TMC Party Split

ममता बनर्जी की हार के 14 दिन बाद ही पर्दे के पीछे टूट गई थी टीएमसी, लोकसभा अध्यक्ष को भेजा गया बागी सांसदों का पत्र अब आया सामने

देश/प्रदेश पश्चिम बंगाल

एजेंसी, कोलकाता। TMC Party Split : पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में मची ऐतिहासिक राजनैतिक उथल-पुथल को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। मीडिया और आम जनता के बीच इस बगावत की खबर फैलने से काफी पहले ही पार्टी के भीतर आंतरिक रूप से बड़ा विभाजन हो चुका था। शुक्रवार को सामने आए एक गोपनीय पत्र से यह साफ हो गया है कि लोकसभा के उन्नीस बागी सांसदों ने ममता बनर्जी की चुनावी हार के महज चौदह दिनों के भीतर ही यानी अट्ठारह मई को ही लोकसभा अध्यक्ष को अपना इस्तीफा और अलग गुट बनाने का आवेदन सौंप दिया था। इसका सीधा मतलब यह है कि तृणमूल कांग्रेस में टूट की यह पूरी पटकथा बहुत पहले ही लिखी जा चुकी थी, जिसे पूरी तरह गुप्त रखा गया था और अब जाकर यह दस्तावेज़ आधिकारिक रूप से सामने आया है। इस ऐतिहासिक पत्र में यूसुफ पठान, सायोनी घोष, काकोली घोष और शताब्दी रॉय जैसे बंगाल के दिग्गज नेताओं के हस्ताक्षर मौजूद हैं।

दलबदल विरोधी कानून की कसौटी पर बागी पूरी तरह सफल

भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून के कड़े नियमों के अनुसार, किसी भी राजनैतिक दल के भीतर से टूटकर बने नए गुट को वैधानिक मान्यता तभी मिल सकती है, जब मूल पार्टी के कम से कम दो-तिहाई विधायक या सांसद उस बगावत का खुला समर्थन कर रहे हों। तृणमूल कांग्रेस के वर्तमान गणित को देखें, तो बागियों ने इस कानूनी कसौटी को बहुत पहले ही पूरी तरह से पार कर लिया था:

  • विधानसभा की स्थिति: विधानसभा चुनावों में पार्टी ने कुल अस्सी सीटों पर विजय हासिल की थी, जिनमें से अट्ठावन विधायक ममता बनर्जी का साथ छोड़कर तीन जून को ही अलग गुट की मान्यता पा चुके हैं। इस प्रकार बागियों के पास दो-तिहाई से कहीं अधिक का आंकड़ा मौजूद है।

  • लोकसभा की स्थिति: देश की संसद के निचले सदन यानी लोकसभा में पार्टी के कुल अट्ठाईस निर्वाचित सांसदों में से बीस सांसद खुलकर बगावत का झंडा बुलंद कर चुके हैं, जो कि जरूरी दो-तिहाई बहुमत की सीमा से कहीं ज्यादा है।

इन नियमों के तहत यह दो-तिहाई सदस्य या तो किसी दूसरी बड़ी राजनैतिक पार्टी में अपना पूर्ण विलय कर सकते हैं या फिर संसद में अपनी अलग पहचान की मांग कर सकते हैं। हालांकि इस पर अंतिम और सर्वोच्च फैसला लेने का अधिकार केवल विधानसभा और लोकसभा के अध्यक्षों का ही होता है, परंतु ममता बनर्जी का वफादार गुट इस पूरे फैसले के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहा है।

दिल्ली में रविवार को होगी महाबैठक, सोमवार को अध्यक्ष से मुलाकात

तृणमूल कांग्रेस का यह नवगठित बागी गुट आगामी रविवार को देश की राजधानी नई दिल्ली में एक बेहद महत्वपूर्ण सांगठनिक बैठक करने जा रहा है। इस बैठक की सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता शुभेंदु अधिकारी भी मुख्य रूप से शामिल होने वाले हैं। इसके ठीक अगले दिन यानी सोमवार को इस बागी धड़े के सभी प्रमुख नेताओं की मुलाकात लोकसभा अध्यक्ष के साथ होनी तय पाई गई है, जहां वे अपने गुट को असली तृणमूल कांग्रेस के रूप में मान्यता देने की वैधानिक मांग पेश करेंगे। इस बीच, शुक्रवार को सामने आए आधिकारिक पत्र में केवल सांसदों के हस्ताक्षर वाला पन्ना ही मीडिया के हाथ लगा है, जिसमें बारासात से काकोली घोष, घाटाल से प्रसिद्ध अभिनेता दीपक अधिकारी (देव), बहरामपुर से पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान और बीरभूम से शताब्दी रॉय जैसी जानी-मानी हस्तियों के नाम पूरी तरह स्पष्ट दिख रहे हैं।

बंगाल की राजनैतिक टूट ने ताजा की महाराष्ट्र की चार साल पुरानी यादें

पश्चिम बंगाल के इस अप्रत्याशित घटनाक्रम ने साल दो हजार बाइस में महाराष्ट्र के भीतर हुई ऐतिहासिक शिवसेना की टूट की यादों को पूरी तरह ताजा कर दिया है। चार वर्ष पहले, बीस जून दो हजार बाइस को महाविकास अघाड़ी सरकार के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ उनकी ही पार्टी के पचपन में से चालीस विधायकों ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बगावत कर दी थी। उस दौरान भी राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को सदन में बहुमत साबित करने यानी फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया था। उद्धव ठाकरे इस आदेश के खिलाफ देश की सबसे बड़ी अदालत गए थे, लेकिन जब न्यायालय ने फ्लोर टेस्ट पर रोक लगाने से साफ मना कर दिया, तो उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। बाद में तीस जून दो हजार बाइस को एकनाथ शिंदे ने भारतीय जनता पार्टी के बाहरी समर्थन से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी और देश के चुनाव आयोग ने लंबी कानूनी लड़ाई के बाद असली शिवसेना का नाम और उनका पारंपरिक धनुष-बाण चुनाव चिह्न भी शिंदे गुट को ही सौंप दिया था।

ममता बनर्जी के पास बची बेहद कम ताकत, राज्यसभा से भी लगातार इस्तीफे

इस भीषण राजनैतिक भूचाल के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पैरों के नीचे से बंगाल की सत्ता पूरी तरह खिसकती नजर आ रही है। लोकसभा में जहां कभी उनके पास अट्ठाईस सांसदों की बड़ी ताकत थी, वहीं अब उनके खेमे में केवल आठ वफादार सांसद ही शेष बचे हैं। राज्य विधानसभा की बात करें तो अस्सी विधायकों के बड़े दल में से अब उनके पास केवल बाईस विधायकों का ही छोटा सा समर्थन बाकी रह गया है। बात यहीं खत्म नहीं होती, संसद के ऊपरी सदन यानी राज्यसभा के भीतर भी पिछले चार दिनों के दौरान तृणमूल कांग्रेस के चार बड़े सांसदों ने अपनी सदस्यता से आधिकारिक तौर पर त्यागपत्र दे दिया है। इनमें आठ जून को सुखेंदु शेखर, दस जून को सुष्मिता देव और उसके बाद ग्यारह जून को प्रकाश चिक और कोयल मलिक द्वारा दिए गए इस्तीफे शामिल हैं, जिसके बाद राज्यसभा में ममता बनर्जी के पास केवल नौ सांसद ही बचे हैं।

वफादार सांसदों ने लगाया सत्ताधारी दल पर डराने-धमकाने का आरोप

पार्टी के भीतर लगी इस भीषण आग पर अपना तीखा पक्ष रखते हुए ममता बनर्जी के बेहद वफादार सांसद कीर्ति आजाद ने शुक्रवार को एक बड़ा बयान जारी किया है। उन्होंने कहा कि यह पूरी बगावत कोई आंतरिक असंतोष नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी की एक बहुत बड़ी सोची-समझी राजनैतिक चाल है। उन्होंने दावा किया कि बगावत करने वाले कई सांसदों के घरों पर सत्ताधारी दल के एजेंट जबरन बैठे हुए थे और स्थानीय पुलिस बाहर पहरा दे रही थी। नेताओं के परिवारों को डराया-धमकाया गया और कई सांसदों के घर तक तोड़ दिए गए, जिसके कारण डर के मारे उन्हें इस बगावती पत्र पर दस्तखत करने पड़े। उन्होंने पत्र की लिखावट पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहले आठ नाम एक अलग तरह की स्याही से लिखे गए हैं, जबकि बाद के नाम काली स्याही से दर्ज हैं, जो यह साफ दर्शाता है कि यह पूरा षड्यंत्र एक सोचे-समझे टूलकिट के तहत रचा गया है।

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