TMC Congress Merger

पश्चिम बंगाल के राजनीतिक महासंग्राम के बीच सबसे बड़ा यू-टर्न : तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में हो सकता है पूर्ण विलय, सोनिया-ममता की गुप्त बैठक से मची खलबली

नई दिल्ली राष्ट्रीय

एजेंसी, नई दिल्ली। TMC Congress Merger : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस की करारी हार और उसके बाद संगठन के भीतर मची ऐतिहासिक बगावत के बीच देश की राजनीति से इस समय की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। कभी पश्चिम बंगाल पर एकछत्र राज करने वाली और दिल्ली की सत्ता में किंगमेकर बनने का ख्वाब देखने वाली ममता बनर्जी अब अपनी 28 साल पुरानी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) में पूर्ण विलय (मर्जर) करने की अंतिम और सबसे बड़ी योजना पर बहुत गंभीरता से विचार कर रही हैं। इस सिलसिले में देश की राजधानी दिल्ली के सियासी गलियारों में बैक-टू-बैक दो बेहद हाई-प्रोफाइल और गोपनीय बैठकें हुई हैं, जिसने कलकत्ता से लेकर दिल्ली तक की राजनीति में भारी भूचाल ला दिया है।

सोनिया गांधी के गले लगकर रो पड़ीं ममता बनर्जी, बयां किया अपनी पार्टी के टूटने का दर्द

नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आयोजित इंडिया (INDIA) गठबंधन की अहम बैठक के ठीक बाद यह पूरा राजनीतिक घटनाक्रम बेहद तेजी से बदला। तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी सीधे कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात करने उनके आवास 10 जनपथ पहुंचीं। करीब 45 मिनट तक चली इस अत्यंत गोपनीय बैठक के दौरान ममता बनर्जी अपने दल के 20 लोकसभा सांसदों के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के खेमे में जाने और रिताब्रता बनर्जी के नेतृत्व में 58 विधायकों द्वारा किए गए खुले विद्रोह का जिक्र करते हुए बेहद भावुक हो गईं। सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने सोनिया गांधी के गले लगकर अपना दर्द बयां किया और यह स्वीकार किया कि बंगाल में शुभेंदु अधिकारी की नई सरकार आने के बाद और केंद्रीय जांच एजेंसियों के बढ़ते चौतरफा शिकंजे के बीच अब उनके लिए अकेले अपने दम पर संगठन को बचाए रख पाना बिल्कुल भी मुमकिन नहीं रह गया है। इस संकट की घड़ी में सोनिया गांधी ने उन्हें ढाढ़स बंधाते हुए अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय करने की कूटनीतिक सलाह दी।

अज्ञात ठिकाने पर राहुल गांधी और अभिषेक बनर्जी के बीच तैयार हुई नई स्क्रिप्ट

एक तरफ जहाँ 10 जनपथ पर सोनिया और ममता के बीच बातचीत चल रही थी, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी और तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के बीच दिल्ली में ही एक अज्ञात ठिकाने पर बेहद लंबी और रणनीतिक बैठक आयोजित हुई। अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि विधायकों के जाली हस्ताक्षर मामले में सीआईडी द्वारा कालीघाट स्थित आवास पर भेजे गए तीसरे कड़े समन और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के कानूनी फंदे में बुरी तरह घिरे अभिषेक बनर्जी ने राहुल गांधी से इस संकट के समय में राजनीतिक और कानूनी सुरक्षा की गुहार लगाई है। इस गुप्त बैठक के बाद यह माना जा रहा है कि दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व के बीच विलय को लेकर एक नई स्क्रिप्ट पूरी तरह से तैयार की जा चुकी है, जिसकी आधिकारिक घोषणा जल्द ही की जा सकती है।

आखिर ममता बनर्जी और उनके भतीजे के लिए क्यों जरूरी हो गया यह विलय

राजनीतिक विश्लेषकों और जानकारों का मानना है कि यदि तृणमूल कांग्रेस का आधिकारिक तौर पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय हो जाता है, तो यह ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक वजूद को बचाने के लिए एक बड़ा सुरक्षा कवच साबित होगा। इस विलय के बाद वे दोनों केवल एक क्षेत्रीय दल के क्षत्रप की बजाय देश की सबसे बड़ी और मुख्य विपक्षी पार्टी के राष्ट्रीय चेहरे के रूप में स्थापित हो जाएंगे, जिससे उन्हें केंद्रीय स्तर पर एक मजबूत राजनीतिक ढाल मिल जाएगी। इसके साथ ही, पश्चिम बंगाल की जमीनी राजनीति में वे कांग्रेस के पुराने और मजबूत कैडर को अपने साथ मिलाकर सत्ताधारी शुभेंदु अधिकारी सरकार के खिलाफ एक बहुत बड़ा और प्रभावी मोर्चा खड़ा करने में कामयाब हो सकेंगे।

28 साल बाद इतिहास ने बदला रुख, जहां से बगावत की थी वहीं लौट रही हैं दीदी

यदि यह विलय अपनी अंतिम परिणति तक पहुंचता है, तो यह भारतीय राजनीतिक इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा और अभूतपूर्व यू-टर्न माना जाएगा। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ममता बनर्जी ने तत्कालीन कांग्रेस आलाकमान के फैसलों और नीतियों से पूरी तरह बगावत करके 1 जनवरी 1998 को अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (एआईटीसी) की स्थापना की थी। उस समय उन्होंने पूरे देश में यह आक्रामक नारा दिया था कि ‘असली कांग्रेस’ वही हैं। लेकिन आज ठीक 28 साल के बाद इतिहास ने ऐसा पलटा खाया है कि ममता बनर्जी अपने पूरे राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए उसी कांग्रेस के दरवाजे पर वापस शरण लेने को मजबूर हो गई हैं।

प्रदेश कांग्रेस कमेटी में भारी असंतोष, अधीर रंजन चौधरी गुट ने दी आत्मघाती कदम की चेतावनी

भले ही दिल्ली के बंद कमरों में आलाकमान के स्तर पर इस विलय की खिचड़ी बहुत तेजी से पक रही हो, लेकिन पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (डब्ल्यूबीपीसीसी) के स्थानीय नेता इस फैसले से रत्ती भर भी खुश नहीं हैं। बंगाल कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी के खेमे के नेताओं ने इस संभावित विलय का अंदरूनी तौर पर पुरजोर विरोध करना शुरू कर दिया है। प्रदेश नेताओं का साफ तौर पर मानना है कि जिस ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के भीतर कांग्रेस को पूरी तरह से जमींदोज और खत्म करने के लिए पिछले तीन दशकों तक कथित रूप से हिंसक राजनीति का सहारा लिया, आज उसी को दोबारा पार्टी में शामिल करना बंगाल के कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ बड़ा धोखा और आत्मघाती कदम साबित होगा। इसके साथ ही, यूसुफ पठान और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष और कद्दावर सांसदों की इस पूरे घटनाक्रम पर छाई रहस्यमयी चुप्पी यह साफ बयां कर रही है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर का बिखराव अब अपने अंतिम और निर्णायक चरण में पहुंच चुका है।

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