स्वर्गीय पूनम चंद जी के संस्कारों ने गढ़ा डॉक्टर मोहन यादव का व्यक्तित्व

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कहते हैं व्यक्ति अपने पूर्वजों के कृतित्व का प्रतिबिंब होता है। उसे जो संस्कार अपने बुजुर्गों अथवा पूर्वजों से मिले होते हैं, वह वैसा ही आचरण करता है। उसे देखकर वर्तमान समाज यह अनुमान लगा पाता है कि उसके पूर्वज अथवा अभिभावक कैसे रहे होंगे। यही बात मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव पर भी लागू होती है। यानि यह स्वतः प्रमाणित सत्य है कि आज जिस प्रतिभा का प्रदर्शन डॉक्टर मोहन यादव मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर कर पा रहे हैं, वह उन्हें अपने पिता अर्थात अभिभावक श्री पूनम चंद यादव जी से ही संस्कारों के रूप में मिली होगी। जैसा कि उनके नजदीकी सूत्र बताते हैं, पूनम चंद्र यादव जी ने अपने होनहार पुत्र को हमेशा ही सत्य मार्ग पर देश के हित में कार्य करने की प्रेरणा दी। यही नहीं, उन्हें घर के छोटे-मोटे कार्यों में शुरू से ही लगाते हुए जिम्मेदारी का मंत्र अपने पुत्र के कानों में फूंकते रहे। यही वजह रही कि डॉक्टर मोहन यादव अपनी उच्च शिक्षा के दौरान से ही पारिवारिक एवं सामाजिक कार्यों से जुड़े रहे और उनका रुझान राष्ट्रीय कार्यों से जुड़ता चला गया। जिस जमाने में भाजपा और जनसंघ के जन प्रतिनिधियों का अकाल पड़ा रहता था। इन दोनों दलों के लोगों को जनहित की बात करने पर कांग्रेस शासन की पुलिस के डंडे ही खाने पड़ते थे। पहले जनसंघियों का और फिर भाजपाइयों का कांग्रेस शासन की जन विरोधी गतिविधियों का विरोध करने पर जेल में भी आना जाना लगा रहता था। इसी वजह के चलते तत्कालीन अभिभावक अपने बच्चों को संघ की शाखाओं, विद्यार्थी परिषद, युवा मोर्चा और बीजेपी आदि से दूर ही रखा करते थे। लेकिन डॉक्टर मोहन यादव को अपने पिताजी से हमेशा ही संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों की देश हित में संलग्न गतिविधियों की सकारात्मक जानकारी मिलती रही। यह और बात है कि खुद मोहन यादव ने इन देशभक्त संगठनों से जुड़कर इस बाबत अपने पिताजी का और अधिक ज्ञानवर्धन किया। मोहन यादव समय-समय पर अपने पिताजी को बताते रहे कि आज हमने देशभक्ति का अमुक कार्य किया और आज संघ के फलां पदाधिकारी से मुलाकात हुई। कुल मिलाकर पिता पुत्र की इस युगल जोड़ी ने ऐसा तादात्म्य दिखाया कि डॉक्टर मोहन यादव लगातार संघ कार्य करते हुए आगे और आगे बढ़ते चले गए। केवल देशभक्ति और राजनीति ही नहीं, मोहन यादव को समाज सेवा का मूल मंत्र भी अपने पिताजी से ही मिला। क्योंकि वह पूर्व से ही यादव समाज में तो सक्रिय रहे ही, अन्य जातियों व समाजों में भी अपना योगदान देते रहे। यह बातें इन वाकयों से भी प्रमाणित होती हैं, जब-जब मोहन यादव विधायक या मंत्री बने तब तक उनके पिताजी श्री पूनम चंद यादव एक प्रकार से उनके अघोषित प्रतिनिधि के तौर पर कार्य करते रहे। कारण बताया जाता है कि क्षेत्रीय दौरों पर अथवा क्षेत्र से बाहर रहने के कारण जब-जब मतदाताओं या फिर समाजसेवियों की मुलाकात डॉक्टर मोहन यादव से नहीं हो पाती थी, तो वे लोग अपने आवेदन सुझाव और शिकायतें श्री पूनम चंद जी को ही सौंप कर निश्चित हो जाया करते थे। क्योंकि सभी लोग यह बात अच्छी तरह से समझ चुके थे कि जो कागज उन्होंने अपने प्रतिनिधि के पिताजी के हाथ में सौपा है, वह ठीक जगह पर पहुंचेगा और देर सवेर उसके सकारात्मक परिणाम अवश्य प्राप्त होंगे। लिखने का आशय यह कि चाहे डॉक्टर मोहन यादव हों या फिर जनता, दोनों ही श्री पूनम चंद जी के अघोषित प्रतिनिधित्व का भरपूर लाभ उठा रहे थे। बेहद व्यथित हृदय के साथ अब क्षेत्र को लोगों को यह स्वीकार करना होगा कि उनका एक महत्वपूर्ण सूत्र उनके हाथों से विधाता द्वारा छीना जा चुका है। इसे हम डॉक्टर मोहन यादव की व्यक्तिगत क्षति तो कहेंगे ही, लेकिन अब जब जनता को भी स्वर्गीय पूनम चंद्र जी की उपस्थिति नहीं मिलेगी तो उन्हें भी कम दुख होने वाला नहीं है। इस प्रकार से देखा जाए तो उज्जैन क्षेत्र तो एक अपूरणीय क्षति से रूबरू है ही, यादव समाज के लिए क्षति और व्यापक महसूस की जाने वाली है। क्योंकि सामाजिक तौर पर भी श्री पूनम चंद जी की मानसिक और वैचारिक सक्रियता काफी स्फूर्त वान बताई जाती रही है। जाहिर है इस रिक्तता को भरने में यादव समाज समेत क्षेत्र के सभी नागरिकों, समाज बंधुओ को काफी मशक्कत करनी होगी और इसके लिए एक लंबा इंतजार तो करना ही होगा। क्योंकि खुद जन सेवा में समर्पित होकर अपने पुत्र को देशभक्ति के पथ पर अग्रेषित करने वाले स्वर्गीय पूनम चंद यादव जैसे बिरले सेवक लंबे अंतराल के बाद ही उपलब्ध हो पाते हैं। ईश्वर उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान प्रदान करें और डॉक्टर मोहन यादव समेत उनके सुबह स्वजन प्रियजन व समाज जनों को यह दुख सहने की शक्ति प्रदान करें, सतपुड़ा वाणी परिवार की परमपिता परमात्मा से यही प्रार्थना है।

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