जहां कानून व्यवस्था का राज, वहां अन्य समस्याएं सहज ही हल होने लगती हैं

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सरकार केंद्र की हो अथवा राज्य की, इसका सबसे पहले काम होता है देश और प्रदेश में में कानून व्यवस्था का राज बनाए रखना। जो सरकार इस मामले में सदैव तत्पर और क्रिएटिव रहती है वह अनेक मामलों में सफलता के नए मापदंड स्थापित करती चली जाती है। क्योंकि सरकार को अथवा उसके विभिन्न विभागों के अमले के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है, आम आदमी का रहन सहन सुकून दायक और आशंका रहित बने रहना । इसके बाद फिर दूसरे क्रम प्राथमिकता पर आते हैं। जिनमें विकास, रोजगार और अन्य मामले गिनाए जा सकते हैं । लेकिन राज्य शासन में दो अंग बड़े महत्वपूर्ण होते हैं। उनमें से पहले है प्रशासन और दूसरी पुलिस व्यवस्था। यह दोनों विभाग यदि अपेक्षा अनुरूप सक्रिय बने रहते हैं, इनमें पदासीन अधिकारी कर्मचारी अपने कर्तव्यों के प्रति जागरुक रहते हैं तो कानून व्यवस्था का राज बना रहता है। जहां तक प्रशासन की बात है तो उसकी भूमिका मुखिया के रूप में होती है। असल मायने में कानून और व्यवस्था के राज को स्थापित बनाए रखने में पुलिस को जमीनी अमले के रूप में जाना जाता है। पुलिस ही वह विभाग है जो कड़ाई से अथवा राजी से राज्य शासन की मंशा को उसके द्वारा पारित कानून अनुशासन को व्यावहारिक बनाने में मशक्कत करती नजर आती है‌। यदि इसमें कोई उदासीनता बीच में आ जाए तो फिर कानून व्यवस्था का राज्य स्थापित होना कोरी कल्पना मात्र रह जाता है। लिखने का आशय यह कि कानून व्यवस्था का राज स्थापित करने में मुख्य भूमिका पुलिस ही निभाती चली आई है । इसलिए आवश्यक हो जाता है कि इस महकने पर अन्वेषण की दृष्टि से तो कड़ीनजर रखी जाए, इसका हाल-चाल और राजी खुशी के बारे में भी खबर लेती रहनी चाहिए। पिछले दिनों मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने भी यही किया। उन्होंने आपराधिक कानून के प्रावधानों को लागू करने से जुड़ी प्रगति की समीक्षा करने के दौरान पुलिस महकने पर बारीकी से नजर डाली और विभिन्न मुद्दों पर गौर किया। उनकी समस्याओं के निराकरण भी तलाशे गए। इनमें से सबसे बड़ा मुद्दा पुलिस की डायल हंड्रेड व्यवस्था है। इसके क्रियान्वयन को लेकर अक्सर शिकायतें आती रहती हैं। लेकिन कुछ अधिकारी हाथ पर हाथ भर बैठे रहते हैं तो फिर पूरे पुलिस महकमे की ही बदनामी होती है तथा आम आदमी के सामने मुसीबतों का पहाड़ खड़ा हो जाता है। इसे सुधारने के लिए मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने जब गृह विभाग और पीएचक्यू के अफसरों की बैठक ली तो उन्हें जमकर फटकार लगाई। उन्होंने पूछा की नई व्यवस्था लागू करने पर जब पूर्व में ही सहमति हो चुकी है तब उसके पालन में देरी क्यों की जा रही है। अब तक जो लापरवाही हुई उनका जिम्मेदार कौन है, इस बाबत भी मुख्यमंत्री की ओर से स्पष्ट रूप से पूछा गया‌। संभवतः मुख्यमंत्री का तीर निशाने पर लगा। शायद यही वजह रही की जब उन्होंने कार्रवाई की बात की तो अच्छे-अच्छे पुलिस अधिकारी एक दूसरे की शक्ल ताकते नजर आए। बहरहाल अब मध्य प्रदेश शासन ग्रह और पुलिस कल्याण विभाग के ढुलमुल रवैया पर संतुष्ट नहीं है। अब पुलिस को और सख्त होना होगा, इस बाबत शासन की ओर से पहल शुरू हो चुकी है । साथ में फीडबैक भी लिया जा रहा है कि इस बाबत वरिष्ठ अधिकारियों ने कितना काम किया‌। पुलिस थानों में एक भय का वातावरण हमेशा महसूस किया जाता है। कोई भी फरियादी जहां तक हो सके पुलिस थाने जाने से बचना चाहता है। यही वजह है कि वह छोटी-मोटी समस्याओं से समझौते करता रहता है और कोई अपराधिक घटना घट जाए या उसके संज्ञान में आ जाए, तब भी उसका प्रयास यही रहता है कि पुलिस के पचड़े में ना पढ़ा जाए तो अच्छा ही है। जाहिर है पुलिस को थानों का वातावरण बड़े पैमाने पर सुधारने की आवश्यकता है। इसके लिए थानों में केवल डेकोरेशन करके इतिश्री नहीं की जा सकती। जैसा कि सुनने में आ रहा है अब समय अवधि में चालान तामील कराए जाने के लिए नवीन डैशबोर्ड बन गए हैं। ई साक्षी प्रक्रिया शुरू हो गई है। थानों तक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के इंतेजामत आरोपियों की कोर्ट पेशी करने में सक्षम रहेंगे। उनके कमरे अब साउंड प्रूफ होंगे। निसंदेह इन सुधारो को लेकर मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने जो शुरुआत की है उसकी तारीफ की जानी चाहिए। लेकिन इसके साथ-साथ यदि पुलिस के आला अधिकारी इस बात पर भी गौर करें कि फरियादियों के साथ और भले मनुष्यों के प्रति पुलिस का व्यवहार दोस्ताना और सहयोगात्मक बने। तो फिर छोटे-बड़े सभी प्रकार के अपराधों पर सहज ही अंकुश लगाया जा सकता है। क्योंकि जब पुलिस आफत और पचड़े की बजाय अपनी महसूस होगी तब सामाजिक लोग समाज में व्याप्त असामाजिक तत्वों और कानून विरोधी लोगों की खबरें दोस्ताना माहौल में पुलिस तक पहुंचने को तत्पर हो सकेंगे। ऐसी स्थिति में प्रदेश में कानून व्यवस्था का राज स्थापित होना बहुत ज्यादा सहज होने की संभावनाएं बन जाती हैं।

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