जल संरक्षण

जल संरक्षण और निर्बाध आपूर्ति म.प्र में ग्रामीण स्वास्थ्य और समृद्धि का दौर

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जल संरक्षण और निर्बाध आपूर्ति म.प्र में ग्रामीण स्वास्थ्य और समृद्धि का दौर

​किसी भी लोककल्याणकारी राज्य की सफलता का सबसे बड़ा पैमाना यह होता है कि वह अपने नागरिकों की बुनियादी आवश्यकताओं को कितनी संजीदगी और तत्परता से पूरा करता है। रोटी, कपड़ा और मकान के इस दौर में ‘जल’ जीवन का वह अनिवार्य तत्व है, जिसके बिना किसी भी विकसित समाज या राज्य की कल्पना असंभव है। मध्य प्रदेश के वर्तमान परिदृश्य में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग की हालिया समीक्षा बैठक इसी दिशा में एक युगांतरकारी कदम के रूप में उभरकर सामने आई है। इस बैठक से जो नीतिगत निर्णय और भविष्य की योजनाएं छनकर बाहर आई हैं, वे साफ तौर पर यह संदेश देती हैं कि राज्य सरकार के लिए पेयजल की निर्बाध आपूर्ति कोई प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि सर्वोच्च प्राथमिकता है। भीषण गर्मी के इस दौर में जब जल संकट एक बड़ी चुनौती बनकर उभरता है, तब सरकार का अग्रसक्रिय रुख और मैदानी स्तर पर त्वरित वैकल्पिक व्यवस्थाओं के निर्देश नागरिकों के प्रति उसकी संवेदनशीलता को प्रकट करते हैं। सरकार की यह तत्परता केवल तात्कालिक संकट प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य के दीर्घकालिक विकास और ग्रामीण सशक्तिकरण के एक व्यापक कैनवास का हिस्सा है।

​मध्य प्रदेश में जल जीवन मिशन की प्रगति इस बात का साक्ष्य है कि राज्य किस प्रकार ‘हर घर नल से जल’ के संकल्प को धरातल पर उतार रहा है। मार्च 2028 की तय समय-सीमा से पहले इस मिशन को शत-प्रतिशत पूरा करने का लक्ष्य रखना और वर्तमान में ही अस्सी प्रतिशत से अधिक कार्य संपन्न कर लेना राज्य की प्रशासनिक गतिशीलता को दर्शाता है। उज्जैन राजस्व संभाग सहित प्रदेश के ग्यारह जिलों में इस मिशन का शत-प्रतिशत पूरा होना एक ऐसी उपलब्धि है, जो अन्य क्षेत्रों के लिए अनुकरणीय मॉडल बन चुकी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार इस सफलता का श्रेय केवल तंत्र को नहीं दे रही, बल्कि उन ग्रामीण पंचायतों और समुदायों को प्रोत्साहित एवं सम्मानित करने का निर्णय लिया गया है जिन्होंने अपने बलबूते पर इन नल-जल योजनाओं का सफल संचालन और संधारण किया है। यह निर्णय वास्तव में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण और सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देने वाला है, क्योंकि जब तक समाज स्वयं सरकारी योजनाओं को अपनी संपत्ति मानकर उसकी सुरक्षा और प्रबंधन नहीं करेगा, तब तक कोई भी बदलाव स्थायी नहीं हो सकता।
​इस पूरे विमर्श में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा बनाया गया ‘बोरवेल अधिनियम’ देश के विधायी इतिहास में एक मील का पत्थर है। खुले बोरवेल में मासूम बच्चों के गिरने और असमय काल के गाल में समा जाने की हृदयविदारक घटनाएं लंबे समय से पूरे देश को झकझोरती रही हैं। ऐसी आकस्मिक दुर्घटनाओं और मौतों को रोकने के लिए कड़ा कानून बनाने वाला मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य बना है। यह अधिनियम केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक की जान की कीमत समझने वाली एक उत्तरदायी सरकार की इच्छाशक्ति का प्रतीक है। इसके साथ ही, विभाग के सिविल विंग, मैकेनिकल विंग और जल निगम को एकीकृत करने का प्रशासनिक सुझाव भी इस बात का संकेत है कि सरकार जटिल नौकरशाही प्रक्रियाओं को सरल बनाकर कार्यप्रणाली में गति और पारदर्शिता लाना चाहती है। ‘कर्म स्थान से जन्म स्थान की ओर’ जैसी अनूठी अवधारणा के साथ जब डिंडौरी और मंडला जैसे जनजातीय बहुल और सुदूर क्षेत्रों में आठ हजार से अधिक एकल ग्राम नल जल योजनाओं को पूरा किया जाता है, तो यह विकास के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक पहुंचने के अंत्योदय के सिद्धांत को चरितार्थ करता है।
​जल की आपूर्ति के साथ-साथ उसके संरक्षण और भविष्य की सुरक्षा के लिए वित्तीय प्रबंधन और तकनीकी कौशल का अनूठा समन्वय भी राज्य में दिखाई दे रहा है। केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय से समन्वय स्थापित कर करीब पांच हजार करोड़ रुपये का आवंटन प्राप्त करने की सहमति राज्य की बेहतर वित्तीय कूटनीति का परिणाम है। इस भारी-भरकम बजट का उपयोग राज्य में एक ऐसा सुदृढ़ मैकेनिज्म तैयार करने में किया जा रहा है जिससे सभी नल-जल योजनाएं बिना किसी व्यवधान के चलती रहें। सरकार की सोच की परिपक्वता इस बात से भी स्पष्ट होती है कि वह केवल ट्यूबवेल जैसे भूजल दोहन करने वाले माध्यमों पर आश्रित नहीं रहना चाहती। मुख्यमंत्री का यह दृष्टिकोण बेहद वैज्ञानिक और दूरदर्शी है कि जल स्रोत के रूप में तालाबों और सरोवरों का निर्माण किया जाए। इससे न केवल जल का संरक्षण होगा, बल्कि प्राकृतिक रूप से वॉटर रिचार्जिंग बढ़ेगी और भूजल स्तर में सुधार होगा। यह दृष्टिकोण पर्यावरण संतुलन और दीर्घकालिक जल सुरक्षा की गारंटी देता है, जिसमें मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिसर (मैपकॉस्ट) की विशेषज्ञ सेवाओं को जोड़ना सोने पर सुहागा जैसा है।
​आधुनिक युग में किसी भी व्यवस्था को पारदर्शी और जन-अनुकूल बनाने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग अनिवार्य है। मध्य प्रदेश का जल निगम इस दिशा में ‘जलदर्पण पोर्टल’ के माध्यम से एक क्रांतिकारी बदलाव ला रहा है। डिजिटल माध्यम से जल प्रदाय की मॉनिटरिंग, एकल नल जल योजनाओं में आईओटी (इंटरनेट ऑफ थिंग्स) सेंसर्स लगाना और राज्य एवं जिला स्तर पर एक अत्याधुनिक कमांड एंड कंट्रोल सेंटर की स्थापना का प्रस्ताव यह दिखाता है कि मध्य प्रदेश का लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग तकनीकी रूप से कितना उन्नत हो रहा है। इसके माध्यम से किसी भी क्षेत्र में जलापूर्ति बाधित होने या गुणवत्ता में कमी आने पर तत्काल सुधारात्मक कदम उठाए जा सकेंगे। साथ ही, उपभोक्ताओं की शिकायतों और सुझावों का ऑनलाइन निराकरण व्यवस्था को अधिक जवाबदेह बनाएगा। इसके अलावा, समूह ग्राम पेयजल प्रदाय योजनाओं के संचालन खर्चे को कम करने के लिए सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं की स्थापना का निर्णय पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक बचत दोनों ही दृष्टियों से क्रांतिकारी है।
​जल जीवन का आधार है और जल का उत्सव मनाना जीवन का उत्सव मनाना है। आगामी अक्टूबर माह में आयोजित होने वाला ‘जल उत्सव’ कार्यक्रम केवल एक सरकारी आयोजन नहीं, बल्कि जल चेतना का एक जन-आंदोलन बनने जा रहा है। इसे ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ के साथ जोड़कर सरकार जल बचाने वाले नायकों को सम्मानित करने जा रही है, जिससे समाज में जल संरक्षण के प्रति एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और सकारात्मक वातावरण का निर्माण होगा। वर्तमान में ग्रामीण, शहरी और विद्यालयों के जल स्रोतों की वॉटर टेस्टिंग और ऑपरेटरों को दिया जा रहा प्रशिक्षण इस बात की गारंटी है कि राज्य अपने नागरिकों को केवल पानी ही नहीं, बल्कि शुद्ध और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के प्रति संकल्पित है। दिसंबर २०२३ से अब तक साढ़े सोलह लाख से अधिक घरों को नए नल कनेक्शन देना और चौदह हजार से अधिक गांवों को ‘हर घर जल’ घोषित करना इस बात का प्रमाण है कि विकास की गति अत्यंत तीव्र है। मध्य प्रदेश के लगभग पचहत्तर प्रतिशत परिवारों तक नल से जल पहुंच चुका है, जो ग्रामीण महिलाओं को पानी के लिए मीलों पैदल चलने के अभिशाप से मुक्ति दिला रहा है। यह लेख मध्य प्रदेश की इस जल-क्रांति की सराहना करता है और यह विश्वास दिलाता है कि सामूहिक चेतना, प्रशासनिक दक्षता और आधुनिक तकनीक के इस संगम से राज्य का हर नागरिक न केवल प्यास से मुक्त होगा, बल्कि एक स्वस्थ, समृद्ध और आत्मनिर्भर मध्य प्रदेश के निर्माण में अपना बहुमूल्य योगदान दे सकेगा।

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