एजेंसी, कोलकाता। TMC Rebel News : पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर चल रहा अंदरूनी कलह और राजनीतिक घमासान अब अपने सबसे चरम स्तर पर पहुंच गया है। विधानसभा के बाद अब पार्टी के लोकसभा सांसदों में भी एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक बगावत देखने को मिल रही है। इस अभूतपूर्व राजनीतिक संकट के बीच टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने मंगलवार को एक बड़ा प्रशासनिक कदम उठाते हुए अपने सबसे भरोसेमंद और वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी को लोकसभा में पार्टी का नया मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) नियुक्त कर दिया है। ममता बनर्जी ने इस फैसले के तुरंत बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक आधिकारिक पत्र भेजा है, जिसमें उन्होंने साफ तौर पर आग्रह किया है कि कल्याण बनर्जी की इस नियुक्ति को तत्काल प्रभाव से सरकारी रिकॉर्ड में शामिल कर लागू किया जाए। माना जा रहा है कि ममता बनर्जी का यह कदम पार्टी के भीतर मची बड़ी भगदड़ को रोकने और बचे हुए सांसदों पर अपना नियंत्रण बनाए रखने की एक आखिरी कानूनी कोशिश है।
बीस सांसदों की बगावत और अलग गुट बनाने की मांग
पार्टी के भीतर मचे इस घमासान की गहराई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लोकसभा में टीएमसी के कुल 28 सांसदों में से 20 सांसदों ने एक दिन पहले ही ममता बनर्जी के नेतृत्व के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया था। इन बागी नेताओं ने ममता बनर्जी का साथ छोड़कर केंद्र की सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार को अपना बाहर से समर्थन देने का एक बहुत बड़ा और चौंकाने वाला फैसला किया है। इस बागी गुट ने एकजुटता दिखाते हुए वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार को लोकसभा में अपना नया मुख्य सचेतक चुन लिया था। खुद काकोली घोष ने इन सभी 20 बागी सांसदों के हस्ताक्षर वाला एक आधिकारिक आवेदन पत्र लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंपा था। इस पत्र के माध्यम से उन्होंने संसद के भीतर टीएमसी के इन अलग हुए सांसदों के लिए एक बिल्कुल स्वतंत्र और पृथक संसदीय ब्लॉक के रूप में बैठने की विशेष व्यवस्था करने की मांग की है।
क्या होता है मुख्य सचेतक का पद और इसकी अहमियत
संसदीय लोकतंत्र में मुख्य सचेतक यानी चीफ व्हिप का पद बेहद शक्तिशाली और महत्वपूर्ण माना जाता है। चीफ व्हिप किसी भी राजनीतिक दल का एक अत्यंत वरिष्ठ और अनुभवी नेता होता है, जिसके कंधों पर संसद या राज्य की विधानसभाओं के भीतर अपनी पार्टी के सभी सांसदों या विधायकों के बीच कड़ा अनुशासन बनाए रखने की मुख्य जिम्मेदारी होती है। इसके साथ ही सदन में जब भी किसी महत्वपूर्ण विधेयक या कानून पर मतदान होता है, तो पार्टी की रणनीति को पूरी तरह से जमीन पर लागू कराने का जिम्मा भी इसी पद के पास होता है। यदि पार्टी का कोई भी सांसद या विधायक मुख्य सचेतक द्वारा जारी किए गए आधिकारिक आदेश या निर्देश का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ दल-बदल विरोधी कानून के तहत बेहद सख्त अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्यवाही की जा सकती है, जिससे उसकी सदन की सदस्यता भी हमेशा के लिए समाप्त हो सकती है।
टीएमसी का बदलता राजनीतिक समीकरण और आंकड़ों का खेल
अगर वर्तमान समय में संसद और बंगाल विधानसभा के भीतर तृणमूल कांग्रेस की वास्तविक स्थिति पर नजर डालें, तो आंकड़े पार्टी के लिए बेहद चिंताजनक दिखाई दे रहे हैं। वर्तमान में लोकसभा के भीतर टीएमसी के कुल 28 सांसद निर्वाचित हैं, जबकि राज्यसभा में पार्टी के पास 13 सदस्य मौजूद हैं। इस लोकसभा विद्रोह से कुछ दिन पहले ही आगामी 3 जून को पश्चिम बंगाल विधानसभा के भीतर भी एक बहुत बड़ा भूचाल आया था, जब टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से 58 विधायकों ने ममता बनर्जी से अपना नाता तोड़कर एक बिल्कुल अलग गुट का गठन कर लिया था। विधायकों के इस नए बागी गुट ने ऋतब्रत को अपना सर्वसम्मत नेता घोषित किया था। अब ठीक वैसा ही नजारा दिल्ली के सियासी गलियारों में भी देखने को मिल रहा है। इन सभी बागी सांसदों ने बीती 8 जून की रात को दिल्ली में एक बेहद गुप्त और अज्ञात स्थान पर एक महत्वपूर्ण बैठक की थी, जिसकी तस्वीरें अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं।
काकोली घोष का बड़ा दावा और वफादारी पर तीखी बहस
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में मौजूद सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने सोमवार को मीडिया के सामने आकर बेहद आक्रामक अंदाज में बयान दिया था। उन्होंने साफ किया था कि वे कानूनी और व्यावहारिक रूप से अभी भी लोकसभा में पार्टी की मुख्य सचेतक के पद पर बनी हुई हैं। हालांकि काकोली ने बीते 27 मई को ही व्यक्तिगत कारणों से टीएमसी के सभी प्राथमिक और सांगठनिक पदों से अपना इस्तीफा दे दिया था, लेकिन उन्होंने अपने सांसद पद से त्यागपत्र नहीं दिया था। अपने पुराने दिनों को याद करते हुए भावुक अंदाज में उन्होंने कहा कि वे साल 1986 से लगातार ममता बनर्जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रही हैं और साल 2005 में पार्टी ने उन्हें पार्षद का चुनाव तक लड़वाया था। उन्होंने कहा कि वे जमीन पर कड़ा संघर्ष करके आज इस मुकाम तक पहुंची हैं और उनका सिर कट सकता है लेकिन वे किसी अनुचित दबाव के आगे झुकेंगी नहीं।
नेताओं के बीच बढ़ता जुबानी जंग और तीखे आरोप-प्रत्यारोप
टीएमसी में मचे इस भीषण अंतInternal कलह के बाद पार्टी के वफादार और बागी नेताओं के बीच तीखी बयानबाजी का दौर शुरू हो गया है। ममता बनर्जी के खेमे की बेहद मुखर राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने इस बगावत पर गहरा दुख और रोष व्यक्त करते हुए कहा कि आज के समय में राजनीतिक वफादारी सिर्फ चुनाव जीतने तक ही सीमित रह गई है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि विरोधी खेमे के बड़े नेताओं के मात्र एक फोन कॉल आते ही लोगों की राजनीतिक नैतिकता और विचारधारा पूरी तरह से खत्म हो जाती है, जो कि लोकतंत्र के लिए बेहद शर्मनाक बात है। वहीं दूसरी तरफ, ममता खेमे के ही लोकसभा सांसद कल्याण बनर्जी ने बागियों को ललकारते हुए कहा कि भले ही आज विपक्ष के पास केंद्रीय जांच एजेंसियां और अन्य सरकारी ताकतें मौजूद हों, लेकिन उनके पास बंगाल की जनता, पार्टी के सच्चे कार्यकर्ता और ‘मां, माटी, मानुष’ का अटूट आशीर्वाद है। इसी बीच, पूर्व राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर ने भी स्पष्ट किया कि उन्होंने पार्टी छोड़ने का निर्णय किसी भी बाहरी दबाव में आकर नहीं, बल्कि अपनी अंतरात्मा की आवाज पर लिया है क्योंकि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका था।
दिल्ली में बैठकों का दौर और भविष्य की रणनीति
इस पूरे घटनाक्रम के बीच 9 जून को दिल्ली के भीतर कई बड़ी राजनीतिक गतिविधियां देखने को मिलीं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी जैसे ही विपक्षी गठबंधन की बैठक में हिस्सा लेने दिल्ली पहुंचे, वैसे ही पार्टी के भीतर असंतोष की यह चिंगारी पूरी तरह से भड़क उठी। ममता बनर्जी जहां एक तरफ राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष को एकजुट करने की कोशिशों में जुटी थीं, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली के भीतर ही टीएमसी के 10 बागी सांसदों ने केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के सरकारी आवास पर जाकर एक बहुत ही महत्वपूर्ण और लंबी बैठक की। इस बैठक की खास बात यह रही कि पश्चिम बंगाल के कद्दावर नेता और वर्तमान विपक्ष के प्रमुख चेहरे शुभेंदु अधिकारी भी विशेष रूप से इन बागी सांसदों से मुलाकात करने के लिए केंद्रीय मंत्री के आवास पर पहुंचे। इन बढ़ती मुलाकातों और बैठकों से यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल और देश की राजनीति में एक बहुत बड़ा उलटफेर देखने को मिल सकता है।
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