एजेंसी, नामरूप। पीएम मोदी ने रविवार को कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि पार्टी ‘‘राष्ट्रविरोधी’’ गतिविधियों में लिप्त है और असम में अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को बसाने में मदद कर रही है। असम में डिब्रूगढ़ जिले के नामरूप में 10,601 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले उर्वरक संयंत्र का उद्घाटन करने के बाद जनसभा को संबोधित करते हुए मोदी ने यह भी कहा कि कांग्रेस ने यहां पुराने संयंत्र को आधुनिक बनाने और किसानों की समस्याओं का समाधान ढूंढ़ने के लिए कोई प्रयास नहीं किया।

प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘कांग्रेस राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में लिप्त है। वह अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को असम में बसाने की कोशिश कर रही है।’’ उन्होंने यह भी कहा कि विपक्षी पार्टी का असमिया लोगों की पहचान, अस्तित्व और गौरव से कोई लेना-देना नहीं है, जिसे भाजपा ने बचाने की कोशिश की है। पीएम मोदी ने कहा, “कांग्रेस मतदाता सूची में संशोधन का विरोध कर रही है क्योंकि वह केवल सत्ता हथियाना चाहती है… वह मेरे अच्छे कार्यों का विरोध करती है… भाजपा सरकार हमेशा असमिया लोगों की पहचान, भूमि, गौरव और अस्तित्व की रक्षा के लिए काम करती रहेगी।” प्रधानमंत्री ने कहा कि भाजपा सरकार का उद्देश्य असम को उतना शक्तिशाली बनाना है जितना कि वह अहोम साम्राज्य के समय हुआ करता था। मोदी ने कहा, ‘‘औद्योगीकीकरण और कनेक्टिविटी असम के सपनों को पूरा कर रहे हैं। भाजपा की ‘डबल-इंजन’ सरकार युवाओं को नए सपने देखने के लिए सशक्त बना रही है।” उन्होंने यह भी कहा कि नामरूप यूरिया संयंत्र से स्थानीय किसानों को मदद मिलेगी और असम के युवाओं के लिए हजारों नौकरियां सृजित होंगी। प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘नामरूप उर्वरक संयंत्र असम में औद्योगिक विकास का प्रतीक बनेगा। यह दुख की बात है कि कांग्रेस ने संयंत्र को आधुनिक बनाने और किसानों की समस्याओं का समाधान ढूंढ़ने के लिए कोई प्रयास नहीं किया।” उन्होंने यह भी कहा कि भारत तभी प्रगति कर पाएगा जब किसान समृद्ध होंगे, और भाजपा सरकार ने उनके विकास के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। मोदी ने कहा, “कांग्रेस शासन के दौरान कई उर्वरक कारखाने बंद हो गए थे। जब हम सत्ता में आए, तो भाजपा सरकार ने पूरे देश में कई नए संयंत्र स्थापित किए।” प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार के पाम ऑयल मिशन से पूर्वोत्तर को खाद्य तेल में आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी और आने वाले दिनों में किसानों की आय बढ़ेगी।

शहीद स्मारक पहुंचे पीएम मोदी, असम आंदोलन के शहीदों को दी श्रद्धांजलि
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को गुवाहाटी स्थित ‘शहीद स्मारक क्षेत्र’ में असम आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि दी। असम आंदोलन विदेशी विरोधी आंदोलन था। प्रधानमंत्री मोदी ने स्मारक क्षेत्र में स्थापित दीप के सामने पुष्पांजलि अर्पित की। यह दीप 1979 से 1985 तक छह साल चले आंदोलन में शहीद हुए 860 लोगों की स्मृति में सदैव प्रज्वलित रहता है। करीब 20 मिनट के अपने दौरे के दौरान प्रधानमंत्री ने स्मारक परिसर का भ्रमण किया और शहीदों की याद में निर्मित दीर्घा को भी देखा, जहां शहीदों की आवक्ष प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। इस अवसर पर राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य, मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा, केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल और असम समझौता कार्यान्वयन मंत्री अतुल बोरा प्रधानमंत्री के साथ मौजूद थे। स्मारक का उद्घाटन इसी महीने की शुरुआत में किया गया था और असम आंदोलन के पहले शहीद खड़गेश्वर तालुकदार की पुण्यतिथि भी उसी दिन थी। खड़गेश्वर तालुकदार का निधन 10 दिसंबर 1979 को हुआ था। अतुल बोरा ने संवाददाताओं से कहा कि प्रधानमंत्री ने शहीदों के बारे में जानकारी ली और मुख्यमंत्री ने उन्हें इस संबंध में संक्षेप में बताया। उन्होंने कहा, ‘‘यह असम के लिए एक यादगार दिन है।
प्रधानमंत्री ने उन शहीदों को श्रद्धांजलि दी जिन्होंने कांग्रेस शासन के दौरान चले छह वर्षीय आंदोलन में अपने प्राणों की आहुति दी थी।’’ बोरा ने बताया कि प्रधानमंत्री ने खड़गेश्वर तालुकदार की प्रतिमा पर माल्यार्पण भी किया। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सहयोगी पार्टी असम गण परिषद (एजीपी) के अध्यक्ष बोरा ने कहा कि प्रधानमंत्री के इस दौरे के बाद पूरी दुनिया असम आंदोलन के बारे में और अधिक जानना चाहेगी। उन्होंने कहा, ‘‘जब प्रधानमंत्री दीर्घा का दौरा कर रहे थे, तो वह शहीदों के बारे में विस्तार से जानना चाहते थे। इस तरह से अब तक किसी भी प्रधानमंत्री ने असम आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि नहीं दी थी। इसके लिए हम मोदी जी के आभारी हैं।’’ करीब 170 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित इस स्मारक में जलाशय, सभागार, प्रार्थना कक्ष, साइकिल ट्रैक और ध्वनि एवं प्रकाश शो की व्यवस्था जैसी सुविधाएं हैं। ध्वनि एवं प्रकाश शो के माध्यम से असम आंदोलन के विभिन्न पहलुओं और राज्य के इतिहास को प्रदर्शित किया जाएगा। यह आंदोलन 15 अगस्त 1985 को असम समझौते पर हस्ताक्षर के साथ समाप्त हुआ था। अवैध प्रवासन का मुद्दा असम के राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में सबसे विवादास्पद विषयों में से एक रहा है। सिर्फ बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे पर राज्य में कई चुनाव लड़े गए हैं।
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