महंगी खाद्य वस्तुओं के कारण मई में थोक महंगाई दर पहुंची 9.68 प्रतिशत के पार
एजेंसी, नई दिल्ली। भारत के आम नागरिकों के लिए आर्थिक मोर्चे पर एक बेहद ही निराशाजनक और चिंता में डालने वाली खबर सामने आई है। यदि देश की जनता यह उम्मीद लगा कर बैठी थी कि आने वाले दिनों में बाजार में मिलने वाली दैनिक उपयोग की वस्तुओं और खानपान के सामानों की कीमतों में कोई कमी आएगी, तो वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय की तरफ से जारी किए गए एकदम ताजे आंकड़ों ने इन सभी उम्मीदों को पूरी तरह से तोड़ दिया है। वर्तमान समय में देश के भीतर थोक बाजार के स्तर पर महंगाई की दर में इतनी तेजी से उछाल आया है कि इसने पिछले कई महीनों के रिकॉर्ड पीछे छोड़ दिए हैं। मई के महीने में थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर में जो भयंकर वृद्धि दर्ज की गई है, उसने ना केवल भारत सरकार के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं, बल्कि आम उपभोक्ता की रातों की नींद भी उड़ा दी है। इस वृद्धि का सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में खुदरा बाजार में भी सामान बहुत ज्यादा महंगा होने वाला है और हर घर का बजट बुरी तरह से बिगड़ने वाला है।
भारत की थोक महंगाई दर मई में सालाना आधार पर 9.68 प्रतिशत तक बढ़ गई, जो ईंधन, बिजली, खाद्य पदार्थों और विनिर्मित उत्पादों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के कारण दर्ज की गई है।
यह जानकारी सोमवार को जारी सरकारी आंकड़ों में दी गई।यह डेटा नए आधार वर्ष 2022-23 के साथ जारी किया गया है,… pic.twitter.com/mCsJ459XMZ
— यूनीवार्ता (@univartaindia1) June 15, 2026
थोक महंगाई के डराने वाले आंकड़े और पिछले एक साल का सफर
वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के द्वारा सोमवार को जो आधिकारिक आंकड़े पेश किए गए हैं, वे स्पष्ट रूप से बताते हैं कि मई दो हजार छब्बीस में देश की थोक महंगाई दर में जबरदस्त इजाफा हुआ है और यह उछलकर 9.68 प्रतिशत के खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है। यह स्थिति आम जनता और अर्थशास्त्रियों के लिए इसलिए भी बहुत अधिक परेशानी खड़ी करने वाली है क्योंकि महज एक महीने पहले यानी अप्रैल दो हजार छब्बीस में यह महंगाई दर 8.26 प्रतिशत के स्तर पर मौजूद थी। थोक बाजार में कीमतों के इस कदर बेतहाशा बढ़ने का सबसे बड़ा और सीधा नुकसान यह होता है कि कुछ ही हफ्तों के भीतर इसका असर खुदरा बाजार पर पड़ने लगता है, जिससे आम आदमी की जेब से ज्यादा पैसा खर्च होने लगता है। अगर हम पिछले एक साल के महंगाई के सफर पर नजर डालें तो स्थिति और भी साफ हो जाती है। पिछले साल यानी मई दो हजार पच्चीस में थोक महंगाई दर मात्र 0.39 प्रतिशत थी। इसके बाद जून, जुलाई, अक्टूबर और नवंबर के महीनों में तो यह दर शून्य से भी नीचे यानी नकारात्मक स्तर पर चली गई थी। लेकिन दिसंबर दो हजार पच्चीस में 0.83 प्रतिशत के साथ इसने जो रफ्तार पकड़ी, वह जनवरी में 1.81 प्रतिशत, फरवरी में 2.13 प्रतिशत और मार्च में 3.88 प्रतिशत तक जा पहुंची। इसके बाद अप्रैल और मई में तो इसने सारे पुराने रिकॉर्ड ही ध्वस्त कर दिए हैं।
पेट्रोल, डीजल, बिजली और कच्चे तेल ने लगाई बाजार में भयानक आग
अर्थव्यवस्था के जानकारों का मानना है कि थोक महंगाई में अचानक आए इस रिकॉर्ड तोड़ उछाल के पीछे सबसे बड़ा हाथ ईंधन, बिजली और कच्चे तेल की कीमतों में आई बेतहाशा वृद्धि का है। अगर हम सिर्फ ईंधन और बिजली के क्षेत्र में थोक महंगाई की बात करें, तो अप्रैल के महीने में यह दर 24.89 प्रतिशत थी, जिसने सीधे तौर पर एक लंबी छलांग लगाई और मई के महीने में यह 30.33 प्रतिशत के भारी आंकड़े को छू गई। वहीं दूसरी तरफ, कच्चे तेल की स्थिति तो और भी ज्यादा भयावह हो चुकी है। कच्चे तेल के मोर्चे पर महंगाई का स्तर मई के महीने में 61.51 प्रतिशत के अति खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अप्रैल के महीने में यह दर 56.31 प्रतिशत पर दर्ज की गई थी। इस तरह से ऊर्जा के हर एक स्रोत का महंगा होना उत्पादन की कुल लागत को कई गुना बढ़ा रहा है।
पश्चिम एशिया का भारी संकट और भारत में ईंधन की आसमान छूती कीमतें
अब मन में यह सवाल उठता है कि आखिर अचानक से महंगाई के सूचकांक में इतनी भारी बढ़ोतरी क्यों हुई है। इसके पीछे का सबसे मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रही उथल पुथल है, विशेष रूप से पश्चिम एशिया में पनपा गंभीर भू राजनीतिक संकट। इस संकट की वजह से स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज नामक अहम समुद्री रास्ते की प्रभावी नाकेबंदी हो गई है। यह वही सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है जहां से भारत अपने उपयोग के लिए अधिकांश कच्चे तेल का आयात करता है। बाहरी दुनिया से आपूर्ति बाधित होने और वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के दामों में भयंकर तेजी आने के कारण ही भारत के घरेलू बाजार में भी भूचाल आ गया है। इसी अंतरराष्ट्रीय दबाव और कच्चे तेल की अत्यधिक महंगी खरीद का सीधा परिणाम यह हुआ कि मई महीने के दूसरे हिस्से में पूरे भारत के अंदर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक साथ 7.50 रुपये प्रति लीटर की भारी भरकम बढ़ोतरी कर दी गई। इस एक कदम ने पूरे देश के परिवहन तंत्र की लागत को आसमान पर पहुंचा दिया है।
रसोई का बजट हुआ खराब और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी बढ़ी लागत
पेट्रोल और डीजल जैसी बुनियादी चीजों के दाम बढ़ने का सीधा असर आम आदमी की रसोई के बजट पर पड़ता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब परिवहन और माल ढुलाई महंगी होती है तो बाजार में पहुंचने वाली हर चीज की कीमत अपने आप बढ़ जाती है। यही कारण है कि रोजमर्रा के खाने पीने की चीजों में भी थोक महंगाई दर अप्रैल के 2.43 प्रतिशत से बढ़कर मई के महीने में 3.60 प्रतिशत हो गई है। इसका साफ मतलब है कि सब्जियां, अनाज और अन्य सभी खाद्य पदार्थ मंडी से ही महंगे होकर बाहर निकल रहे हैं। केवल खाद्य पदार्थ ही नहीं, बल्कि फैक्ट्रियों और कारखानों में तैयार होने वाले सामानों, जिन्हें हम मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स या विनिर्माण उत्पाद कहते हैं, उनकी महंगाई दर में भी तेज उछाल देखने को मिला है। अप्रैल में विनिर्माण क्षेत्र की महंगाई दर 6.68 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर मई में 7.48 प्रतिशत के ऊंचे स्तर पर आ गई है। कुल मिलाकर देखा जाए तो इस समय अर्थव्यवस्था का हर एक हिस्सा महंगाई की भयानक चपेट में है और आम उपभोक्ता को फिलहाल किसी भी तरह की कोई राहत मिलती हुई दिखाई नहीं दे रही है।
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