तेज हुए हैं आदिवासियों के विकास में परिणाम मूलक जमीनी प्रयास

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प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी, मध्य प्रदेश के राज्यपाल श्री मंगू भाई पटेल और मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के मिले-जुले प्रयासों के तहत आदिवासियों के भले के लिए 560 करोड़ रुपए से भी ज्यादा के विकास कार्यों का लोकार्पण किया जाना सराहना का विषय है। यह भी प्रशंसा के योग्य है कि बीते कुछ सालों से इस तरह के कार्यक्रमों में काफी तेजी आई है। जिनके विकास कार्यों का ताना-बाना आदिवासियों अर्थात वनवासियों को केंद्र में रखकर बुना गया है। खासकर केंद्र और प्रदेश में भाजपा सरकार के रहते इन आयोजनों में काफी तेजी आई है। उनकी गंभीरता को इससे भी समझा जा सकता है कि केवल मध्य प्रदेश में ही एक से अधिक बार स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आदिवासियों के कार्यक्रमों में शिरकत कर चुके हैं। वही मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव केंद्र और प्रदेश की ऐसी योजनाओं में गति बनाए हुए हैं जो आदिवासियों के हित में रखकर बनाई गई हैं। आदिवासियों के भगवान कहे जाने वाले बिरसा मुंडा की जयंती पर भी यही सब देखने को मिला। इस वर्ग को ध्यान में रखकर सैकड़ो करोड़ रुपयों की वर्षा आदिवासी क्षेत्रों में की गई। अब आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र और प्रदेश सरकार द्वारा उपलब्ध कराया गया यह भारी भरकम खजाना पूरी ईमानदारी के साथ उन कार्यों में निवेशित हो जाए, जिसके लिए वास्तव में यह उपलब्ध कराया गया है। यह बात इसलिए लिखने की आवश्यकता प्रतीत होती है क्योंकि आजादी के बाद से ही अधिकांश समय तक जो सरकारें अस्तित्व में बनी रहीं उन्होंने हमेशा अपने को आदिवासियों, दलितों, पिछड़ों का मसीहा घोषित बनाए रखा। जबकि जमीनी सच्चाई यह है कि आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी खासकर आदिवासियों की हालत में उल्लेखनीय सुधार नहीं आ पाया है। हमें इस बाबत समय रहते गौर करने की आवश्यकता है। यह इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि असामाजिक तौर पर कार्य करने की आदी कुछ समाज विरोधी ताकतें आदिवासियों के पिछड़े पन का लाभ उठाकर उन्हें हिंदुओं से अलग बताने एवं जिद पूर्वक इस अवस्था में स्थापित करने के षडयंत्रों में लगी रहती हैं। कई बार बनवासियों और आदिवासियों में शाब्दिक भेद उत्पन्न किए जाते हैं और उनके गलत मायने गढ़कर सामाजिक एकता को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास किया जाता है। आंशिक तौर पर उनके इस आशय के प्रयास कभी-कभी सफल होते भी देखे गए। इसका कारण यही है कि हमारा देश जिस गति से विकास के पथ पर आगे बढ़ रहा है, उस तेजी के साथ आदिवासी समाज का विकास हो ही नहीं पाया। दुख की बात यह है कि इस वर्ग ने जिन लोगों को अपना जनप्रतिनिधि बनाकर राज्यों की विधानसभाओं में और देश की लोकसभा में भेजा या फिर राज्यसभा में राजनीतिक दलों की ओर से जिन्हें आदिवासियों की भलाई के लिए नामित किया गया, उनमें से अधिकांश लोग केवल अपना विकास करने में जुटे रहे। इस सच्चाई को जानकर और अधिक अफसोस होता है कि यह वो लोग थे जो आदिवासी समाज से ही निकालकर संभ्रांत समाज का हिस्सा बने थे, लेकिन जैसे ही इन्हें सामाजिक तरक्की प्राप्त हुई वैसे ही इन्हें आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़े हुए अपने बंधु बांधवों की याद आना बंद हो गई। अतः अब आवश्यकता इस बात की है कि सभ्य समाज और आदिवासी समाज के बीच जो असंतुलन बना हुआ है, उसे खत्म किया जाए तथा उनके विकास के लिए ईमानदार जमीनी प्रयास किये जाएं। यह काम केवल सरकार अपने बलबूते पर कर पाएगी, ऐसा सोचना भी सही नहीं है। सभ्य और संभ्रांत समाज को एवं खास कर हिंदुओं को यह समझना होगा कि अंततः तो आदिवासी अर्थात बनवासी भाई हमारी मूल पहचान ही हैं।क्योंकि हमारी शुरुआत जंगलों से ही है। वहां से जैसे-जैसे विवेक और चेतना जागृत होती गई इस निरंतरता के साथ जंगलों में गांव बसे, फिर कस्बे और उसके बाद शहर महानगर अस्तित्व में आते चले गए। यानि जो आगे बढ़ गए वो बड़े-बड़े शहरों के निवासी होकर सभ्य अर्थात संभ्रांत नागरिक कहलाने लगे। लेकिन दुर्भाग्यवश जो आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पीछे रह गए, उन्हें आज भी आदिवासी या फिर वनवासी कहा जाता है। अभी तक इनके विकास में जितनी धनराशि बीते 7 दशकों में खर्च की गई, उससे इनका अपेक्षित विकास हो जाना चाहिए था। लेकिन यथार्थ यही है कि उनकी हालत में बहुत ज्यादा सुधार नहीं हो पाया है। इसका कारण यही है कि एक तो उनके द्वारा निर्वाचित उनके ही जनप्रतिनिधि उनके प्रति वफादार नहीं रहे। दूसरा कारण यह भी है कि उनके हिस्से में आई विकास की राशि भारी पैमाने पर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती रही। यह सब इसलिए भी संभव हो पाया क्योंकि शिक्षा और जागरूकता के अभाव के चलते यह निश्छल आदिवासी भाई समय रहते अपने हित अहित पहचान ही नहीं पाए। फल स्वरुप इनका आर्थिक सामाजिक शोषण बना रहा। लेकिन वर्तमान केंद्र सरकार और मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार ने अब आदिवासी अर्थात वनवासी भाइयों की सुध लेना शुरू कर दिया है, यह संतोष का विषय है। प्रतिवर्ष एक बड़ी रकम आदिवासी क्षेत्र के विकास के लिए खर्च की जा रही है। मध्य प्रदेश की डॉक्टर मोहन यादव की सरकार ने आदिवासी क्षेत्र के विकास को लक्ष्य बनाकर काम करना शुरू किया है। तो फिर आश्वस्त हुआ जा सकता है कि देर से ही सही, इस समाज के दिन बहुरने वाले हैं। यदि इस कार्य में शेष मानव समाज भी जागरूकता का परिचय देगा, इनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहेगा तो उन ताकतों को भी हतोत्साहित किया जा सकेगा जो आदिवासियों और शेष हिंदू समाज के बीच भेद पैदा कर अपना राजनीतिक स्वार्थ हासिल करने में लगी रहती हैं।

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