एजेंसी, नई दिल्ली। BJP Rajya Sabha : देश के राजनैतिक गलियारों में इस समय मोदी सरकार की कैबिनेट में एक बहुत ही बड़े और व्यापक फेरबदल को लेकर अटकलों का बाजार काफी गर्म हो गया है। इस भारी राजनैतिक चर्चा की मुख्य वजह भारतीय जनता पार्टी द्वारा आगामी 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए जारी की गई 11 उम्मीदवारों की नई आधिकारिक सूची है। इस ताजा सूची में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली और ध्यान खींचने वाली बात यह सामने आई है कि वर्तमान केंद्र सरकार के दो प्रमुख मंत्रियों, रवनीत सिंह बिट्टू और जॉर्ज कुरियन को इस बार राज्यसभा का टिकट नहीं थमाया गया है।
भारतीय जनता पार्टी की केन्द्रीय चुनाव समिति ने विभिन्न प्रदेशों में होने वाले राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव एवं ओडिशा के उप-चुनाव 2026 हेतु निम्नलिखित नामों पर अपनी स्वीकृति प्रदान की है। pic.twitter.com/SNA6aMsDlC
— BJP (@BJP4India) June 4, 2026
गौरतलब है कि जॉर्ज कुरियन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वर्तमान मंत्रिपरिषद में एकमात्र ईसाई समुदाय से आने वाले मंत्री हैं, जबकि रवनीत सिंह बिट्टू पंजाब के एक बेहद कद्दावर और बड़े नेता माने जाते हैं। मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों से निवर्तमान राज्यसभा सांसद होने के बावजूद भी इन दोनों बड़े नेताओं को पार्टी द्वारा दोबारा मौका न दिए जाने के इस सख्त फैसले ने देश की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
इन कारणों से कैबिनेट में बड़े बदलाव की अटकलें हुई तेज
इन दोनों ही केंद्रीय मंत्रियों का नाम सूची से पूरी तरह साफ होने के बाद से ही मोदी मंत्रिमंडल में बहुत जल्द एक बड़े फेरबदल की संभावनाओं को बहुत ज्यादा बल मिल रहा है। यह राजनैतिक चर्चा इसलिए भी काफी जोर पकड़ रही है क्योंकि अभी हाल ही के दिनों में सरकार के दो अन्य कनिष्ठ (जूनियर) मंत्रियों, पंकज चौधरी और हर्ष मल्होत्रा को सरकार से इतर संगठन के भीतर बेहद अहम और बड़ी सांगठनिक जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। इनमें पंकज चौधरी को देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में बीजेपी का नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, जबकि हर्ष मल्होत्रा को देश की राजधानी दिल्ली में बीजेपी का नया प्रमुख बनाया गया है।
हालांकि, सामरिक और राजनैतिक जानकारों का यह भी मानना है कि भारतीय जनता पार्टी ने अभी झारखंड और कर्नाटक जैसे राज्यों के लिए अपने उम्मीदवारों के नामों का आधिकारिक एलान नहीं किया है। ऐसी स्थिति में अभी भी इस बात की थोड़ी बहुत गुंजाइश जरूर बची हुई है कि इन दोनों मंत्रियों में से किसी एक को उन राज्यों की खाली सीटों के जरिए दोबारा राज्यसभा के सदन में भेज दिया जाए। वैसे, देश के संवैधानिक नियमों के मुताबिक यदि कोई व्यक्ति संसद का सदस्य नहीं भी रहता है, तब भी वह अधिकतम छह महीने की अवधि तक अपने मंत्री पद पर पूरी तरह से बना रह सकता है। इससे पहले साल 2022 में भी मुख्तार अब्बास नकवी और आरसीपी सिंह जैसे बड़े मंत्रियों के साथ ठीक ऐसा ही राजनैतिक घटनाक्रम देखने को मिल चुका है।
पुराने चेहरों को दरकिनार कर नए और निष्ठावान कार्यकर्ताओं पर जताया भरोसा
इस बार के राज्यसभा चुनाव के लिए टिकट बांटते समय भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने एक बेहद ही कड़ा और चौंकाने वाला रुख अख्तियार किया है। पार्टी ने अपने किसी भी निवर्तमान (पुराने) सांसद को दोबारा मैदान में नहीं उतारा है, बल्कि उसकी जगह पूरी तरह से नए, ऊर्जावान और संगठन के प्रति हमेशा वफादार रहने वाले चेहरों पर अपना बड़ा दांव खेला है। इसी रणनीति के तहत पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ और राजस्थान के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया को पार्टी पहली बार उच्च सदन यानी संसद भेजने की पूरी तैयारी में है।
जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने के लिहाज से गुजरात राज्य से पार्टी ने राजूभाई शुक्ला, मुकेशभाई राठवा, मानसिंह परमार और जितेंद्र कंजारिया को अपना आधिकारिक उम्मीदवार चुना है। इन नामों के जरिए पार्टी ने राज्य के भीतर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और आदिवासी समुदायों को बहुत खास तरजीह और सम्मान देने का प्रयास किया है।
वहीं दूसरी तरफ, पूर्वोत्तर भारत के राज्यों को मजबूती देने के लिए मणिपुर की वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष ए शारदा देवी और अरुणाचल प्रदेश से पूर्व प्रदेश प्रमुख ताई तगाक को संसद का टिकट दिया गया है। इसके अलावा अगर ओडिशा राज्य की बात करें, तो वहां से कुछ ही समय पहले बीजू जनता दल (बीजेडी) का साथ छोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थामने वाले नेता देबाशीष सामंतराय को पार्टी ने अपना उम्मीदवार घोषित कर सबको चौंका दिया है।
दोनों मंत्रियों को लेकर संगठन की क्या हो सकती है आगामी रणनीति
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते और सिखों के बीच एक बेहद मजबूत जाट सिख चेहरा माने जाने वाले रवनीत सिंह बिट्टू का नाम इस सूची में शामिल न होना कई राजनैतिक विश्लेषकों के लिए काफी हैरानी भरा फैसला है। लेकिन अंदरूनी राजनीति को समझने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि पार्टी आलाकमान उन्हें पंजाब में आने वाले आगामी विधानसभा चुनावों में पार्टी को मजबूत करने और वहां पूरी तरह से ध्यान केंद्रित करने की एक बड़ी जिम्मेदारी सौंप सकता है।
वहीं दूसरी ओर, दक्षिण भारत के केरल राज्य से आने वाले बेहद अनुभवी और वरिष्ठ नेता जॉर्ज कुरियन अभी हाल ही में हुए राज्य के विधानसभा चुनाव में हार गए थे, इसलिए उनके राजनैतिक पुनर्वास और भविष्य को लेकर भी संगठन के भीतर कोई एक नई और दीर्घकालिक रणनीति तैयार की जा सकती है। इसके अलावा, पंजाब राज्य के समीकरणों को संतुलित रखने के लिए पार्टी ने जहां प्रदेश अध्यक्ष के रूप में एक जाट सिख चेहरे को कमान सौंप रखी है, वहीं राज्यसभा के लिए हिंदू चेहरे तरुण चुघ को आगे बढ़ाकर अपने पुराने और पारंपरिक शहरी वोटरों को भी एक साथ साधने का बहुत ही बेहतरीन संतुलन स्थापित किया है।
विधानसभाओं के संख्या बल के आधार पर 11 सीटों पर भाजपा की जीत तय
इस बार जिन पुराने और निवर्तमान राज्यसभा सांसदों का टिकट काटा गया है, उनमें गुजरात से रामभाई मोकारिया, अमीन नरहरि, रमीला बारा; राजस्थान से राजेंद्र गहलोत; मणिपुर से लीशेम्बा सनाजाओबा; अरुणाचल प्रदेश से नबाम रेबिया और मध्य प्रदेश से सुमेर सिंह सोलंकी का नाम मुख्य रूप से शामिल है।
इन सभी संबंधित राज्यों की विधानसभाओं में भारतीय जनता पार्टी के पास मौजूद भारी और मजबूत विधायकों के संख्या बल के चलते पार्टी का कम से कम 10 सीटों पर बिना किसी अड़चन के जीतना पूरी तरह से तय माना जा रहा है। इन पक्की सीटों में गुजरात से चार, राजस्थान और मध्य प्रदेश से दो-दो, तथा मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश से एक-एक सीट शामिल है। इसके साथ ही, ओडिशा राज्य की एकमात्र खाली हुई उपचुनाव वाली सीट पर भी भाजपा के मजबूत पक्ष को देखते हुए उसकी जीत बिल्कुल पक्की और तय मानी जा रही है।
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