भाजपा की बढ़ती सामाजिक स्वीकार्यता का परिणाम और प्रमाण दिल्ली विजय

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दिल्ली के चुनाव में फतह हासिल करने के बाद भारतीय जनता पार्टी देश का एकमात्र ऐसा राजनीतिक दल बन गया है जिसने संघर्ष करते हुए अनेक ऐसे सोपान तय कर दिए, जिन्हें आने वाले समय में विद्यार्थी पढ़ेंगे और सियासत के अनुभवों से काफी कुछ सीख सकेंगे। यह बात इसलिए लिखना प्रासंगिक लगती है, क्योंकि यह एकमात्र ऐसा राजनीतिक संगठन है जिस पर आजादी के पहले और आजादी के बाद सत्ता पर काबिज संगठन द्वारा कभी देशद्रोह के तो कभी सांप्रदायिकता के आरोप लगाए जाते रहे हैं। यही नहीं, समय-समय पर पहले जनसंघ और फिर भारतीय जनता पार्टी अनेक बंदिशों की शिकार भी होती रही हैं। और तो और, इनके नेताओं को खतरनाक अपराधियों के साथ लंबे कालखंड तक जेलों में भी बंद रखा गया। लेकिन तारीफ करना पड़ेगी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कोख से जन्म लेने वाली जनसंघ और आज की भारतीय जनता पार्टी की, उसके कार्यकर्ताओं ने अपना धैर्य नहीं खोया। सबसे बड़ी तारीफ की बात तो यह है कि इस पार्टी ने अनेक प्रतिकूलताओं के बाद भी ढेर सारी राजनीतिक और चुनावी हार झेलने के बाद भी अपनी रीति नीति से समझौता नहीं किया। यह जन्मजात राष्ट्रवादी बनी रही और आज भी भाजपा नेताओं ने तुष्टिकरण का रास्ता नहीं अपनाया है। यदि किसी वर्ग विशेष को लगता है कि हमें भाजपा को वोट नहीं करना है तो भाजपा ने भी उन्हें अपने पाले में करने को लेकर बहुत ज्यादा आतुरता नहीं दिखाई। हां संवैधानिक और अन्य संभावित तरीकों से यह संदेश लगातार जाहिर करती रही कि हमें तुमसे बैर नहीं, लेकिन हम राष्ट्रवाद और सनातन का झंडा बुलंद करते रहे हैं सो आगे भी करते रहेंगे। यदि इस स्वरूप में हमें कोई स्वीकार करता है तो उसका सहर्ष स्वागत है। किंतु, यदि कोई अपने मत के बदले यह उम्मीद करे कि भाजपा इसके लिए अपनी रीति और नीति से समझौता कर लेगी तो यह असंभव ही रहेगा। शायद यही वजह है की भाजपा का कद देश और दुनिया में लगातार बढ़ रहा है। अब यह इतना बढ़ चला है कि उसकी यश कीर्ति भारतीय सीमाओं को पार करके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व के लोगों को प्रभावित करने लगी हैं। इस पार्टी के नेता और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राजनीतिक कद तो इतना ऊंचा हो चला है कि दुनिया भर के राजनेता उन्हें वैश्विक व्यक्तित्व के रूप में मान्यता देने लगे हैं। तो फिर भारतीय जनता उन्हें सम्मान ना दे, यह कैसे हो सकता है? विरोधी दल भले ही भाजपा और श्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ प्रोपेगेंडा खड़ा करते रहें । लेकिन सत्य यही है कि श्री मोदी के कथन को अब जनता के बीच गारंटी के रूप में मान्यता प्राप्त है। यही वजह है कि देश के विभिन्न राज्यों में से कुछ जगहों पर भले ही विरोधी पक्षों की सरकार हो, लेकिन जब लोकसभा के चुनाव होते हैं तब आम जनता का मत अधिकतम भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी के पक्ष में ही जाता दिखाई दे रहा है। यह भी गौर करने लायक बात है कि जहां भाजपा परिस्थितिवश अथवा सुनियोजित रणनीति के तहत राज्य स्तरीय चुनावों में मुख्यमंत्री का चेहरा प्रस्तुत करने में रुचि नहीं रखती, वहां मतदाता नरेंद्र मोदी के चेहरे को देखकर विधानसभा के चुनाव में भी अपनी समस्याओं और मुद्दों को लेकर निश्चिंतता का अनुभव करने लगा है। इस बात को दिल्ली विधानसभा के चुनाव में बेहद स्पष्ट रूप से देखा और महसूस किया जा सकता है। सब जानते हैं कि दिल्ली विधानसभा के चुनाव में आम आदमी पार्टी और उसके नेताओं ने हमेशा की तरह इस बार भी विक्टिम कार्ड खेलने का भरपूर प्रयास किया। अपनी हर असफलता को भाजपा के सिर मढ़ने के प्रयास बड़े पैमाने पर किए गए। शायद इसीलिए सत्ता पर काबिज आप और उसके नेता पूरी तरह आश्वस्त थे कि इस बार भी दिल्ली के मतदाता गुमराह किया जा सकेंगे और एक बार फिर दिल्ली फतह की जा सकेगी। लेकिन आम आदमी पार्टी समेत अन्य विरोधी दलों के मुगालते उस समय भंग हो गए जब भाजपा हमेशा की तरह राष्ट्रवाद और जनहितैषी निर्णयों को आगे रखकर चुनावी मैदान में डटी रही। इस सबसे बढ़कर इस पार्टी के नेताओं ने जब मोदी की गारंटी को अपना बोध वाक्य बनाया तो दिल्ली के मतदाताओं को चुनावी परिदृश्य के अंतिम सप्ताह में ही सही, यह भरोसा हो गया कि अब वाकई में क्षेत्र का विकास चाहिए तो वहां डबल इंजन की सरकार को स्थापित करना ही दिल्ली के हित में है। क्योंकि दिल्ली समेत पूरे देश में एक बात तो स्थापित हो चुकी है कि श्री मोदी जो एक बार कह देते हैं वह करके अवश्य दिखाते हैं। यही कारण रहा कि अनेक भ्रामक प्रचारों के बाद भी जनता भ्रमित नहीं हुई और उसने भाजपा को स्पष्ट जनादेश देकर केंद्र के बाद अब राज्य की सत्ता में भी स्थापित कर दिखाया। इस चुनाव में मध्य प्रदेश की भाजपा इकाई और यहां के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव तथा उनके मंत्रिमंडल ने जो भूमिका निभाई है, उनको भी इस ऐतिहासिक जीत का श्रेय जाता है।

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