एजेंसी, तेहरान। Iran Supreme Leader : ईरान में हुए भीषण हमलों के बाद वहां की सत्ता संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। फरवरी के अंत में हुए सैन्य हमलों के बाद से वर्तमान सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह दूर हैं। खबरों के अनुसार, उस हमले में उनके पिता अयातुल्ला अली खामेनेई और परिवार के अन्य सदस्यों की मृत्यु हो गई थी, जबकि मुजतबा स्वयं गंभीर रूप से घायल हो गए थे। वर्तमान में विशेषज्ञों और चिकित्सकों की एक विशेष टीम उनके उपचार में जुटी है, जिसमें राष्ट्रपति मसूद पजशकियान भी शामिल हैं। सुरक्षा कारणों से उच्च अधिकारियों का भी उनसे मिलना प्रतिबंधित है ताकि उनके गुप्त ठिकाने की जानकारी उजागर न हो सके।
🔴Brigadier General Ahmad Vahidi, commander of the Iranian Revolutionary Guard, has effectively taken control of Iran single-handedly.
Iranian Supreme Leader Mojtaba Khamenei is receiving medical treatment under his supervision.
Social media accounts and speeches are published… pic.twitter.com/68wrW32NSx
— The Digital Prophet (@MRcpn7) April 24, 2026
गंभीर चोटें और शारीरिक चुनौतियां
प्राप्त जानकारी के अनुसार मुजतबा खामेनेई की शारीरिक स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। उनके एक पैर का कई बार ऑपरेशन किया जा चुका है और अब वहां कृत्रिम अंग (नकली पैर) लगाने की तैयारी है। हमले में उनके चेहरे और होंठों के बुरी तरह झुलस जाने के कारण उन्हें बोलने में अत्यधिक कठिनाई हो रही है, जिसके लिए भविष्य में प्लास्टिक सर्जरी का सहारा लिया जाएगा। हालांकि, चिकित्सकों का कहना है कि वे मानसिक रूप से पूरी तरह सक्रिय हैं, किंतु उनकी रिकवरी में अभी काफी समय लग सकता है।
सेना के हाथों में देश का भविष्य
सुप्रीम लीडर की अनुपस्थिति में ईरान की वास्तविक शक्ति अब वहां की सेना, विशेषकर इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के वरिष्ठ कमांडरों के पास चली गई है। मुजतबा खामेनेई केवल लिखित संदेशों और बंद लिफाफों के माध्यम से संवाद कर रहे हैं। वर्तमान में देश का संचालन किसी कंपनी के ढांचे की तरह हो रहा है, जहां मुजतबा केवल नाममात्र के प्रमुख हैं, जबकि ‘बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स’ की भूमिका में सेना के जनरल सभी महत्वपूर्ण और कड़े फैसले ले रहे हैं।
कूटनीति और बातचीत पर सैन्य प्रभाव
ईरान की विदेश नीति और सुरक्षा संबंधी निर्णयों पर अब सेना का पूर्ण नियंत्रण है। परमाणु समझौते और अमेरिका के साथ बातचीत जैसे मुद्दों पर भी जनरलों की राय सर्वोपरि मानी जा रही है। जहां राष्ट्रपति और विदेश मंत्री आर्थिक नुकसान को देखते हुए बातचीत का रास्ता खुला रखना चाहते हैं, वहीं सेना के अधिकारियों ने कड़ा रुख अपनाते हुए कई बार वार्ताओं को स्थगित कर दिया है। सेना ने होर्मुज जैसे रणनीतिक रास्तों को बंद करने और जवाबी हमलों की रणनीति बनाने में मुख्य भूमिका निभाई है।
आईआरजीसी का बढ़ता राजनीतिक कद
वर्ष 1979 की क्रांति के बाद बनी आईआरजीसी अब ईरान की सबसे शक्तिशाली संस्था बनकर उभरी है। धार्मिक नेताओं का प्रभाव धीरे-धीरे कम हो रहा है और सुरक्षा परिषद से लेकर खुफिया तंत्र तक हर जगह सैन्य अधिकारियों का वर्चस्व बढ़ गया है। मुजतबा खामेनेई का स्वयं का सैन्य इतिहास भी उन्हें जनरलों के करीब लाता है, जिससे वे उनके सुझावों को आसानी से स्वीकार कर लेते हैं। फिलहाल, ईरान एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां निर्वाचित सरकार के बजाय सैन्य नेतृत्व ही भविष्य की दिशा तय कर रहा है।
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