जन्मदिवस : जब मुख्यमंत्री

जन्मदिवस : जब मुख्यमंत्री निवास बन गया ‘वास्तव में जनता का निवास’

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जन्मदिवस : जब मुख्यमंत्री निवास बन गया ‘वास्तव में जनता का निवास’

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के जीवन के वसंत का एक नया अध्याय उस समय और भी अधिक गरिमापूर्ण और मानवीय संवेदनाओं से सराबोर हो गया, जब सत्ता की चकाचौंध और औपचारिकताओं के शोर से दूर मुख्यमंत्री निवास में एक ऐसी महफिल सजी जिसने राजनीति के कठोर चेहरों के पीछे छिपे कोमल मानवीय स्वरूप को उजागर कर दिया। डॉ. यादव के जन्मदिवस के अवसर पर आयोजित यह समारोह केवल एक व्यक्तिगत वर्षगांठ का उत्सव नहीं था, बल्कि यह सामाजिक समावेशिता, निस्वार्थ प्रेम और उन वर्ग के प्रति संवेदनशीलता का प्रतीक बन गया जो अक्सर समाज की मुख्यधारा की कोलाहल में पीछे छूट जाते हैं। भोपाल की ‘आरुषि’ संस्था के विशेष बच्चों का मुख्यमंत्री निवास पहुंचना और अपनी मूक भाषा में मुख्यमंत्री को ‘नायाब तोहफा’ देना, वास्तव में भारतीय लोकतांत्रिक परंपराओं में एक नई और आत्मीय संस्कृति का दर्शन कराता है। जब हाथ जुबान बन जाते हैं और आंखों की चमक शब्दों का रूप ले लेती है, तब संवाद की सार्थकता अपने चरमोत्कर्ष पर होती है। इन बच्चों ने बिना एक शब्द बोले अपनी खामोशी को इतनी तेज आवाज में दर्ज कराया कि वहां मौजूद हर व्यक्ति की आत्मा को छू लिया।
​इस भावुक क्षण की सार्थकता उस समय और बढ़ गई जब दृष्टिबाधित फाल्गुनी पुरोहित ने अपने मधुर सुरों से मंगलकामनाओं का गीत गाया। एक कलाकार के लिए आंखों की रोशनी का न होना बड़ी बाधा हो सकता है, लेकिन फाल्गुनी ने सिद्ध किया कि मन की आंखों से दुनिया को ज्यादा खूबसूरती से महसूस किया जा सकता है। उसके गीतों में छिपी ‘बेगरज’ भावना और मुख्यमंत्री के प्रति ‘अंकल’ वाला सहज संबोधन यह दर्शाता है कि डॉ. मोहन यादव ने राज्य के मुखिया के रूप में नहीं, बल्कि परिवार के एक बड़े सदस्य के रूप में अपनी छवि गढ़ी है। यह राजनीति में उस ‘ट्रस्टीशिप’ के सिद्धांत को जीवंत करने जैसा है, जहां एक जनसेवक खुद को जनता का स्वामी नहीं, बल्कि उनका संरक्षक मानता है। बच्चों द्वारा उंगलियों से ‘दिल’ बनाना और आसमान की तरफ हाथ लहराकर उनके शतायु होने की कामना करना किसी भी पुरस्कार या उपाधि से कहीं अधिक मूल्यवान है। यह दृश्य इस बात का गवाह बना कि भावनाओं में जब मिलावट नहीं होती, तब रिश्तों की प्रगाढ़ता स्वतः ही स्थापित हो जाती है।
​इसी क्रम में ‘बहनों की पाती भैया के नाम’ कार्यक्रम ने इस उत्सव को पारिवारिक उत्सव में तब्दील कर दिया। भारतीय संस्कृति में भाई-बहन का रिश्ता अटूट विश्वास और सुरक्षा का प्रतीक है। मुख्यमंत्री को उपहार और आशीर्वाद स्वरूप पाती भेंट करना यह स्पष्ट करता है कि मध्य प्रदेश की महिलाओं का विश्वास वर्तमान नेतृत्व में कितना गहरा है। डॉ. यादव ने जिस विनम्रता के साथ इन शुभकामनाओं को स्वीकार किया और अपनी सफलता का श्रेय बहनों के आशीर्वाद को दिया, वह उनके बड़प्पन और जमीन से जुड़े व्यक्तित्व को दर्शाता है। सरकार गठन के बाद से ही लगातार मिल रहे इस स्नेह को उन्होंने शासन की शक्ति माना है। मुख्यमंत्री का यह कहना कि ‘वास्तव में आज बहनों के आशीर्वाद का दिन है’, सत्ता के विकेंद्रीकरण और जन-भागीदारी की उस सोच को पुष्ट करता है जहाँ हर नीति के केंद्र में आम जनमानस की खुशी होती है। बहनों की अलग से पंचायत बुलाने का संकल्प केवल एक घोषणा नहीं है, बल्कि यह संवाद की उस प्रक्रिया को निरंतर रखने का वादा है, जो लोकतंत्र को जीवंत बनाती है।
​संपादकीय दृष्टिकोण से देखें तो यह पूरा घटनाक्रम इस बात की पुष्टि करता है कि एक संवेदनशील नेतृत्व ही संवेदनशील समाज का निर्माण कर सकता है। जब सत्ता के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति बच्चों के निस्वार्थ प्रेम के आगे नतमस्तक होता है और महिलाओं के स्नेह को अपनी सबसे बड़ी पूंजी मानता है, तब उस राज्य की प्रगति के मायने केवल आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे सामाजिक समरसता के नए प्रतिमान स्थापित करते हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के जन्मदिन पर उमड़ा यह जन-सैलाब और विशेषकर इन विशेष बच्चों की उपस्थिति ने यह संदेश दिया है कि विकास के पथ पर कोई भी पीछे नहीं छूटना चाहिए। यह दिन केवल एक व्यक्ति के जन्म का उत्सव नहीं था, बल्कि यह मध्य प्रदेश की उस साझा संस्कृति और आत्मीयता का उत्सव था, जहां ‘मुख्यमंत्री निवास’ वास्तव में ‘जनता का निवास’ बन गया है। इस तरह के आयोजनों से समाज में यह सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित होती है कि राजनीति केवल संघर्ष और प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह सेवा, समर्पण और संबंधों को सींचने का एक पवित्र मंच भी है।

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