जनतांत्रिक शासन का जीवंत उदाहरण सीएम मोहन यादव किसानों के बीच
लोकतंत्र की असली सार्थकता तब सिद्ध होती है जब सत्ता के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति ज़मीनी हकीकत को अपनी आंखों से देखने के लिए वातानुकूलित कमरों के घेरे को तोड़कर सीधे जनता के बीच पहुँच जाता है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का खरगौन के कतरगांव स्थित गेहूं उपार्जन केंद्र पर अचानक पहुंचना इसी जन-केंद्रित शासन का एक जीवंत उदाहरण पेश करता है। यह महज एक सरकारी दौरा नहीं था, बल्कि अन्नदाता के प्रति संवेदनशीलता और जवाबदेही का एक सशक्त संदेश था। जब प्रदेश का मुखिया खुद किसानों के साथ बैठकर चाय की चुस्कियों के बीच उनकी समस्याओं को सुनता है, तो यह शासन और जनता के बीच की उस गहरी खाई को पाट देता है जो अक्सर नौकरशाही की फाइलों में गुम हो जाती है। डॉ. यादव का यह औचक निरीक्षण इस बात का प्रमाण है कि प्रदेश सरकार किसानों की नाराजगी को केवल दूर से भांप ही नहीं रही है, बल्कि समय रहते उसे हल करने के लिए प्रतिबद्धता के साथ मैदान में भी उतर गई है। कतरगांव की उस तपती दोपहर में जब मुख्यमंत्री ने स्लॉट बुकिंग और भुगतान की पारदर्शी व्यवस्था का जायजा लिया, तो किसानों के चेहरे की मुस्कान ने यह साफ कर दिया कि संवाद ही किसी भी समस्या का सबसे बड़ा समाधान होता है।
माननीय मुख्यमंत्री @DrMohanYadav51 जी ने आज खरगोन प्रवास के दौरान कतरगांव में गेहूं उपार्जन केंद्र का औचक निरीक्षण किया।
इस अवसर पर माननीय मुख्यमंत्री जी ने वहां उपस्थित किसानों एवं पशुपालकों के साथ खेती पर चर्चा भी की। pic.twitter.com/YxAiQbkpyh
— Office of Dr. Mohan Yadav (@drmohanoffice51) April 30, 2026
राज्य सरकार की प्राथमिकताएं केवल कागजों पर सिमटी हुई नहीं हैं, बल्कि वे उन सुधारों में झलकती हैं जो सीधे तौर पर किसान की आय और सुविधा से जुड़े हैं। गेहूं उपार्जन की प्रक्रिया को सरल और किसान-अनुकूल बनाने के लिए उठाए गए कदम क्रांतिकारी कहे जा सकते हैं। अक्सर खराब मौसम या प्राकृतिक आपदाओं के कारण अनाज की चमक फीकी पड़ जाती है या दाने क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, जिसका सीधा खामियाजा किसान को कम कीमत के रूप में भुगतना पड़ता था।
मुख्यमंत्री ने संवेदनशीलता दिखाते हुए चमक विहीन गेहूं की सीमा को बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिया और सूकड़े व क्षतिग्रस्त दानों की सीमा में भी राहत प्रदान की। यह निर्णय न केवल वैज्ञानिक है बल्कि मानवीय भी है, क्योंकि यह किसानों को उनकी मेहनत का पूरा मूल्य दिलाने की दिशा में एक बड़ा सहारा है। सरकार का यह संकल्प कि प्रत्येक अन्नदाता को सम्मान और उसकी उपज का उचित मूल्य मिले, अब धरातल पर क्रियान्वित होता दिख रहा है। उपार्जन केंद्रों पर बुनियादी सुविधाओं जैसे पानी और छांव के विस्तार के निर्देश देना यह दर्शाता है कि सरकार किसान के श्रम की कितनी कद्र करती है। तकनीक और विकेंद्रीकरण का सामंजस्य आज के प्रशासन की सबसे बड़ी जरूरत है, जिसे मध्य प्रदेश सरकार ने बखूबी अपनाया है। ओटीपी के माध्यम से किए जा रहे भुगतान की जानकारी खुद मुख्यमंत्री द्वारा लेना यह सुनिश्चित करता है कि बिचौलियों की भूमिका पूरी तरह समाप्त हो और पैसा सीधे किसान के खाते में पहुंचे। इसके साथ ही, जिले के किसी भी उपार्जन केंद्र पर अपनी उपज बेचने की आजादी देना किसानों के लिए किसी बड़ी खुशखबरी से कम नहीं है। यह व्यवस्था किसानों को परिवहन की असुविधाओं से बचाती है और उन्हें अपनी सुविधा के अनुसार मंडी चुनने का अधिकार देती है। तौल कांटों की संख्या बढ़ाना और बारदाने से लेकर सिलाई मशीनों तक की उपलब्धता सुनिश्चित करना उन छोटी-छोटी बाधाओं को दूर करने का प्रयास है जो अक्सर बड़ी परेशानियों का कारण बनती थीं। मुख्यमंत्री का यह ‘सरप्राइज विजिट’ अधिकारियों के लिए भी एक चेतावनी है कि लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं है और किसानों के हितों के साथ समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कुल मिलाकर, डॉ. मोहन यादव की यह कार्यशैली न केवल प्रशासनिक सक्रियता को दर्शाती है, बल्कि एक ऐसे ‘कल्याणकारी राज्य’ की तस्वीर भी पेश करती है जहां विकास का पैमाना अंतिम पंक्ति में खड़े किसान के संतोष से मापा जाता है। जब सरकार और किसान एक ही मेज पर बैठकर भविष्य की योजनाएं तय करते हैं, तो कृषि प्रधान मध्य प्रदेश की प्रगति को नई गति मिलना निश्चित है। यह नेतृत्व की वह परिपक्वता है जो चुनौतियों को संभावनाओं में बदलना जानती है।
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