SC Notice 

मुस्लिम बहुविवाह की संवैधानिक वैधता पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को जारी किया नोटिस

नई दिल्ली राष्ट्रीय

एजेंसी, नई दिल्ली। Muslim Polygamy SC Notice : मुस्लिम समुदाय में प्रचलित बहुविवाह (पॉलीगामी) प्रथा की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक नई जनहित याचिका पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ा संज्ञान लिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर उसका आधिकारिक जवाब तलब किया है। यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए प्रस्तुत किया गया था। शीर्ष अदालत ने महिला अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा दायर इस याचिका को पहले से लंबित इसी तरह के अन्य मामलों के साथ संबद्ध कर दिया है।

मुस्लिम पर्सनल लॉ 1937 की धारा 2 की संवैधानिकता को दी गई चुनौती

अधिवक्ता श्रिया मैनी के माध्यम से महिला अधिकार कार्यकर्ता जकिया सोमन और नूरजहां सफिया नियाज द्वारा दायर इस याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) एप्लिकेशन एक्ट, 1937 की धारा 2 को सीधे तौर पर चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि यह कानून बहुविवाह प्रथा को कानूनी मान्यता प्रदान करता है, जिसके कारण एक बड़ा कानूनी अंतर पैदा होता है। इसके चलते मुस्लिम महिलाओं को भारतीय न्याय संहिता की धारा 82 के तहत अन्य सभी भारतीय नागरिकों को प्राप्त बहुविवाह विरोधी कानूनी संरक्षण से पूरी तरह वंचित होना पड़ता है।

बीएनएस की धारा 82 को समान रूप से लागू करने की मांग

याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय से मांग की है कि केंद्र सरकार को बहुविवाह की प्रथा को समाप्त करने के लिए ठोस विधायी कदम उठाने के निर्देश दिए जाएं। याचिका में कहा गया है कि धर्म निरपेक्षता और समानता के सिद्धांत को अपनाते हुए भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 82 के तहत बहुविवाह को एक आपराधिक कृत्य माना जाए और इसे सभी धर्मों के नागरिकों पर समान रूप से लागू किया जाए। इसके साथ ही गुप्त रूप से होने वाले दूसरे या तीसरे विवाहों को रोकने के लिए सभी मुस्लिम विवाहों और तलाकों का सरकारी अधिकारियों के पास अनिवार्य पंजीकरण कराने के निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया है।

मौलिक अधिकारों और लैंगिक न्याय के हनन का दिया गया तर्क

संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस रिट याचिका में तर्क दिया गया है कि बहुविवाह प्रथा मूल रूप से भेदभावपूर्ण है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) का स्पष्ट उल्लंघन करती है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, अनुच्छेद 25 के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा संवैधानिक नैतिकता और लैंगिक न्याय के अधीन है, जिसे किसी भी पितृसत्तात्मक रीति-रिवाज से ऊपर रखा जाना चाहिए।

पहली पत्नी और बच्चों के संरक्षण के लिए विशेष प्रावधान की अपील

याचिका में अदालत से यह भी अपील की गई है कि यदि कोई पुरुष पहली पत्नी के रहते हुए दूसरा विवाह करता है, तो पहली पत्नी और बच्चों के वैवाहिक घर में रहने के अधिकार को सुरक्षित किया जाए। इसके साथ ही बहुविवाह से जुड़े विवादों के मामलों में त्वरित भरण-पोषण प्रक्रिया तय करने का निर्देश देने की गुजारिश की गई है। याचिका में जोर दिया गया है कि यह प्रथा महिलाओं और बच्चों पर गहरा मानसिक तथा शारीरिक आघात पहुंचाती है, इसलिए इसे बिना किसी धार्मिक छूट के सभी के लिए अमान्य घोषित किया जाना बेहद आवश्यक है।

इस पूरे मामले और मुख्य बिंदुओं को समझने के लिए नीचे दिए गए प्रमुख प्रश्नों और उनके उत्तरों को पढ़ें :

प्रश्न 1: सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम बहुविवाह मामले में क्या ताजा कदम उठाया है?

उत्तर: शीर्ष अदालत ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर आधिकारिक जवाब मांगा है।

प्रश्न 2: इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की किस पीठ द्वारा की जा रही है?

उत्तर: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है।

प्रश्न 3: याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ 1937 के किस प्रावधान को चुनौती दी गई है?

उत्तर: याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) एप्लिकेशन एक्ट, 1937 की धारा 2 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।

प्रश्न 4: याचिकाकर्ताओं की बीएनएस (भारतीय न्याय संहिता) को लेकर क्या मांग है?

उत्तर: याचिका में बहुविवाह का अपराध तय करने वाली बीएनएस की धारा 82 को बिना किसी धार्मिक छूट के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू करने की मांग की गई है।

प्रश्न 5: याचिका में महिलाओं और बच्चों के अधिकारों के संरक्षण के लिए क्या सुझाव दिए गए हैं?

उत्तर: पहली पत्नी और बच्चों के रहने का अधिकार सुरक्षित करने, त्वरित भरण-पोषण तय करने और सभी निकाह व तलाक का सरकारी पंजीकरण अनिवार्य करने की मांग की गई है।

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