एजेंसी, गुवाहाटी। Assam UCC Bill : असम की राज्य सरकार ने सोमवार को ऐतिहासिक कदम उठाते हुए समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से संबंधित एक महत्वपूर्ण विधेयक को राज्य की विधानसभा के पटल पर रख दिया है। इस नए और व्यापक कानून के ड्राफ्ट में राज्य के भीतर बहुविवाह की प्रथा पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने का कड़ा प्रावधान किया गया है। इसके साथ ही, अब राज्य में रहने वाले जोड़ों के लिए सह-जीवन यानी लिव-इन संबंधों का आधिकारिक तौर पर पंजीकरण कराना भी पूरी तरह से अनिवार्य कर दिया गया है। असम सरकार द्वारा लाए गए इस कड़े विधेयक के नियमों में यह साफ तौर पर स्पष्ट किया गया है कि इसके दायरे से असम में निवास करने वाली सभी अनुसूचित जनजातियों को पूरी तरह बाहर रखा गया है, यानी यह कानून उन पर लागू नहीं होगा।
News Alert ! UCC Bill, introduced in Assam Assembly, aims to prohibit polygamy, set minimum marriage age at 21 years for men, 18 years for women.
UCC Bill, introduced in Assam Assembly, proposes registration of live-in relationships to recognise them. pic.twitter.com/FyNKsyL3zX
— Press Trust of India (@PTI_News) May 25, 2026
विपक्ष का भारी विरोध और सरकार का रुख
राज्य के संसदीय कार्य मंत्री अतुल बोरा ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा की अनुपस्थिति में उनकी तरफ से सदन के सामने ‘असम के लिए समान नागरिक संहिता, 2026 विधेयक’ को औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया। जैसे ही यह ऐतिहासिक विधेयक सदन के पटल पर रखा गया, वैसे ही विपक्षी खेमे में शामिल कांग्रेस, रायजोर दल और तृणमूल कांग्रेस जैसी प्रमुख पार्टियों ने इसका पुरजोर विरोध करना शुरू कर दिया। विपक्ष के तमाम नेताओं ने इस विधेयक को सदन में पेश किए जाने की प्रक्रिया पर आपत्ति जताते हुए मांग की कि इसे कानून का रूप देने से पहले राज्य के सभी सामाजिक और धार्मिक हितधारकों के साथ बहुत व्यापक स्तर पर विचार-विमर्श किया जाना बेहद जरूरी था।
विवाह और उत्तराधिकार कानूनों को सरल बनाने की कवायद
मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने इस नए कानून को लाने के पीछे के प्रमुख उद्देश्यों और कारणों को स्पष्ट करते हुए कहा कि इस विधेयक का मुख्य लक्ष्य राज्य में विवाह, तलाक, संपत्ति के उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों से जुड़े तमाम पुराने व जटिल कानूनों को पूरी तरह से एकीकृत और सरल बनाना है। मुख्यमंत्री ने सदन को जानकारी देते हुए बताया कि इस नए कानून के तहत विवाह के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं की न्यूनतम कानूनी उम्र 18 वर्ष तय की गई है। इसके साथ ही एक से अधिक विवाह करने यानी बहुविवाह की प्रथा पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। उन्होंने यह भी साफ किया कि यह विधेयक असम की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता की पूरी तरह रक्षा करता है, क्योंकि इसमें लोगों को अपने मौजूदा धार्मिक और पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार ही विवाह संपन्न करने की पूरी आजादी दी गई है।
कानूनी अधिकारों की रक्षा और लिव-इन संबंधों के नियम
पारिवारिक और कानूनी अधिकारों की मुस्तैदी से रक्षा करने के लिए इस नए कानून में विवाह और तलाक दोनों का सरकारी तौर पर पंजीकरण कराना पूरी तरह अनिवार्य बनाने का बड़ा प्रस्ताव रखा गया है। सरकार का मानना है कि यह कदम पति और पत्नी दोनों के लिए भरण-पोषण, संपत्ति की विरासत और अन्य आवश्यक कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से लिव-इन संबंधों का जिक्र करते हुए कहा कि राज्य के इतिहास में पहली बार सह-जीवन में रहने वाले लोगों के लिए एक मजबूत कानूनी ढांचा तैयार किया जा रहा है। इसका पंजीकरण अनिवार्य होने से इस तरह के रिश्तों में रहने वाले पुरुषों और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा तो होगी ही, साथ ही ऐसे संबंधों से पैदा होने वाले बच्चों को भी कानूनन समाज में पूरे अधिकार और सुरक्षा मिल सकेगी।
संपत्ति का समान वितरण और प्रशासनिक व्यवस्था
प्रस्तावित समान नागरिक संहिता का एक अन्य मुख्य उद्देश्य देश के पुराने उत्तराधिकार कानूनों में बड़े सुधार करना और उनका आधुनिकीकरण करना है। इसके लागू होने से राज्य के सभी नागरिकों के बीच पारिवारिक संपत्ति का निष्पक्ष और बिल्कुल समान वितरण सुनिश्चित किया जा सकेगा। मुख्यमंत्री शर्मा के अनुसार, संपत्ति के हस्तांतरण को न्यायसंगत बनाने के लिए राज्य के सभी निवासियों पर एक समान नियम लागू होंगे, चाहे उनका धार्मिक आधार कुछ भी हो। इन सभी सुधारों और नियमों को जमीनी स्तर पर सही तरीके से लागू करने के लिए सरकार राज्य में रजिस्ट्रार की नियुक्ति सहित एक मजबूत प्रशासनिक तंत्र भी खड़ा करेगी। मुख्यमंत्री ने यह भी जोड़ा कि यह संहिता केवल कागजी नीति नहीं है, बल्कि असम के समाज में सामाजिक न्याय और समानता लाने का एक व्यावहारिक जरिया बनेगी।
संवैधानिक सिद्धांतों और मौलिक अधिकारों की सुरक्षा
मुख्यमंत्री ने देश के संविधान का हवाला देते हुए याद दिलाया कि संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत राज्यों को अपने नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने का स्पष्ट निर्देश दिया गया है। असम का यह विधेयक इसी संवैधानिक सिद्धांत को जमीन पर उतारने का एक बड़ा प्रयास है ताकि राज्य के सभी नागरिकों के लिए एक जैसा कानूनी ढांचा तैयार किया जा सके। इस प्रकार की एक समान प्रणाली स्थापित होने से कानूनी तौर पर पूरी स्पष्टता आएगी और समाज के प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की रक्षा हो सकेगी। इस कानून के आने से असम की विधानसभा में यूसीसी की जरूरत और महत्व पर एक औपचारिक व गंभीर बहस की शुरुआत होगी, जो देश के नीति निर्माताओं और राष्ट्र के संस्थापकों द्वारा देखे गए अखंड व समान भारत के सपनों को सच करने का मार्ग प्रशस्त करेगी।
ये भी पढ़े : विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद तृणमूल कांग्रेस को लगा बड़ा झटका, दो महीने में मुख्यालय खाली करने का नोटिस
ताज़ा अपडेट और ब्रेकिंग न्यूज़ के लिए हमारे फेसबुक पेज से जुड़ें और STPV.live के साथ अपडेट रहें


