एजेंसी, नई दिल्ली। Supreme Court Voter List Case : देश की सर्वोच्च अदालत ने नागरिकता और मतदाता सूची को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कानूनी व्यवस्था दी है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया जाता है, तो मात्र इस तकनीकी आधार पर उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त नहीं मानी जा सकती। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने उन पीड़ित नागरिकों को सरकारी और जन-कल्याणकारी योजनाओं का लाभ निरंतर मिलते रहने की मांग वाली याचिका पर संज्ञान लेते हुए पश्चिम बंगाल सरकार और भारत निर्वाचन आयोग को आधिकारिक नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया है।
The Supreme Court has sought a response from the Election Commission of India, West Bengal government, and the Chief Electoral Officer of the State in a petition seeking time-bound disposal of appeals filed by person excluded from the voter list following the SIR process.… pic.twitter.com/5aTfRDDI5X
— LawBeat (@LawBeatInd) July 17, 2026
नागरिकता पर अंतिम निर्णय होने तक सरकारी सुविधाएं बहाल रखने की मांग
दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय में प्रसनजीत बोस नामक याचिकाकर्ता की ओर से एक विशेष याचिका दायर की गई है। इस याचिका में अदालत से यह मुख्य मांग की गई है कि पश्चिम बंगाल में जिन लोगों के नाम स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी विशेष गहन समीक्षा प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से काट दिए गए हैं, उन्हें मिलने वाली विभिन्न कल्याणकारी सरकारी योजनाओं का लाभ किसी भी कीमत पर बंद नहीं किया जाना चाहिए। याचिका में दलील दी गई है कि जब तक किसी व्यक्ति की नागरिकता के संबंध में कानूनन कोई अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक उसे राशन, स्वास्थ्य और अन्य सभी आवश्यक मूलभूत सुविधाएं पूर्ववत मिलती रहनी चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली विशेष पीठ ने मामले को माना गंभीर
इस बेहद संवेदनशील और दूरगामी मामले की गंभीरता को देखते हुए माननीय मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की तीन सदस्यीय विशेष खंडपीठ ने इस पर विस्तृत सुनवाई की। अदालत ने माना कि यह मामला सीधे तौर पर आम नागरिकों के जीवन जीने के अधिकार से जुड़ा हुआ है। बेंच ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि नागरिकता का निर्धारण होने से पहले ही लोगों को उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है, जो कि न्यायसंगत नहीं है। इसी आधार पर न्यायालय ने चुनाव आयोग और राज्य सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए कहा है।
लाखों मामले लंबित और केवल 19 ट्रिब्यूनल कर रहे हैं काम
अदालत के समक्ष याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने देश में नागरिकता से जुड़े मामलों के निपटारे की कछुआ गति को लेकर कई चौंकाने वाले आंकड़े प्रस्तुत किए। उन्होंने खंडपीठ को बताया कि वर्तमान में नागरिकता से संबंधित करीब 34 लाख से अधिक मामले विभिन्न स्तरों पर लंबित पड़े हुए हैं, जबकि अभी तक केवल 38 हजार मामलों का ही पूरी तरह से निपटारा किया जा सका है। उन्होंने अदालत का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि इतने बड़े पैमाने पर लंबित मामलों को देखने के लिए फिलहाल देश में केवल 19 ट्रिब्यूनल यानी न्यायाधिकरण ही कार्यरत हैं, जो कि आबादी के अनुपात में बेहद कम हैं।
ट्रिब्यूनल के कामकाज को पूरी तरह पारदर्शी बनाने की बड़ी अपील
वरिष्ठ वकील ने इन विशेष न्यायाधिकरणों के कामकाज की शैली पर सवाल उठाते हुए मांग की है कि इन सभी ट्रिब्यूनलों की कार्यप्रणाली को पूरी तरह से पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। इसके लिए उन्होंने यह अनिवार्य करने की मांग की कि ट्रिब्यूनल की आधिकारिक वेबसाइट पर सभी महत्वपूर्ण अदालती आदेश, निर्णय और दिशा-निर्देशों को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाए, ताकि आम जनता को भटकना न पड़े। याचिका में यह भी कहा गया है कि जिन लोगों के पास पहले से ही पासपोर्ट या अन्य वैध सरकारी दस्तावेज मौजूद हैं, उन्हें नागरिकता साबित करने के नाम पर बार-बार नए दस्तावेज जमा करने के लिए प्रताड़ित न किया जाए।
बिना अंतिम फैसले के राशन और जाति प्रमाणपत्र देने से इनकार
अदालत को सूचित किया गया कि वोटर लिस्ट से नाम कटने के बाद जमीनी स्तर पर गरीब लोगों को अत्यंत गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें राशन, अन्नपूर्णा योजना और पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम यानी सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत मिलने वाले खाद्यान्न से पूरी तरह वंचित किया जा रहा है, जबकि उनकी नागरिकता के मामले पर अभी तक कोई कानूनी फैसला भी नहीं आया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि पश्चिम बंगाल सरकार ने बकायदा अधिसूचना जारी करके ऐसे लोगों को इन आवश्यक योजनाओं का लाभ देने से मना कर दिया है और यहां तक कि स्थानीय प्रशासन द्वारा उनके जाति प्रमाणपत्र जारी करने पर भी पूरी तरह रोक लगा दी गई है।
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से 58 लाख से ज्यादा नाम काटे गए
सरकारी आंकड़ों और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की हालिया ड्राफ्ट लिस्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में बहुत बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। इस विशेष समीक्षा प्रक्रिया के बाद राज्य की मतदाता सूची से कुल 58.20 लाख लोगों के नाम काट दिए गए हैं। इस ड्राफ्ट सूची के जारी होने से पहले राज्य में कुल पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ दर्ज थी, जो अब घटकर केवल 7.08 करोड़ रह गई है। सांख्यिकीय दृष्टि से देखा जाए तो काटे गए मतदाताओं का कुल प्रतिशत 7.6 बैठता है, जिसका सीधा अर्थ यह है कि राज्य में हर 100 मतदाताओं में से लगभग 8 लोगों के नाम मतदाता सूची से पूरी तरह साफ कर दिए गए हैं।
मृत, फर्जी और लापता श्रेणी के तहत हटाए गए नाम
हालांकि, चुनाव आयोग के सूत्रों द्वारा दिए गए विवरण के अनुसार, मतदाता सूची से हटाए गए इन 58.20 लाख नामों का एक विस्तृत वर्गीकरण भी सामने आया है। अधिकारियों का दावा है कि हटाए गए कुल नामों में से लगभग 24.17 लाख लोग पूरी तरह से मृत पाए गए हैं, जिनकी मृत्यु के बाद भी नाम सूची में दर्ज थे। इसके अतिरिक्त, करीब 1.38 लाख नाम पूरी तरह से डुप्लीकेट या फर्जी पाए गए, जिन्हें नियमों के तहत हटाया गया है। वहीं, सबसे बड़ी संख्या यानी लगभग 32.65 लाख मतदाता ऐसे पाए गए जो या तो अपने पुराने पते से किसी अन्य स्थान पर शिफ्ट हो चुके हैं, या पूरी तरह से लापता हैं और अन्य तकनीकी कारणों से उनके नाम सूची में बरकरार नहीं रखे जा सकते थे।
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