राज्यसभा में बड़ा राजनीतिक उलटफेर : ‘आप’ के 7 सांसद आधिकारिक तौर पर भाजपा में शामिल, सभापति ने दी हरी झंडी
एजेंसी, नई दिल्ली। राज्यसभा की राजनीति में सोमवार को एक ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला जब सदन के सभापति ने आम आदमी पार्टी (आप) के सात पूर्व सांसदों के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में विलय को औपचारिक तौर पर मंजूरी प्रदान कर दी। राज्यसभा सचिवालय द्वारा जारी की गई नई सूची के अनुसार, इन सात सांसदों के भाजपा में शामिल होने से सदन में भाजपा की सदस्य संख्या 106 से बढ़कर 113 हो गई है। यह विलय 24 अप्रैल से ही प्रभावी माना गया है, जिसके चलते अब उच्च सदन में सत्ता पक्ष की स्थिति और अधिक मजबूत हो गई है।
राज्यसभा के सभापति ने सदन के उन सात सदस्यों के भारतीय जनता पार्टी ( भाजपा) में विलय को मंजूरी दे दी है जो हाल में आम आदमी पार्टी (आप) से अलग हो गए हैं।
राज्यसभा सचिवालय द्वारा सोमवार को जारी सदन में विभिन्न दलों की सदस्य सूची में आम आदमी पार्टी से अलग होकर भाजपा में शामिल होने… pic.twitter.com/CNl9doh8pU
— यूनीवार्ता (@univartaindia1) April 27, 2026
आधिकारिक सूची में हुए बदलाव
राज्यसभा सचिवालय की ओर से सोमवार को जारी विभिन्न दलों की ताजा सदस्य सूची में इन सातों नेताओं के नाम अब भाजपा सदस्यों के रूप में दर्ज हैं। भाजपा में शामिल होने वाले सांसदों में राघव चड्ढा, डॉ. संदीप कुमार पाठक, डॉ. अशोक कुमार मित्तल, हरभजन सिंह, विक्रमजीत सिंह साहनी, स्वाति मालीवाल और राजेंद्र गुप्ता शामिल हैं। इन सदस्यों ने गत शुक्रवार को एक संवाददाता सम्मेलन के माध्यम से सार्वजनिक रूप से भाजपा में शामिल होने का एलान किया था, जिसे अब संसदीय रिकॉर्ड में भी दर्ज कर लिया गया है।
‘आप’ का कुनबा सिमटकर हुआ छोटा
इस बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के बाद राज्यसभा में आम आदमी पार्टी की ताकत काफी कम हो गई है। पार्टी के कुल 10 सांसदों में से सात के चले जाने के बाद अब सदन में ‘आप’ के केवल तीन सदस्य ही बचे हैं। इनमें पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह, नारायण दास गुप्ता और संत बलबीर सिंह शामिल हैं। सचिवालय की नई सूची में आम आदमी पार्टी के सदस्यों की संख्या अब आधिकारिक तौर पर तीन दिखाई गई है।
विवाद की जड़ और राजनीतिक कारण
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, आम आदमी पार्टी के भीतर असंतोष की स्थिति तब से और गहरा गई थी जब पार्टी नेतृत्व ने राघव चड्ढा को सदन में ‘आप’ के उप नेता के पद से हटाने का निर्णय लिया था। इसके बाद से ही पार्टी के भीतर आंतरिक कलह बढ़ने की खबरें आ रही थीं। 24 अप्रैल को हुए संवाददाता सम्मेलन में सांसदों ने पार्टी छोड़ने की घोषणा करते हुए स्पष्ट किया था कि वे अब भाजपा के विजन के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं। इस विलय ने राष्ट्रीय राजधानी की राजनीति में भी नए समीकरण पैदा कर दिए हैं।
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