एजेंसी, लद्दाख। Army Helicopter Crash : पूर्वी लद्दाख के बेहद ऊंचे और पहाड़ी इलाके वाले तांगत्से सेक्टर में भारतीय सेना का एक चीता हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया है। लेह के पास हुए इस हादसे में एक वरिष्ठ कमांडर सहित सेना के तीन अधिकारी बाल-बाल बच गए हैं और उन्हें केवल मामूली चोटें आई हैं। रक्षा सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, यह पूरी घटना बीते 20 मई को लद्दाख के बेहद ऊबड़-खाबड़ और चुनौतीपूर्ण पहाड़ी क्षेत्र में एक ऑपरेशनल यानी सैन्य उड़ान के दौरान हुई थी। इस दुर्घटना की खबर आधिकारिक तौर पर शुक्रवार को सामने आई। आपको बता दें कि लद्दाख का यह पूरा क्षेत्र अपनी भौगोलिक बनावट के कारण दुनिया के सबसे कठिन और खतरनाक उड़ान वाले इलाकों में से एक माना जाता है, जहां अक्सर तेज हवाओं और खराब मौसम के बीच पायलटों को विमान उड़ाना पड़ता है।
An Indian Army Cheetah light helicopter met with an accident on May 20 in the Ladakh sector. The two pilots and Division Commander Major General Sachin Mehta suffered injuries in the accident but are safe and stable. A Court of Inquiry has been ordered into the incident to… pic.twitter.com/1nwl8128Ji
— ANI (@ANI) May 23, 2026
तीसरी इन्फैंट्री डिवीजन के मेजर जनरल थे सवार
आधिकारिक सूत्रों और सैन्य अधिकारियों के अनुसार, जिस वक्त यह हादसा हुआ, उस समय हेलीकॉप्टर में भारतीय सेना की तीसरी इन्फैंट्री डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग (जीओसी) मेजर जनरल सचिन मेहता सवार थे। इस विमान को उड़ाने और उसे नियंत्रित करने की जिम्मेदारी सेना के एक लेफ्टिनेंट कर्नल और एक मेजर स्तर के अधिकारी संभाल रहे थे। राहत की बात यह रही कि क्रैश होने के बावजूद हेलीकॉप्टर में सवार तीनों ही सैन्य अधिकारी पूरी तरह सुरक्षित रहने में कामयाब रहे। इस गंभीर हादसे के तुरंत बाद सेना के उच्च अधिकारियों ने घटना के वास्तविक कारणों और तकनीकी खामियों का सटीक पता लगाने के लिए ‘कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी’ के सख्त आदेश दे दिए हैं। इस मामले में शुरुआती जांच शुरू कर दी गई है, हालांकि दुर्घटना किस वजह से हुई, इसके सही कारणों का खुलासा पूरी जांच रिपोर्ट आने के बाद ही हो पाएगा।
दुर्गम इलाकों में सेना की रीढ़ है चीता हेलीकॉप्टर
भारतीय सेना का यह चीता हेलीकॉप्टर मूल रूप से एक हल्का यूटिलिटी विमान है, जिसे लंबे समय से भारत के अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में होने वाले हवाई ऑपरेशन्स की रीढ़ माना जाता रहा है। यह हेलीकॉप्टर दुनिया के कुछ सबसे ऊंचे और खतरनाक लैंडिंग ग्राउंड्स के साथ-साथ सुदूर अग्रिम चौकियों तक भी उड़ान भरने की अद्भुत क्षमता रखता है। लद्दाख, सियाचिन ग्लेशियर और पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों जैसे बेहद जटिल इलाकों में सैनिकों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने, आपातकालीन स्थिति में घायलों को सुरक्षित बाहर निकालने, दुश्मनों पर नजर रखने के लिए जासूसी मिशन चलाने और अग्रिम चौकियों तक रसद एवं जरूरी सामान की आपूर्ति (लॉजिस्टिक्स सपोर्ट) सुनिश्चित करने में इस हेलीकॉप्टर ने हमेशा ही एक केंद्रीय और बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
दशकों पुराना इतिहास और आधुनिक बदलाव की जरूरत
तकनीकी इतिहास की बात करें तो फ्रांस में विशेष रूप से डिजाइन किए गए एयरोस्पेशियल एसए 315 बी लामा मॉडल पर आधारित इस चीता हेलीकॉप्टर का निर्माण भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की दिग्गज कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) द्वारा किया जाता है। दशकों पहले भारतीय सेना के बेड़े में शामिल किए गए इस हेलीकॉप्टर ने बेहद खराब मौसम, जमा देने वाली ठंड और दुर्गम परिस्थितियों में भी अपनी जबरदस्त विश्वसनीयता का लोहा मनवाया है। हालांकि, कई दशकों के शानदार ऑपरेशनल रिकॉर्ड और देश सेवा के बावजूद, अब पुराना हो चुका यह पूरा बेड़ा तकनीकी रूप से रखरखाव और सर्विसिंग से जुड़ी कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। यही वजह है कि सेना के आधुनिकीकरण अभियान के तहत अब इन पुराने चीता हेलीकॉप्टरों को चरणबद्ध तरीके से हटाकर उनकी जगह नई पीढ़ी के आधुनिक और अधिक सुरक्षित हेलीकॉप्टरों को बेड़े में शामिल करने के प्रयास तेजी से किए जा रहे हैं।
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