बिहार में करारी पराजय के बाद खड़गे आवास पर बंद-दरवाज़ा मंथन, पार्टी बोली: दो सप्ताह में प्रमाण रखेंगे; राहुल गांधी भी रहे मौजूद

देश/प्रदेश नई दिल्ली राष्ट्रीय

एजेंसी, नई दिल्ली। बिहार में प्राप्त नतीजे कांग्रेस के लिए केवल हार नहीं थे बल्कि एक ऐसा धक्का थे जिसने दिल्ली तक माहौल बोझिल कर दिया। शनिवार रात पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर हुई बैठक में यह बेचैनी साफ दिखाई दी। कमरे का वातावरण भारी था और यही प्रश्न गूँज रहा था कि आखिर ऐसी क्या चूक हुई कि कांग्रेस महज़ छह सीटों पर सिमट गयी।

मुख्य सवाल: हार की मूल वजह क्या।
नेताओं ने सीटों, प्रत्याशियों, महागठबंधन और ज़मीनी रणकौशल की समीक्षा कर कमियों को परखा। हर बार यही निष्कर्ष निकला कि नतीजे अनुमान से कहीं अधिक विपरीत रहे। संगठन से लेकर प्रचार अभियान तक सबकी सूक्ष्म जाँच की गयी। खड़गे ने सीधा पूछा कि जिन साठ क्षेत्रों में कांग्रेस ने उम्मीदवार उतारे, वहाँ केवल छह ही कैसे जीते। पिछली बार उन्नीस सीटें मिली थीं। मत प्रतिशत भी नीचे चला गया।

कांग्रेस का आरोप: चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी।
बैठक के बाद केसी वेणुगोपाल बाहर आए और कम शब्दों में गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि पार्टी निर्वाचन में हुई अनियमितताओं के साक्ष्य जुटा रही है और आगामी दो हफ़्तों में देश के समक्ष प्रस्तुत करेगी। अजय माकन ने भी यही चिंता दोहराई। उनका कहना था कि अनेक मतदान केन्द्रों से लगातार शिकायतें मिलीं और इन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार ये परिणाम सामान्य नहीं हैं। गठबंधन के कई घटकों ने भी माना है कि नतीजे अप्रत्याशित हैं और जाँच आवश्यक है।

महागठबंधन की कमज़ोरियाँ भी उजागर।
बिहार में गठबंधन की कहानी शुरुआत से ही उलझी रही। तेजस्वी को मुख्य चेहरा घोषित करने में देर हुई और बीच-बीच में मतभेदों की चर्चाएँ फैलती रहीं। कांग्रेस और राजद के बीच खिंचाव की खबरों ने माहौल पहले ही बिगाड़ रखा था। टिकट बँटवारा आख़िरी समय तक फँसा रहा। उम्मीदवार मैदान में उतरे, पर यह साफ नहीं था कि कौन किस क्षेत्र से लड़ेगा। इससे प्रचार शिथिल हुआ और मतदाता भी असमंजस में रहे। सबसे बड़ी चूक तब सामने आयी जब नौ क्षेत्रों में सहयोगी दल एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े हो गये। कई स्थानों पर मत विभाजित हुए और इसी बिखराव का लाभ भाजपा तथा जेडीयू को मिला। कुछ सीटों पर अंतर बहुत कम था। उदाहरण के तौर पर बछवाड़ा में कांग्रेस और सीपीआई के मत जोड़ दिए जाएँ तो वे भाजपा से आगे होते, पर दोनों अलग लड़े और परिणाम विपरीत आया।

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