मुसीबत के समय में प्रदेश की मोहन सरकार किसानों के साथ : प्राकृतिक आपदाएं अक्सर मनुष्य के धैर्य और व्यवस्था की तत्परता की परीक्षा लेती हैं। वर्तमान में बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने प्रदेश के अन्नदाता के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। लहलहाती फसलें, जो कुछ ही दिनों में खलिहानों की रौनक बनने वाली थीं, प्रकृति के इस अनपेक्षित प्रहार से खेतों में बिछ गई हैं। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील हृदय को झकझोरने वाला है, और कुछ स्थानों से किसानों द्वारा उठाए गए आत्मघाती कदम समाज और सरकार दोनों के लिए आत्मचिंतन का विषय हैं। किंतु, संकट की इस घड़ी में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की त्वरित सक्रियता और प्रशासनिक मशीनरी को दिए गए स्पष्ट निर्देश एक नई आशा का संचार करते हैं। एक संवेदनशील नेतृत्व की पहचान यही होती है कि वह केवल फाइलों में समाधान न ढूंढे, बल्कि धरातल पर उतरकर उस पीड़ा को महसूस करे जो एक किसान अपनी फसल खोने के बाद सहता है। मुख्यमंत्री ने बिना किसी विलंब के प्रशासन को जिस तरह से तत्काल सर्वे के आदेश दिए हैं, वह इस बात का प्रमाण है कि राज्य सरकार किसानों के दर्द के प्रति न केवल सजग है, बल्कि उसके निवारण के लिए प्रतिबद्ध भी है। अक्सर सरकारी प्रक्रियाओं की सुस्ती राहत कार्यों में बाधा बनती है, लेकिन मुख्यमंत्री का यह स्पष्ट निर्देश कि सर्वे में कोई कोताही न बरती जाए और पारदर्शिता के साथ नुकसान का आकलन हो, प्रशासन में जवाबदेही तय करता है। किसान के लिए उसकी फसल केवल आर्थिक आय का जरिया नहीं होती, बल्कि उसके पूरे साल की मेहनत, उसके बच्चों की शिक्षा और परिवार के भविष्य का आधार होती है। जब वह फसल तबाह होती है, तो उसे लगने वाला मानसिक आघात गहरा होता है। ऐसे समय में सरकार का साथ खड़ा होना उसे वह मनोवैज्ञानिक संबल प्रदान करता है, जो उसे निराशा के अंधकार से बाहर निकालने में सहायक होता है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को इस राहत प्रक्रिया का मुख्य स्तंभ बनाना एक दूरदर्शी कदम है। यह योजना न केवल वित्तीय सुरक्षा कवच प्रदान करती है, बल्कि किसानों को जोखिम प्रबंधन के प्रति जागरूक भी बनाती है। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने को कहा है कि बीमा का लाभ प्रत्येक प्रभावित किसान तक सुगमता से पहुंचे, जिससे यह संदेश गया है कि सरकार अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ति की चिंता कर रही है। सकारात्मकता का सबसे बड़ा उदाहरण मुख्यमंत्री द्वारा आज ही भावांतर भुगतान योजना के तहत 200 करोड़ रुपये की राशि सीधे किसानों के खातों में हस्तांतरित करना है। यह कदम उस समय उठाया गया है जब किसान को नकदी की सबसे अधिक आवश्यकता है। डीबीटी (Direct Benefit Transfer) के माध्यम से यह राशि हस्तांतरित करना भ्रष्टाचार की गुंजाइश को समाप्त करता है और यह सुनिश्चित करता है कि किसान का हक बिना किसी बिचौलिए के सीधे उस तक पहुंचे। यह 200 करोड़ की राशि केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि उन हजारों परिवारों के लिए एक जीवनरेखा है जो प्रकृति की मार से टूटने की कगार पर थे। आपदाएं आती हैं और चली जाती हैं, लेकिन उन आपदाओं के प्रति शासन का दृष्टिकोण ही भविष्य की नींव रखता है। डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में प्रदेश सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसान राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और उनकी सुरक्षा सर्वोपरि है। प्रशासन को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि मुख्यमंत्री की इस संवेदनशीलता और निर्देशों का पालन उसी गति और ईमानदारी से हो, जिसकी अपेक्षा की जा रही है। पटवारी से लेकर कलेक्टर तक, पूरी मशीनरी को एक मिशन मोड में काम करना होगा ताकि कोई भी पात्र किसान सहायता से वंचित न रह जाए। किसानों को भी यह समझने की आवश्यकता है कि हार मान लेना समाधान नहीं है। जब शासन उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है, तो उन्हें भी हौसला रखना चाहिए। कृषि क्षेत्र में आने वाली ऐसी चुनौतियां हमें यह भी सिखाती हैं कि हमें जलवायु परिवर्तन और आधुनिक कृषि तकनीकों के प्रति और अधिक गंभीर होना होगा। लेकिन तात्कालिक आवश्यकता राहत और पुनर्वास की है, जिसमें मध्य प्रदेश सरकार ने एक अनुकरणीय तत्परता दिखाई है। यह सकारात्मक प्रशासनिक हस्तक्षेप न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति को सुधारेगा, बल्कि उनके मन में व्यवस्था के प्रति विश्वास को भी प्रगाढ़ करेगा। मुख्यमंत्री का यह दृष्टिकोण कि ‘किसान की क्षति, राज्य की क्षति है’, एक कल्याणकारी राज्य की सच्ची परिभाषा को साकार करता है। आपदा के इस समय में, जहाँ एक ओर प्रकृति ने परीक्षा ली है, वहीं दूसरी ओर सरकार ने अपने दायित्वों का निर्वहन कर यह सिद्ध किया है कि अन्नदाता का हित ही सर्वोपरि है। आने वाले दिनों में जब सर्वे की रिपोर्ट के आधार पर सहायता राशि वितरित होगी और बीमा दावों का निपटारा होगा, तो यह न केवल किसानों के घावों पर मरहम लगाएगा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी पुनः गति प्रदान करेगा। विश्वास किया जाना चाहिए कि सरकार की इस मुस्तैदी से किसान जल्द ही इस संकट से उबरेंगे और एक बार फिर पूरे उत्साह के साथ प्रदेश के अन्न के भंडारों को भरने का कार्य करेंगे।
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