सामूहिक विवाह :

सामूहिक विवाह : सामाजिक समानता प्रगाढ़ता का सर्वोच्च माध्यम

Blog

सामूहिक विवाह : सामाजिक समानता प्रगाढ़ता का सर्वोच्च माध्यम : मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का इंदौर के शिप्रा में आयोजित सामूहिक विवाह समारोह में शामिल होना केवल एक राजकीय औपचारिकता मात्र नहीं है, बल्कि यह बदलते भारतीय समाज में मूल्यों की पुनर्स्थापना और सांस्कृतिक गौरव के प्रति उनके अटूट विश्वास का प्रतिबिंब है। 251 जोड़ों के सामूहिक विवाह और श्रीमद् भागवत कथा के दिव्य सानिध्य में मुख्यमंत्री का संबोधन एक ऐसे सामाजिक परिवर्तन की नींव रखता है, जिसकी आवश्यकता आधुनिकता की अंधी दौड़ में कहीं अधिक महसूस की जा रही है। भारतीय सनातन संस्कृति में 16 संस्कारों का उल्लेख मिलता है, जिनमें पाणिग्रहण यानी विवाह संस्कार को गृहस्थ जीवन का प्रवेश द्वार माना गया है। मुख्यमंत्री ने इस सत्य को रेखांकित किया कि यह संस्कार केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि परिवार और समाज की निरंतरता का आधार है। जब यह संस्कार संतों के सानिध्य में और सामूहिक उत्सव के रूप में संपन्न होता है, तो इसकी पवित्रता और सामाजिक प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। सामूहिक विवाह के इस आयोजन को उन्होंने सामाजिक समरसता और मितव्ययिता के एक सशक्त माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया, जो आज के समय की सबसे बड़ी मांग है। ​वर्तमान युग में विवाह जैसे मांगलिक कार्य अक्सर प्रदर्शन और फिजूलखर्ची की भेंट चढ़ जाते हैं। दिखावे की इस संस्कृति ने समाज के मध्यम और निम्न वर्ग पर एक ऐसा आर्थिक बोझ डाल दिया है, जिससे उबरने में परिवारों की पूरी पीढ़ी खप जाती है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव का यह दृष्टिकोण अत्यंत व्यावहारिक और प्रेरक है कि विवाह और मृत्यु भोज जैसे अवसरों पर होने वाले अनावश्यक व्यय को रोककर उस धन का निवेश बच्चों की शिक्षा और परिवार के उत्थान में किया जाना चाहिए। उनका यह आह्वान समाज की सोच में एक क्रांतिकारी बदलाव लाने की क्षमता रखता है। विशेषकर तब, जब एक राज्य का मुखिया अपने स्वयं के जीवन का उदाहरण देते हुए यह कहे कि उन्होंने अपने चिकित्सक पुत्र का विवाह भी सामूहिक विवाह समारोह के माध्यम से ही संपन्न कराया है। यह कथनी और करनी की एकता का एक दुर्लभ उदाहरण है, जो जनता के बीच गहरा विश्वास पैदा करता है। जब नेतृत्व स्वयं आदर्श स्थापित करता है, तो समाज के लिए उन रास्तों पर चलना सरल हो जाता है। ​सामूहिक विवाह समारोहों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी समावेशी प्रकृति है। इन आयोजनों में ऊंच-नीच, जात-पात और आर्थिक हैसियत के भेदभाव स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। एक ही पंडाल के नीचे, एक ही विधान से जब अलग-अलग पृष्ठभूमियों के लोग एक साथ नए जीवन की शुरुआत करते हैं, तो यह दृश्य सामाजिक एकजुटता की एक जीवंत तस्वीर पेश करता है। मुख्यमंत्री ने ठीक ही कहा कि ऐसे आयोजनों का आनंद अद्भुत होता है क्योंकि यहाँ आडंबर नहीं, बल्कि आत्मीयता प्रधान होती है। यह आयोजन समाज को यह संदेश देते हैं कि खुशियाँ साझा करने से बढ़ती हैं और फिजूलखर्ची से नहीं। मुख्यमंत्री ने नवविवाहित जोड़ों को जो आशीर्वाद दिया, उसमें केवल भौतिक सुख-सुविधाओं की कामना नहीं थी, बल्कि उनमें वैभव, यश और कीर्ति के साथ-साथ नैतिक मूल्यों के संचार की भी प्रार्थना शामिल थी। उन्होंने युवाओं को माता-पिता की सेवा और समाज कल्याण के प्रति जो संकल्प दिलाया, वह हमारी उस पारंपरिक पारिवारिक व्यवस्था को मजबूती प्रदान करता है, जो पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव में कहीं न कहीं कमजोर होती जा रही है। ​इस आयोजन की सार्थकता इस बात में भी निहित है कि यहाँ भक्ति और सामाजिक सरोकार का संगम देखने को मिला। श्रीमद् भागवत कथा के बीच सामूहिक विवाह का आयोजन यह दर्शाता है कि धर्म केवल व्यक्तिगत मोक्ष का साधन नहीं है, बल्कि वह सामाजिक उत्थान और सामुदायिक कल्याण का प्रेरक भी होना चाहिए। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का उल्लेख कर शासन और समाज के बीच की कड़ी को और मजबूत किया। उनका यह दृष्टिकोण स्पष्ट करता है कि सरकार केवल नीतियां बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह समाज की कुरीतियों को मिटाने और एक स्वस्थ सामाजिक वातावरण निर्मित करने के लिए भी प्रतिबद्ध है। विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेंद्र सिंह तोमर और अन्य विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति ने इस कार्यक्रम के महत्व को और अधिक विस्तार दिया। अंततः, शिप्रा का यह आयोजन मध्यप्रदेश के लिए एक सांस्कृतिक और सामाजिक प्रकाश स्तंभ के रूप में उभरा है। यह हमें याद दिलाता है कि यदि हम अपनी जड़ों से जुड़े रहें और अपनी परंपराओं को आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप ढालें, तो हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर सकते हैं जहाँ समरसता, सादगी और शिक्षा ही प्रगति के मूल मंत्र हों। मुख्यमंत्री का यह संबोधन और उनकी व्यक्तिगत सादगी निश्चित रूप से आने वाले समय में समाज के संपन्न वर्गों को भी ऐसे सार्वजनिक और सामूहिक आयोजनों की ओर प्रेरित करेगी, जिससे समाज में समानता का भाव और प्रगाढ़ होगा।

ये भी पढ़ें : भारतीय संस्कृति का पुनर्जागरण : मुख्यमंत्री के बहू बेटे की नर्मदा यात्रा

Leave a Reply