यूएनएससी में भारत का सख़्त रुख: “’पारदर्शिता लाओ या विश्वास खोओ!”- आतंक सूचीकरण की बंद कमरों वाली प्रक्रिया पर बड़ा संकेत

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एजेंसी, नई दिल्ली। भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सहायक ढाँचों के कार्य संचालन में अधिक खुलापन लाने की आवश्यकता दोहराई है और बिना स्पष्ट आधार बताए संगठनों एवं व्यक्तियों को आतंकवादी सूची में शामिल करने संबंधी प्रस्तावों को अस्वीकार किए जाने पर चिंता जताई है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि, राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने शुक्रवार (स्थानीय समयानुसार) को सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली पर आयोजित खुली चर्चा में कहा कि सुरक्षा परिषद, संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था का मूल स्तंभ है तथा विश्व में शांति और सुरक्षा बनाए रखने की प्राथमिक ज़िम्मेदारी उसी पर है। राजदूत हरीश ने कहा, “संयुक्त राष्ट्र के महत्वपूर्ण अंग के रूप में सुरक्षा परिषद की कार्यशैली इसकी विश्वसनीयता, क्षमता, दक्षता तथा पारदर्शिता के लिए अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यद्यपि इसके अधिकार-क्षेत्र में अनेक संवेदनशील मुद्दे आते हैं, परंतु सदस्य संख्या मात्र पन्द्रह ही है।” उन्होंने कहा कि अनेक वैश्विक संकटों और चुनौतियों के दौर में सुरक्षा परिषद की भूमिका और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने कहा, “सहायक अंगों के कामकाज में अधिक पारदर्शिता लाना समय की माँग है।” राजदूत ने उदाहरण देते हुए कहा कि आतंकवादी संगठनों अथवा व्यक्तियों को सूचीबद्ध करने के अनुरोधों को अस्वीकार करने की प्रक्रिया अक्सर अस्पष्ट ढंग से होती है। उन्होंने कहा, “सूची से हटाने के निर्णयों के विपरीत, सूची में शामिल करने से जुड़े प्रस्ताव ऐसी प्रक्रिया से गुज़रते हैं जिनकी विस्तृत जानकारी परिषद के बाहर के सदस्य देशों को नहीं मिलती।” उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि परिषद की समितियों और सहायक संस्थाओं में अध्यक्षों तथा पदाधिकारियों को विशेष अधिकार प्राप्त होते हैं, जिनकी ज़िम्मेदारी अत्यधिक गम्भीर होती है। उन्होंने कहा कि हितों के टकराव के लिए परिषद की कार्यप्रणाली में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। पर्वतनेनी हरीश ने पन्द्रह-सदस्यीय शक्तिशाली संयुक्त राष्ट्र निकाय में सुधार की तत्काल आवश्यकता रेखांकित करते हुए कहा, “संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को उद्देश्यपूर्ण, समकालीन और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम बनाने हेतु, आठ दशक पूर्व की संरचना में व्यापक परिवर्तन अनिवार्य है।” उन्होंने यह भी कहा कि समयबद्ध संवाद और लिखित परामर्श के माध्यम से कम प्रतिनिधित्व वाले तथा गैर-प्रतिनिधित्व वाले भौगोलिक क्षेत्रों को पर्याप्त सहभागिता प्रदान करते हुए, परिषद की स्थायी और अस्थायी—दोनों श्रेणियों में सदस्यता विस्तार पर गंभीर और समग्र प्रयास होने चाहिए।

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