समान नागरिक संहिता

म.प्र. में समान नागरिक संहिता और सामाजिक समरसता की ओर बढ़ते कदम

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म.प्र. में समान नागरिक संहिता और सामाजिक समरसता की ओर बढ़ते कदम

​भारत जैसे विशाल और सांस्कृतिक विविधताओं से समृद्ध देश में ‘समान नागरिक संहिता’ (यूसीसी) पर चर्चा केवल एक कानूनी सुधार मात्र नहीं है, बल्कि यह एक साझा सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और राष्ट्रीय अखंडता को सुदृढ़ करने का एक ऐतिहासिक मार्ग है। इस दिशा में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम देश के नीतिगत इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात कर रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में प्रदेश में जिस लोकतांत्रिक और समावेशी प्रक्रिया के तहत जन-परामर्श का आयोजन किया गया है, उसने यह सिद्ध कर दिया है कि जब सरकारें जनता को विश्वास में लेकर नीति बनाती हैं, तो बड़े से बड़े सामाजिक सुधार के मार्ग भी सुगम हो जाते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून की स्वीकार्यता उसकी निर्माण प्रक्रिया की पारदर्शिता पर निर्भर करती है, और मध्य प्रदेश ने इस मामले में पूरे देश के सामने एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। सभी जिलों में आयोजित की गईं जन-परामर्श बैठकें इस बात का प्रमाण हैं कि इस संवेदनशील विषय पर समाज के हर तबके की राय को महत्व दिया गया है।

​इस वृहद् लोकतांत्रिक मंथन का सबसे सुखद और उत्साहजनक पहलू यह है कि प्रदेश के ९० प्रतिशत से भी अधिक नागरिकों ने समान नागरिक संहिता के पक्ष में अपना पुरजोर समर्थन व्यक्त किया है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण और स्वागत योग्य बात यह है कि अल्पसंख्यक समुदाय ने भी बहुत बड़ी संख्या में इस कानून की आवश्यकता को स्वीकारा है और इसके समर्थन में अपनी आवाज बुलंद की है। यह समर्थन इस बात का स्पष्ट संकेत है कि देश का आम नागरिक, चाहे वह किसी भी जाति, पंथ या संप्रदाय से हो, अब रूढ़िवादिता और विभाजनकारी राजनीति से ऊपर उठकर एक समान, प्रगतिशील और न्यायपूर्ण कानून व्यवस्था की आकांक्षा रखता है। नागरिकों से प्राप्त ९ लाख से अधिक लिखित और मौखिक सुझाव यह दर्शाते हैं कि जनता इस कानून को लेकर कितनी जागरूक है और देश के भविष्य को संवारने में अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कर रही है। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में जब जनता स्वयं किसी कानून के निर्माण में इतनी गहरी रुचि लेती है, तो वह कानून केवल कागजों पर सिमटा नहीं रहता, बल्कि समाज के व्यावहारिक जीवन का हिस्सा बन जाता है।
​राजनीतिक और वैचारिक दृष्टि से देखें तो समान नागरिक संहिता का क्रियान्वयन भारत के राजनीतिक विमर्श में एक ऐतिहासिक मोड़ है। कुछ नीतियां किसी संगठन या राजनीतिक दल के लिए महज चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा नहीं होतीं, बल्कि वे उनके अस्तित्व की मूल पहचान और राष्ट्र निर्माण के संकल्प से जुड़ी होती हैं। अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद ३७० की समाप्ति और समान नागरिक संहिता लागू करना, ये तीन ऐसे संकल्प थे जिन्होंने दशकों तक देश की राजनीतिक दिशा को प्रभावित किया। पहले जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी ने इन तीनों मुद्दों को देश की जनता के समक्ष अपनी सांस्कृतिक और राष्ट्रीय प्रतिबद्धता के रूप में प्रस्तुत किया था। इनमें से दो बड़े संकल्पों को जिस गरिमा और शांतिपूर्ण तरीके से पूरा किया गया, उसने जनता के भीतर लोकतांत्रिक व्यवस्था और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के प्रति विश्वास को अभूतपूर्व रूप से सुदृढ़ किया है। अब समान नागरिक संहिता की दिशा में बढ़ते कदम इसी अटूट विश्वास को और अधिक मजबूती प्रदान कर रहे हैं कि देश के नेतृत्व में बड़े और युगांतकारी निर्णय लेने की न केवल दृढ़ इच्छाशक्ति है, बल्कि उन्हें धरातल पर उतारने की प्रशासनिक कुशलता भी है।
​यूसीसी का मूल दर्शन किसी भी नागरिक की धार्मिक स्वतंत्रता या उसकी अनूठी सांस्कृतिक परंपराओं को ठेस पहुंचाना कतई नहीं है, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य नागरिक अधिकारों, विशेषकर महिलाओं के अधिकारों में एकरूपता और समानता लाना है। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे संवेदनशील पारिवारिक मामलों में जब पूरे देश के नागरिकों के लिए एक समान और न्यायपूर्ण व्यवस्था होगी, तो इससे सामाजिक समरसता को एक नई ऊर्जा मिलेगी। आधुनिक समाज में किसी भी नागरिक के साथ उसके लिंग या धार्मिक मान्यताओं के आधार पर कानूनी अधिकारों में भेदभाव नहीं होना चाहिए। समान नागरिक संहिता इसी समतावादी विचार को धरातल पर उतारने का माध्यम है। मध्य प्रदेश में सभी आयोगों, विभागों, विभिन्न राजनीतिक दलों और अलग-अलग मत-पंथों के धर्मगुरुओं के साथ पृथक-पृथक बैठकें आयोजित कर जिस प्रकार से व्यापक संवाद स्थापित किया गया, उसने इस भ्रांति को पूरी तरह से तोड़ दिया है कि यह कानून किसी पर जबरन थोपा जा रहा है। शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न हुई यह प्रक्रिया देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक मार्गदर्शिका का कार्य करेगी।
​मध्य प्रदेश सरकार की कार्ययोजना की गति और इसकी समयबद्धता भी सराहनीय है। जून के अंत तक सुझावों की प्रक्रिया पूरी कर जुलाई की शुरुआत में ही विधेयक का प्रारूप तैयार कर लेना और उसे आगामी मानसून सत्र में विधानसभा के पटल पर रखना यह दर्शाता है कि सरकार इस विषय को लेकर पूरी तरह से गंभीर और कटिबद्ध है। एनडीए शासित राज्यों द्वारा एक के बाद एक समान नागरिक संहिता की दिशा में कदम बढ़ाना इस बात की ओर संकेत करता है कि देश में एक समान विधिक ढांचे को लेकर एक व्यापक आम सहमति बन रही है। केंद्र सरकार राज्यों के माध्यम से इस कानून को लागू करने की रूपरेखा को आगे बढ़ाकर एक प्रकार से देश की धड़कनों और जनभावनाओं को टटोल रही है, ताकि जब इसे निर्णायक रूप से पूरे देश में लागू किया जाए, तो इसकी स्वीकार्यता सर्वव्यापी और निर्विवाद हो। यह एक अत्यंत परिपक्व और दूरदर्शी रणनीतिक दृष्टिकोण है, जहां सुधारों की शुरुआत जमीन से होती है और वे धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्वरूप धारण कर लेते हैं।
​इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि समान नागरिक संहिता आने वाले समय में भारतीय समाज को और अधिक संगठित, आधुनिक और समतामूलक बनाने में मील का पत्थर साबित होगी। जब समाज के सभी वर्गों के लिए नागरिक नियम समान होंगे, तो तुष्टिकरण और भेदभाव की राजनीति स्वतः ही समाप्त हो जाएगी। मध्य प्रदेश की जनता ने इस विमर्श में जिस सकारात्मकता, परिपक्वता और उत्साह के साथ भाग लिया है, वह नए भारत की नई सोच का परिचायक है। यह सोच एक ऐसे सशक्त राष्ट्र के निर्माण की है जहां कानून की नजर में हर नागरिक बराबर हो और जहां प्रगति के अधिकार सभी को समान रूप से उपलब्ध हों। मुख्यमंत्री और उनकी विधि समिति द्वारा समाज के हर वर्ग के कल्याण को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा यह प्रारूप निश्चित रूप से एक सर्वसमावेशी और प्रगतिशील समाज की नींव को मजबूत करेगा, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक महान और एकजुट भारत का मार्ग प्रशस्त करेगा।

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