एजेंसी, इस्लामाबाद। Lahore News Updates : पाकिस्तान के पंजाब प्रांत से एक बेहद ऐतिहासिक और चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आ रहा है। दशकों तक कट्टर इस्लामीकरण के दौर से गुजरने के बाद अब लाहौर शहर अपनी ऐतिहासिक जड़ों की ओर लौट रहा है। पंजाब सूबे की मरियम नवाज सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए पिछले दो महीनों के भीतर लाहौर की 9 प्रमुख जगहों के इस्लामी नामों को बदलकर फिर से उनके मूल हिंदू, जैन और ब्रिटिश विरासत वाले पुराने नामों में बहाल कर दिया है। सरकार के इस आधिकारिक फैसले के बाद इन इलाकों में नए नामों के बोर्ड भी लगा दिए गए हैं। सबसे खास बात यह रही कि पाकिस्तान में इस बड़े बदलाव के खिलाफ वहां का कोई भी कट्टरपंथी संगठन मोर्चा नहीं खोल पाया।
‘कृष्णनगर’ और ‘जैन मंदिर चौक’ की हुई आधिकारिक वापसी
प्रशासनिक स्तर पर हुए इस ऐतिहासिक बदलाव के तहत लाहौर के प्रसिद्ध ‘इस्लामपुरा’ इलाके का नाम बदलकर अब आधिकारिक रूप से उसका पुराना नाम ‘कृष्णनगर’ कर दिया गया है। इसी तरह 1990 के दशक में बदला गया ‘बाबरी मस्जिद चौक’ का नाम अब फिर से अपना पुराना और मूल नाम ‘जैन मंदिर चौक’ के रूप में जाना जाएगा। इसके अलावा ‘मुस्तफाबाद’ का नाम बदलकर भी उसका पुराना ऐतिहासिक नाम ‘धर्मपुरा’ कर दिया गया है। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, नाम परिवर्तन के इस प्रोजेक्ट के दूसरे चरण में पाकिस्तान के सिंध और खैबर पख्तूनख्वाह प्रांतों में भी कई शहरों और इलाकों के मूल नामों को वापस लाने का ऐलान किया जा सकता है।
लक्ष्मी चौक हमारी साझी विरासत का हिस्सा
इस बदलाव पर लाहौर की बीकनहाउस यूनिवर्सिटी के लेक्चरर साद मलिक ने बेहद सुखद प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने बताया कि म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने अपने कागजों में भले ही इसका नाम बदलकर ‘मौलाना जफर अली चौक’ कर दिया था, लेकिन आम जनता के दिलों में यह हमेशा से ‘लक्ष्मी चौक’ ही रहा। साद मलिक के मुताबिक, लक्ष्मी चौक पीढ़ियों से जुड़ा हुआ नाम है और यह उस साझी विरासत का हिस्सा है, जिसे जबरन थोपे गए नामों से नहीं बदला जा सकता।
जैन मंदिर नाम से ईमान पर आंच नहीं आती: मौलाना कादरी
जैन मंदिर चौक के पास स्थित अनारकली इलाके के प्रमुख मौलाना वाजिद कादरी ने भी इस फैसले का खुलकर समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि इस्लाम को किसी मंदिर या गुरुद्वारे के नाम से कोई समस्या नहीं है। 1990 के दशक में जैन मंदिर चौक का नाम बदलकर बाबरी मस्जिद चौक करना पूरी तरह से एक सियासी फैसला था। आम जनता ने कभी इसे बाबरी मस्जिद चौक स्वीकार ही नहीं किया। उन्होंने आगे कहा कि हमें यह समझना होगा कि जिन पूर्वजों ने ये हिंदू नाम रखे थे, वे भी इसी मिट्टी के थे और इन नामों से किसी के ईमान पर कोई आंच नहीं आती।
नवाज शरीफ के दौर की गलतियों को बेटी मरियम नवाज ने सुधारा
लाहौर में नामों को बदलने की यह पूरी कवायद पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और पंजाब की वर्तमान मुख्यमंत्री मरियम नवाज की पहल पर शुरू हुई है। 19 मार्च को हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में ‘लाहौर हेरिटेज एरिया रिवाइवल’ (एलएचएआर) प्रोजेक्ट को मंजूरी दी गई थी। इस बैठक में नवाज शरीफ ने कहा था कि हमें यूरोप के देशों से सीख लेनी चाहिए जो अपने ऐतिहासिक नामों से कभी छेड़छाड़ नहीं करते हैं। लाहौर के पुराने नाम हमारा असली इतिहास हैं, जिन्हें हमें सहेजना होगा। मुख्यमंत्री मरियम नवाज ने भी कहा कि पुराने नाम और ऐतिहासिक इमारतें ही लाहौर की असल पहचान हैं। गौरतलब है कि लाहौर में हिंदू नामों को बदलने का दौर 1990 के दशक में भारत में बाबरी ढांचा गिराए जाने के बाद शुरू हुआ था, जिसे अब सुधारा जा रहा है।
कट्टरपंथियों पर लगाम के कारण नहीं हुआ कोई विरोध
पाकिस्तान में इस तरह के बदलावों पर अमूमन भारी हिंसा और विरोध देखने को मिलता है, लेकिन इस बार माहौल पूरी तरह शांत रहा। इसका मुख्य कारण यह है कि सड़कों पर उत्पात मचाने के लिए कुख्यात कट्टरपंथी संगठन ‘तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान’ (टीएलपी) पर मरियम नवाज सरकार ने पूरी तरह से बैन लगा रखा है। इसके साथ ही लश्कर-ए-तैयबा जैसे अन्य संगठनों ने भी इन मूल और ऐतिहासिक नामों को दोबारा रखे जाने का कोई विरोध नहीं किया है। सरकार की योजना के अनुसार, इस प्रोजेक्ट के तहत परकोटा शहर लाहौर के प्रसिद्ध ‘दिल्ली गेट’ समेत सभी आठों ऐतिहासिक दरवाजों का भी जल्द ही जीर्णोद्धार किया जाएगा।
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