एजेंसी, भुवनेश्वर। Mahaprabhu Jagannath Film HC Stay : उड़ीसा हाईकोर्ट ने भगवान जगन्नाथ की महिमा पर आधारित एक नई एनिमेटेड फिल्म ‘महाप्रभु जगन्नाथ’ के सिनेमाघरों में प्रदर्शन को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने देश के बेहद पवित्र त्योहारों में से एक रथ यात्रा उत्सव के वर्तमान समय को देखते हुए इस फिल्म की रिलीज पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। माननीय अदालत का मानना है कि पवित्र रथ यात्रा के पावन अवसर पर इस संवेदनशील फिल्म को बड़े पर्दे पर दिखाने से क्षेत्र की सार्वजनिक कानून व्यवस्था पूरी तरह से प्रभावित हो सकती है। इसके साथ ही इस फिल्म के कुछ दृश्यों से करोड़ों श्रद्धालुओं की गहरी धार्मिक भावनाओं को गंभीर ठेस पहुंचने की भी बड़ी आशंका जताई गई है, जिसके चलते यह बड़ा न्यायिक निर्णय लिया गया है।
A petition has been filed in the Supreme Court challenging the Odisha High Court’s ban on the film ‘Mahaprabhu Jagannath’. The High Court had imposed a nationwide ban on the animated film, stating that it did not conform to the Skanda Purana.
Senior advocate Devadatt Kamath… pic.twitter.com/QI9rirmTQD
— IANS (@ians_india) July 16, 2026
मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने 17 जुलाई की रिलीज पर लगाया पूर्ण प्रतिबंध
उड़ीसा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश हरीश टंडन और न्यायमूर्ति एमएस रमन की प्रतिष्ठित खंडपीठ ने इस संवेदनशील मामले की गंभीरता को समझते हुए एक अंतरिम आदेश जारी किया है। इस न्यायिक आदेश में स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया है कि अदालत की लिखित अनुमति के बिना या फिर इस मामले की अगली सुनवाई पूरी होने तक इस फिल्म को 17 जुलाई 2026 या उसके बाद भी किसी भी तारीख पर रिलीज नहीं किया जा सकेगा। इस पूरे कानूनी विवाद को विस्तार से समझने और सभी पक्षों की दलीलों को गहराई से सुनने के लिए हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख 5 अगस्त 2026 तय की है, तब तक फिल्म पर यह प्रतिबंध पूरी तरह लागू रहेगा।
जनहित याचिका के माध्यम से सीबीएफसी के सर्टिफिकेट को रद्द करने की मांग
यह बड़ा कानूनी फैसला महेश कुमार साहू और उनके अन्य सहयोगियों द्वारा उड़ीसा हाईकोर्ट में दायर की गई एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए आया है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से गुहार लगाई थी कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सीबीएफसी द्वारा इस एनिमेटेड फिल्म को जारी किए गए प्रदर्शन प्रमाण पत्र को तुरंत प्रभाव से रद्द कर दिया जाए। इसके साथ ही याचिका में ओडिशा राज्य की भौगोलिक सीमाओं के भीतर इस फिल्म के व्यावसायिक और सार्वजनिक प्रदर्शन पर पूरी तरह से पाबंदी लगाने की मांग की गई थी ताकि किसी भी प्रकार के सामाजिक और धार्मिक विवाद को समय रहते रोका जा सके।
भगवान जगन्नाथ के काल्पनिक दृश्यों और प्राचीन पुराणों के उल्लंघन पर घिरी फिल्म
याचिकाकर्ताओं ने फिल्म की कहानी और इसके प्रस्तुतीकरण पर कई गंभीर तकनीकी और धार्मिक आपत्तियां दर्ज कराई हैं। उनका मुख्य आरोप है कि इस एनिमेटेड फिल्म में भगवान जगन्नाथ के पावन बचपन से जुड़े कुछ ऐसे काल्पनिक प्रसंग, हिंसक युद्ध के दृश्य और अन्य विवादास्पद घटनाएं दिखाई गई हैं, जो सनातन धर्म के पवित्र स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण और पुरी मंदिर की प्राचीन ऐतिहासिक परंपराओं के बिल्कुल विपरीत हैं। याचिका में यह भी दलील दी गई है कि भगवान जगन्नाथ जैसी सर्वोच्च आस्था के केंद्र को सिनेमा में काल्पनिक रूप से संवाद करते और सामान्य इंसानों जैसा व्यवहार करते दिखाना दुनिया भर में फैले उनके भक्तों की धार्मिक मान्यताओं को गहरी चोट पहुंचा सकता है।
टीजर रिलीज के बाद भड़का विवाद और गजपति महाराज की स्क्रीनिंग का मामला
इस पूरे विवाद की शुरुआत 6 जून 2026 को फिल्म का पहला आधिकारिक टीजर इंटरनेट पर रिलीज होने के साथ हुई थी। टीजर सामने आते ही आम भक्तों, श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन यानी एसजेटीए और कई प्रतिष्ठित धार्मिक संगठनों ने इस पर अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। बढ़ते विवाद को शांत करने के उद्देश्य से फिल्म के निर्माता ने पुरी के गजपति महाराज और मंदिर के वरिष्ठ अधिकारियों के लिए इस फिल्म की एक विशेष स्क्रीनिंग का आयोजन भी किया था। उस स्क्रीनिंग के दौरान मंदिर प्रशासन ने फिल्म में कई जरूरी बदलाव करने के अहम सुझाव दिए थे और निर्माता ने उन बदलावों को करने का पूरा आश्वासन भी दिया था, लेकिन आरोप है कि बाद में उन सुझावों को शामिल किए बिना ही फिल्म को 17 जुलाई 2026 को रिलीज करने की घोषणा कर दी गई।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम धार्मिक आस्था पर हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी
अदालत की कार्यवाही के दौरान फिल्म निर्माता ने अपनी दलील पेश करते हुए कहा कि उन्होंने फिल्म की शुरुआत में एक स्पष्ट अस्वीकरण यानी डिस्क्लेमर लगाया है, जिसमें यह साफ कहा गया है कि यह फिल्म एक काल्पनिक कलात्मक रचना है। निर्माता ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत मिलने वाले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का हवाला दिया और कहा कि इस एनिमेटेड प्रोजेक्ट में बहुत बड़ा आर्थिक निवेश किया गया है। इस पर उड़ीसा हाईकोर्ट ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि हालांकि सिनेमा को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पूरा अधिकार है, लेकिन यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत तय किए गए उचित प्रतिबंधों के दायरे में ही आता है। कोर्ट ने साफ किया कि फिल्मों का आम समाज और विशेष रूप से लोगों की धार्मिक आस्था पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है, इसलिए कलात्मक आजादी और जनभावनाओं के बीच एक सही संतुलन होना बेहद जरूरी है।
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