ जांच नहीं कराई गई। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बिना कार्बन डेटिंग के यह तकनीकी रूप से सुनिश्चित कर पाना बिल्कुल नामुमकिन है कि वे अवशेष किस कालखंड और सदी से ताल्लुक रखते हैं।
700 सालों से इबादत करने का कोर्ट में किया दावा
सोसाइटी ने अपनी कानूनी दलील में ऐतिहासिक निरंतरता का हवाला देते हुए कोर्ट को बताया कि मुस्लिम समुदाय पिछले करीब 700 वर्षों से लगातार इस भोजशाला परिसर के भीतर बिना किसी रोक-टोक के नमाज अदा करता आ रहा है। इसी ऐतिहासिक कब्जे और धार्मिक परंपरा के आधार पर इस स्थल को एक वैध मस्जिद के रूप में मान्यता देने की मांग की गई है। मुस्लिम पक्ष का आरोप है कि हाई कोर्ट ने भोजशाला के ऐतिहासिक तथ्यों को मस्जिद के रूप में न मानकर एक बड़ी तथ्यात्मक चूक की है, जिसमें अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा हस्तक्षेप कर सुधार किए जाने की नितांत आवश्यकता है।
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