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मध्य प्रदेश में जन आंदोलन बन रहा एक पेड़ मां के नाम

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मध्य प्रदेश में जन आंदोलन
बन रहा एक पेड़ मां के नाम

भारतीय संस्कृति और जीवन पद्धति में पर्यावरण का स्थान केवल एक विषय या जिम्मेदारी के रूप में नहीं, बल्कि हमारी आत्मा के एक अभिन्न हिस्से के रूप में रहा है। हाल ही में विश्व पर्यावरण दिवस के पावन अवसर पर मध्य प्रदेश में आरंभ हुआ ‘एक पेड़ मां के नाम 2.0’ अभियान इसी शाश्वत सोच और सनातन दृष्टि का जीवंत विस्तार है। यह आयोजन इस बात का सशक्त प्रमाण है कि जब देश का नेतृत्व और प्रादेशिक सरकारें एक दूरदर्शी सोच के साथ धरातल पर उतरती हैं, तो प्रकृति का संरक्षण केवल एक सरकारी कार्यक्रम न रहकर जन-आंदोलन का रूप ले लेता है। वर्तमान दौर में जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा संकट और अलनीनो जैसी विषम भौगोलिक परिस्थितियों से जूझ रही है, तब भारत अपनी जड़ों की ओर लौटकर न केवल खुद को सुरक्षित कर रहा है, बल्कि वैश्विक मंच पर पर्यावरण संरक्षण के एक मार्गदर्शक के रूप में उभर रहा है। यह हमारे नीति-नियंताओं के कुशल विजन और देश की प्राचीन परंपराओं के अनूठे संगम का ही परिणाम है कि आज हम विकास की दौड़ में पर्यावरण को पीछे छोड़ने के बजाय, उसे साथ लेकर चलने की कला में पारंगत हो रहे हैं।

​हमारी सनातन संस्कृति की मूल अवधारणा हमेशा से प्रकृति-अनुकूल जीवन पद्धति पर आधारित रही है। इस भूमि पर पर्यावरण कोई बाहरी तत्व नहीं है, जिसे बचाने के लिए कृत्रिम प्रयास किए जाएं; यह तो हमारी दैनिक पूजा-पाठ, संध्यावंदन और जीवन के संस्कारों में रचा-बसा है। सूर्य को अर्घ्य देना हो या तुलसी के बिना भगवान का भोग अधूरा मानना, ये प्रतीक दर्शाते हैं कि हमारी जीवन शैली आदिकाल से ही सह-अस्तित्व के सिद्धांत पर टिकी है। जब हमारे पूर्वज रात के समय पौधों की पत्तियां तोड़ने से भी मना करते थे, तो उसके पीछे गहरा वैज्ञानिक और संवेदनशील दृष्टिकोण था कि उस समय वनस्पति विश्राम कर रही होती है। ‘यत पिंडे-तत ब्रह्मांडे’ का हमारा दर्शन इसी सत्य को रेखांकित करता है कि जो इस ब्रह्मांड में है, वही हमारे शरीर में है; अर्थात प्रकृति को नुकसान पहुंचाना स्वयं को नुकसान पहुंचाने के समान है। भारतीय वैज्ञानिकों ने भी हमेशा दुनिया के सामने इसी सच को प्रमाणित किया कि पौधों में भी जीवन होता है। हमारे शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि एक पेड़ दस पुत्रों के समान होता है, क्योंकि वह पीढ़ियों तक छाया, प्राणवायु और जीवन देता है। इसी पावन भाव को आत्मसात करते हुए मध्य प्रदेश में चलाया जा रहा ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ नदियों, कुओं, बावड़ियों और प्राचीन तालाबों के जीर्णोद्धार का एक भगीरथ प्रयास है, जो हमारी ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहरों को सहेजने का काम कर रहा है।
​आज का भारत एक ऐसे मजबूत और निर्णायक नेतृत्व के दौर में है, जिसने न केवल आंतरिक सुरक्षा और राष्ट्रीय गौरव को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है, बल्कि पर्यावरण और ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में भी देश को आत्मनिर्भर बनाया है। वैश्विक स्तर पर जब पश्चिम एशिया के संकटों के कारण पेट्रोल-डीजल और पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, तब भारत अपनी ग्रीन एनर्जी नीतियों के कारण पूरी मजबूती से खड़ा है। मध्य प्रदेश में सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायोमास और जल विद्युत परियोजनाओं के माध्यम से ६२ मेगावाट से अधिक हरित ऊर्जा की दिशा में तेजी से काम होना इसी संकल्प का हिस्सा है। खजुराहो जैसे ऐतिहासिक स्थलों पर बड़े ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स का संचालन इस बात का संकेत है कि हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक और स्वच्छ तकनीकों से जोड़ रहे हैं। इसके साथ ही, वन्यजीवों के संरक्षण और पारिस्थितिक तंत्र को संतुलित करने के लिए चीतों का पुनर्वास और अन्य राज्यों से दुर्लभ वन्यप्राणियों को लाकर सह-अस्तित्व की भावना को मजबूत करना देश के पर्यावरण प्रेम की एक सुंदर मिसाल पेश करता है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कालिया नाग के मर्दन की कथा भी हमें यही सिखाती है कि जल, वायु और पृथ्वी जैसे संसाधनों पर समाज के हर वर्ग का समान अधिकार है और इन्हें प्रदूषित करने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती।
​एक जिम्मेदार राष्ट्र और राज्य वही होता है जो अतीत की गलतियों को सुधारते हुए भविष्य के लिए एक साफ-सुथरा मार्ग तैयार करे। दशकों पुरानी औद्योगिक त्रासदियों और पर्यावरण को पहुंचे नुकसान के जख्मों को ठीक करना इस बात का सबूत है कि वर्तमान नीतियां केवल कागजी वादों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे धरातल पर ठोस परिणाम दे रही हैं। वर्षों पुराने औद्योगिक कचरे का सफलतापूर्वक निष्पादन करना और उस भूमि के नए एवं सुरक्षित प्रबंधन की दिशा में आगे बढ़ना यह दिखाता है कि इच्छाशक्ति हो तो बड़े से बड़े कलंक को भी मिटाया जा सकता है। इसके साथ ही, सर्कुलर इकॉनॉमी और सतत विकास के सिद्धांतों को बढ़ावा देने के लिए कोर्स मॉड्यूल लॉन्च करना और पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले उद्योगों, सामाजिक संगठनों तथा शैक्षणिक संस्थाओं को राज्य स्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित करना एक बेहद सकारात्मक कदम है। यह दृष्टिकोण समाज में एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को जन्म देता है, जहां हर नागरिक और संस्थान पर्यावरण के प्रति अपनी जवाबदेही समझने लगता है।
​अंततः, ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसे अभियान केवल वृक्षारोपण की औपचारिकता नहीं हैं, बल्कि यह प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता और अपनी मां के प्रति सम्मान को एक सूत्र में पिरोने का एक भावुक और प्रभावी माध्यम है। जब समाज का हर व्यक्ति इस अभियान से जुड़ेगा और प्रकृति के संरक्षण को अपनी जीवन शैली का हिस्सा बनाएगा, तभी हम आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित, हरा-भरा और समृद्ध भविष्य सौंप पाएंगे। आज का आत्मनिर्भर और सशक्त भारत विज्ञान, अंतरिक्ष, खेल और तकनीक के क्षेत्र में अपनी धाक जमाने के साथ-साथ अपनी प्राकृतिक संपदा, वनों और खनिजों के प्रति भी उतना ही संवेदनशील है। विकास और पर्यावरण के बीच का यह सकारात्मक संतुलन ही नए भारत की असली पहचान है, जो पूरी दुनिया को शांति, सह-अस्तित्व और पर्यावरण संरक्षण का एक नया और व्यावहारिक मार्ग दिखा रहा है।

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