महाकुंभ में पुण्य अर्जित करने से कोई भी चूकना नहीं चाहता

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आजकल जहां देखो वहां महाकुंभ की ही चर्चा है। हो भी क्यों ना, आखिर यह महापर्व पूरे 144 साल बाद आया है। इस महापर्व को लेकर सभी के भिन्न-भिन्न मत हैं। कोई इसके भौतिक स्वरूप को ही सनातन साबित करने में लगा हुआ है। तो कुछ-कुछ कालनेमि स्वरूप स्वयंभू विद्वानों ने इसमें खोज खोज कर कमियां निकालने का काम हाथ में ले रखा है। इन सबसे बेखबर जो श्रद्धालु हैं और संत, महात्मा, साधु, सन्यासियों का जो हुजूम है, वह अपनी मस्ती में मस्त है और स्वयं को अमृत की बूंद को प्राप्त करने में सफल मानकर आनंदित है। और ज्यादा गहनता से देखेंगे तो हमें महाकुंभ के अनेक स्वरूप और पहलू देखने को मिल जाएंगे। जैसे गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा भी है –
जाकी रही भावना जैसी।
प्रभु मूरत देखी तिन्ह तैसी।।
या फिर विद्वानों के लिए लिखा गया है-
हरि अनंत हरि कथा अनंता।
कहई सुनई बहु विधि बहू संता।।

अर्थात इस महापर्व कुंभ को जो जिस भावना से देख रहा है वह उसका उतना ही स्वरूप देख पा रहा है। या फिर यूं कहा जाए कि महाकुंभ को लेकर जितने मत हैं उतनी ही बातें हैं। ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि हम इसके वास्तविक स्वरूप को जान पाएं और अन्य लोगों की जिज्ञासाओं को भी शांत कर सकें। शायद तब संभव हो पाए और हम हमारे त्यौहारों को लेकर उठने वाले सवालों का स्थाई रूप से शमन कर पाएं। इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी बात यह है कि हम पहले अपने त्योहारों, संस्कारों, संस्कृतियों और सनातन के बारे में सामान्य ज्ञान तो हासिल कर ही लें। उदाहरण के लिए- हमें यह पता होना चाहिए कि आखिर कुंभ मनाया क्यों जाता है और यह महाकुंभ क्या है। यदि धार्मिक ग्रंथो का अध्ययन करें तो पता चलेगा कि कुंभ और महाकुंभ का समुद्र मंथन से गहरा नाता है। जब इंद्र सहित अधिकतम देवताओं से रुष्ट होकर दुर्वासा मुनि ने उन्हें शक्ति छीण होने का श्राप दिया तो देवताओं का पराभव होने लगा। फल स्वरुप आसुरी शक्तियां प्रबल होने लगीं और देवता उनसे हार कर यहां वहां शरण लेने को बाध्य हुए हो गए। तब विचार विमर्श किया गया कि आखिर देवताओं को शक्ति मिले तो मिले कैसे? कैसे देवता एक बार पुनः आसुरी शक्तियों को पराजित कर पाएं और अपने ऐश्वर्या वैभव को हासिल कर सकें! तब एक रास्ता यह निकला की समुद्र मंथन किया जाए। इसमें से अन्य जो भी रत्न प्राप्त हों, लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण अमृत होगा। यदि यह अमृत देवताओं के हाथ लग जाए तो यह वर्ग एक बार फिर स्वर्ग सहित अन्य ऐश्वर्य वैभवपूर्ण स्थानों पर अपना आधिपत्य हासिल कर सकेगा। तब एक सुनियोजित रणनीति के तहत असुरों से बात की गई। भगवान भोलेनाथ को मध्यस्थ बनाकर समुद्र मंथन के लिए असुरों को तैयार किया गया। इस प्रकार समुद्र मंथन शुरू हुआ। जिसमें मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया और वासुकी नाग का रस्सी की तरह प्रयोग किया गया। इस समुद्र मंथन से कुल 14 रत्न प्राप्त हुए। उनके नाम क्रमशः कालकूट बिष, कामधेनु गाय, उच्चैश्रवा अश्व, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, रंभा नाम की अप्सरा, लक्ष्मी देवी, वारुणी, चंद्रमा, पारिजात वृक्ष, पांचजन्य शंख, और अमृत, हाथ में लेकर प्रकट हुए धन्वंतरि भगवान। सबसे आखरी में जो अमृत कलश प्राप्त हुआ, उसे लेकर देवताओं और असुरों में युद्ध छिढ़ गया। हर कोई अमृत पीकर अमर हो जाना चाहता था। इसे असुरों से बचाने की पहली जिम्मेदारी इंद्र के पुत्र जयंत को मिली। वह अमृत कलश लेकर स्वर्ग की ओर भागा तो असुरों से झड़प हो गई। फल स्वरुप अमृत की कुछ बूंदें कलश से छलक कर चार स्थानों पर गिर पड़ीं। इन स्थानों के नाम हैं उज्जैन, नासिक, हरिद्वार और प्रयागराज। यही वे चारों स्थान हैं जहां पर क्षिप्रा, गोदावरी, गंगा जी और त्रिवेणी संगम पर 12 साल के अंतर से कुंभ पर्व आयोजित होते हैं। कुंभ महापर्व 12 साल में एक बार ही क्यों आयोजित होता है? इस बारे में जानकारी मिलती है कि यह देव असुर संग्राम पूरे 12 दिनों तक चला। चूंकि देवताओं का एक दिवस मनुष्यों के एक वर्ष के बराबर होता है। यही वजह है कि देवताओं के 12 दिन बीतते हैं तब तक पृथ्वी पर 12 साल का समय गुजर जाता है। फल स्वरुप एक स्थान पर कुंभ का मेला 12 साल के अंतर से ही संपन्न हो पता है। जबकि चारों स्थानों पर क्रमशः आयोजित होने वाले कुंभ के मेलों में चार-चार सालों का अंतर बना हुआ है। जब प्रत्येक स्थान पर 12 – 12 कुंभ आयोजित हो जाते हैं तब इनमें से अंतिम कुंभ को महाकुंभ कहा जाता है, जो 144 वर्ष के बाद आयोजित होता है और इसके लिए प्रयागराज स्थान धर्म शास्त्रों द्वारा नियत है। इस हिसाब से देखा जाए तो पिछला महाकुंभ पर्व सन 1881 में पड़ा था और अब अगला महाकुंभ पर्व सन 2169 में पड़ने वाला है। यानि जिन लोगों ने पिछला महाकुंभ देखा वे अब जीवित नहीं है और जो लोग 2025 का कुंभ महापर्व देख पा रहे हैं वह 2169 का कुंभ महापर्व नहीं देख पाएंगे। इस दृष्टि से 2025 का कुंभ महापर्व अति विशिष्ट हो चला है। यही वजह है कि केवल देश भर से ही नहीं, बल्कि दुनिया भर से सनातन श्रद्धालु महाकुंभ की ओर बढ़ चले हैं और बढ़ते ही चले जा रहे हैं। हर कोई त्रिवेणी संगम पर आयोजित महाकुंभ में अमृत की बूंदे पा लेना चाहता है और अपने पापों को धोने का शुभ अवसर हाथों से नहीं जाने देना चाहता।

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