एजेंसी, वॉशिंगटन। Trump 200% Tariff on Pharma : संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हाल ही में ली गई नई आर्थिक और व्यापारिक नीतियों के अंतर्गत आयातित जेनेरिक दवाओं पर भारी-भरकम सीमा शुल्क यानी टैरिफ लगाने का एक बड़ा निर्णय लिया गया है। इस अप्रत्याशित निर्णय के तहत 1 अगस्त 2026 से प्रभावी होने वाले नए नियमों के अनुसार अमेरिका में बाहर से आने वाली तमाम जेनेरिक दवाओं पर शुरुआती 2 वर्षों की अवधि के लिए शून्य प्रतिशत शुल्क का प्रावधान रखा गया है। हालांकि इस राहत की समय-सीमा समाप्त होते ही अगले 1 वर्ष के लिए शुल्क की दर को बढ़ाकर सीधे 100 प्रतिशत कर दिया जाएगा। इसके उपरांत आगामी चरण में इसे और अधिक सख्त करते हुए 200 प्रतिशत की उच्चतम सीमा तक पहुंचा दिया जाएगा। अमेरिकी प्रशासन का यह निर्णय अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विशेषकर वैश्विक दवा आपूर्ति श्रृंखला के दृष्टिकोण से एक बहुत ही संवेदनशील मोड़ माना जा रहा है, जिसका प्रत्यक्ष असर कई विकासशील देशों के दवा निर्यात पर पड़ना तय है।
Effective August 1st, 2026, all Generic Drugs being brought into the United States will continue to have a TARIFF of ZERO PERCENT for a two year period of time, after which the TARIFF will be raised to 100% for a one year period of time, and 200% thereafter. This is done in order… pic.twitter.com/hX0citsvLj
— Commentary Donald J. Trump Truth Social Posts On X (@TrumpTruthOnX) July 21, 2026
अमेरिका में घरेलू निर्माण और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने का लक्ष्य
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक विशेष संदेश साझा करते हुए इस कड़े निर्णय के पीछे की मुख्य वजह स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि इस आक्रामक टैरिफ संरचना का प्राथमिक उद्देश्य अमेरिका के भीतर घरेलू दवा निर्माण और मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों को बड़े पैमाने पर पुनर्जीवित करना है। प्रशासन चाहता है कि दुनिया भर की प्रमुख फार्मा कंपनियां अमेरिका के स्थानीय बाजारों पर निर्भर रहने के बजाय देश के भीतर ही अपनी उत्पादन प्रयोगशालाएं और मैन्युफैक्चरिंग प्लांट स्थापित करें। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि दवाओं जैसी अति-आवश्यक वस्तुओं के लिए किसी अन्य देश पर अत्यधिक निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा दोनों के लिहाज से जोखिम भरी हो सकती है, इसलिए घरेलू स्तर पर उत्पादन को आत्मनिर्भर बनाना इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
डेडलाइन का पालन न करने पर कंपनियों पर लगेगा भारी जुर्माना
अपनी नीति को और अधिक व्यावहारिक तथा कड़ा बनाते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ने दवा निर्माता कंपनियों को एक निश्चित समय-सीमा के भीतर अपनी स्थानीय विनिर्माण सुविधाएं स्थापित करने का कड़ा निर्देश दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि जो विदेशी या घरेलू कंपनियां निर्धारित डेडलाइन के अंदर अमेरिका की सीमाओं के भीतर अपने संयंत्र, मशीनरी और आवश्यक तकनीकी उपकरण स्थापित करने में विफल रहेंगी, उनके खिलाफ सख्त वित्तीय जुर्माने और दंडात्मक कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इसके साथ ही प्रशासन ने यह भी साफ कर दिया है कि यह अत्यधिक टैरिफ व्यवस्था केवल और केवल जेनेरिक दवाओं के आयात पर लागू होगी। जो दवाएं पेटेंट के अंतर्गत आती हैं या फिर ब्रांडेड और इनोवेटिव श्रेणी की हैं, उनके लिए मौजूदा नियमों और शुल्क संरचना में फिलहाल कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।
भारत के फार्मा निर्यात और अर्थव्यवस्था पर मंडराता बड़ा खतरा
वॉशिंगटन द्वारा उठाए गए इस अप्रत्याशित कदम से भारतीय फार्मास्युटिकल सेक्टर को सबसे ज्यादा चिंता का सामना करना पड़ रहा है। उल्लेखनीय है कि भारत को संपूर्ण विश्व में ‘दुनिया की फार्मेसी’ के रूप में एक मजबूत पहचान हासिल है और वह अमेरिका के विशाल बाजार में जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा और विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता रहा है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव यानी GTRI द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 के दौरान भारत ने अकेले अमेरिका को 9.7 अरब डॉलर मूल्य की दवाओं का निर्यात किया था। यह आंकड़ा भारत के कुल 25.8 अरब डॉलर के वैश्विक दवा निर्यात का लगभग 38 प्रतिशत हिस्सा प्रस्तुत करता है। इतने बड़े पैमाने पर होने वाले व्यापार पर 100 से 200 प्रतिशत का शुल्क लागू होने से भारतीय दवाएं अमेरिकी बाजार में अत्यधिक महंगी हो जाएंगी, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर सीधा प्रहार होगा।
विशेषज्ञ समीक्षा और भविष्य की वैश्विक चुनौतियां
स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों और व्यापार विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह चरणबद्ध टैरिफ योजना बिना किसी संशोधन के लागू कर दी जाती है, तो इसका भारतीय फार्मा कंपनियों के मुनाफे और राजस्व पर दूरगामी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। सन फार्मा, डॉ रेड्डीज, सिप्ला और लुपिन जैसी दिग्गज भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखना एक बड़ी चुनौती साबित होगा। शुरुआती 2 वर्षों के दौरान शून्य शुल्क रहने से कंपनियों को अपनी रणनीति बदलने या अमेरिका में विनिर्माण इकाइयां स्थापित करने का थोड़ा समय तो अवश्य मिलेगा, परंतु दीर्घकालिक दृष्टिकोण से 200 प्रतिशत का कर ढांचा व्यापारिक संतुलन को पूरी तरह से बिगाड़ सकता है। विश्लेषकों के अनुसार इस नीति से न केवल भारत के निर्यात पर असर पड़ेगा, बल्कि स्वयं अमेरिका के आम नागरिकों के लिए भी सस्ती जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है और वहां स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च काफी हद तक बढ़ सकता है।
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